SPIRITUAL RESEARCH

DEDICATED to Om Mandli ‘Godly Mission’ to present posts regarding the LATEST & FINAL part of BapDada of World Purification & World TRANSFORMATION – through Divine Mother Devaki - SAME soul of 'Mateshwari', Saraswati Mama.
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प्रश्न - Question

Avyakt Vani 18.01.1988 – Revised on 13.06.2021

“तीन पैर (पग) पृथ्वी देने वाले भी आए हैं। तीन पैर दे और तीन लोकों का मालिक बन जाएं, तो देना क्या हुआ!”
“Even those who have given ‘three feet of land’ have come. You gave ‘three feet of land’ and became the ‘Masters of the Three Worlds’, and so what was your giving!”

यह 3-पैर पृथ्वी कौन सी है ... और कौन से बच्चे दे रहे हैं ... और बदले में कौन से 3 लोक के मालिक बन रहे हैं?
Which are these ‘three feet of land’ ... and which children are giving same ... and, in return, they are becoming the Masters of which 3 Worlds?

कृपया समझाएं..
Please explain ..

=============

उत्तर - Answer

ट्रिनिटी - ट्रिब्यूनल - शिव, ब्रह्मा, सरस्वती - त्रिमूर्ति से प्रतिक्रिया :
"जब मनुष्य आत्मा प्रकृति रूपी तीन पैर - तन, धन, जन (दैहिक रिश्ते) - मन से सरेंडर करते हैं, तो ‘तीन लोकों के मालिक’ बन जाते हैं - अर्थात - जो त्रिमूर्ति का अंतिम समय का पार्ट है - सरस्वती मम्मा साकार में, ब्रह्मा बाबा आकार में, और शिवबाबा निराकार में - जो अभी साकार में चल रहा है - उस पार्ट को ठीक ढंग से समझ पाते हैं, अर्थात तीसरे नेत्र द्वारा रियल-आईज (अनुभव) कर पाते हैं - और उस पार्ट का पूरा लाभ लेकर, अर्थात स्वयं प्रति पूरा फायदा उठाकर - दिल का सच्चा प्यार से, तीनों सर्वश्रेष्ट आत्माओं के दिलों को जीत कर, उनके दिल-तख़्त नशीन बनते हैं – अर्थात तीनों दिलों के मालिक बनते हैं - तो ‘तीन लोकों के मालिक’ बन जाते हैं, अर्थात तीनों लोकों में, आसान रीति से, अंतर मन के वाहक द्वारा, सैर कर पाते हैं!"
= ॐ नम: ‘त्रिमूर्ति’ शिवाय =

RESPONSE from Trimurti - TRINITY - TRIBUNAL - SHIV, BRAHMA, Saraswati :
“ When the human soul SURRENDERS the material forms of the body, wealth, and bodily relationships, with the mind - then they become the ‘Masters of the Three Worlds’ – that is – they understand very well, the FINAL part of the ‘Trimurti’, (or Trinity) – of Saraswati Mama, Brahma Baba, and Incorporeal ShivBaba – which is NOW taking place in ‘Sakar’ – that is, they are able to REAL-EYEs (EXPERIENCE) same with the Third Eye – and by taking COMPLETE BENEFIT of that part, that is, by taking FULL ADVANTAGE of that part for the self – by WINNING the Hearts of ALL the THREE MOST ELEVATED souls, with TRUE Love from the heart, they become MERGED within their Heart-Thrones – that is, they become the Masters of ALL the THREE Hearts – so they become the ‘Masters of the Three Worlds’, that is, they are able to TRAVEL, very EASILY, in ALL the Three Worlds, with the INTERNAL VEHICLE of the mind! ”
= Salutations to ‘Trimurti’ Shiva =
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SPIRITUAL RESEARCH Index - Section A

सच्ची गीता व झूठी गीता का CONTRAST

(55 Topics)

( View file attached below )


01 - बाप का निश्चय
02 - शिवबाबा रोज़, पढ़ाने के लिए, परमधाम से आते हैं
03 - जगदम्बा – मम्मा (ओम राधे) – Part 1
04 - जगदम्बा – मम्मा (ओम राधे) – Part 2
05 - शंकर का कोई साकार पार्ट है नहीं
06 - ‘हर-हर महादेव’, शिव को ही कहेंगे
07 - राम फ़ैल हुआ - अंतिम स्टेज में
08 - शिवलिंग एक निराकार शिव का ही यादगार है - कोई देहधारी का नहीं
09 - सिर्फ दो नम्बर आउट हुए हैं, (ब्रह्मा) बाप (लेखराज) और (सरस्वती) माँ (ओम राधे)
10 - मुकर्रर रथ कभी बदली नहीं हो सकता
11 - जगदम्बा – मम्मा (ओम राधे) – Part 3
12 - ट्रिब्युनल (Tribunal) - सतगुरू के निंदक ठौर न पायें
13 - ब्रह्मपुत्रा नदी (ब्रह्मा बाबा)
14 - संगमयुगी ब्राह्मणों की दुनिया में राम राज्य (दिन) और रावण राज्य (रात) का ‘शूटिंग’, अर्थात ‘संस्कारों का रिफ्रेशिंग’- Part 1
15 - संगमयुगी ब्राह्मणों की दुनिया में राम राज्य (दिन) और रावण राज्य (रात) का ‘शूटिंग’, अर्थात ‘संस्कारों का रिफ्रेशिंग’- Part 2
16 - ब्रह्मा - मात-पिता - दोनों हैं
17 - ब्रह्मा बाबा ही (निमित्त) देवी-देवता धर्म की स्थापना करने वाला (REAL) प्रजापिता है
18 - पतित-पावन - त्रेता का राम नहीं
19 - ‘ऊंच ते ऊंच भगवान’ - कोई भी देहधारी को नहीं कह सकते
20 - भगवान को न स्थूल, न सूक्ष्म शरीर है
21 - ‘आत्मा सो परमात्मा’ कहना रांग (wrong) है
25 - विनाश काले प्रीत बुद्धि पाण्डव विजयन्ती; और विनाश काले विपरीत बुद्धि कौरव व यादव विनशयन्ती
26 - ‘महाभारी, महाभारत लड़ाई, महाकल्याणकारी है’
27 - कृष्ण का जन्म राजा के पास होता है
28 - सूक्ष्म वतन वासी संपूर्ण ब्रह्मा और स्थूल वतन वासी प्रजापिता ब्रह्मा का पार्ट अलग-अलग है - सिर्फ 1969 के पहले
29 - सूक्ष्म वतन का रहस्य
30 - त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच
31 - महाशिवरात्रि अथवा त्रिमूर्ति शिव जयन्ती
32 - साकार ब्रह्मा बाप 1969 में कर्मातीत हुए - तो ‘फालो फादर’
36 - नम्बरवन है ब्रह्मा बाबा (लेखराज की आत्मा)
37 - संवत (01.01.0001) तब शुरू होता है, जब लक्ष्मी-नारायण तख्त पर बैठते हैं
39 - सच्ची गीता व झूठी गीता का संगमयुगी ब्राह्मणों की दुनिया में शूटिंग
40 - श्रीनाथ या जगन्नाथ - आत्मा तो एक ही है
41 - शिवबाबा तो कभी मुरली हाथ में नहीं उठाते हैं
42 - ज्ञान सूर्य अथवा ज्ञान सागर, परमपिता परमात्मा शिव को ही कहा जाता है
43 - धोबीघाट
46 - एम-ऑब्जेक्ट (aim-object) है - नर से प्रिन्‍स, वा नर से नारायण बनना - बात एक ही है
51 - काली - जगदम्बा (ओम राधे) ही है – Part 4
71 - याद की विधि – SM – Part 1
72 - याद की विधि – AV – Part 2
73 - मनुष्य सृष्टि का बीजरूप
79 - 5 मुखी ब्रह्मा - 5 स्वरूप
90 - फरूखाबाद
91 - निराकार शिव बाप है सदैव पूज्य
92 - निराकार शिव, ब्रह्मा (लेखराज) के साधारण तन में आते हैं
93 - ‘गांवड़े का छोरा’
94 - कृष्ण और राधे, दोनों अलग-अलग राजधानी के हैं
95 - साइंस का हुनर, ब्राह्मण बच्चे ही, यहाँ ही सीखकर, सतयुग में काम में लगाते हैं
96 - माया के ईश्वरीय रूप
98 - देलवाड़ा मन्दिर
99 - जगन्नाथ मन्दिर
100 - पवित्र प्रवृत्ति मार्ग – Part 1
101 - पवित्र प्रवृत्ति मार्ग – Part 2
103 - शिव बाप लिखवाते थे, ब्रह्मा बाबा लिखते थे
105 - गुप्त रूप में कामधेनु है ब्रह्मा बाबा - जो ब्रह्मा को नहीं मानते, वह हुआ शूद्र

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SPIRITUAL RESEARCH Index - Section B

पुरूषार्थ, प्राप्ति व प्रालब्ध

(29 Topics)

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52 - लास्ट का पुरूषार्थ, वा लास्ट की सर्विस कौन सी है?
53 - कम्बाइन्ड रूप (combined form)
57 - फीचर्स (features) से फ्यूचर (future) दिखाना है
58 - बीज-रूप - बिन्दु-रूप स्थिति
59 - ‘नष्टो-मोह: स्मृति-स्वरूप’
60 - सम्पूर्ण स्टेज की परख
61 - रूहानी नशा और निशाना (spiritual intoxication and aim)
62 - महादानी बन, भिखारियों को महादान वा वरदान देने वाले बनो
63 - अखण्ड ज्योति
64 - ‘सन शोज फादर’ - ‘son shows Father’
65 - एकरस स्थिति - एकाग्रता
66 - संकल्प की शक्ति
67 - ‘मन जीते जगतजीत’ - ‘साइलेन्स की शक्ति’
68 - ‘नज़र से निहाल’ करने की विधि
69 - ज्वालामुखी योग
74 - ब्राह्मण सो फरिश्ता और फरिश्ता सो देवता - Part 1
75 - फरिश्तेपन की निशानी - Part 2
76 - धर्मराजपुरी
77 - अति सो अन्त
80 - शान्ति स्वरूप के चुम्बक
81 - होली हंस बुद्धि, वृत्ति, दृष्टि और मुख
82 - अंगद समान अचल स्थिति
83 - अन्त:वाहक स्थिति
84 - देवता के 5 डिग्री
85 - शीतलता की शक्ति
86 - नष्टो-मोह: - चार बातों से न्यारे बनो
97 - अव्यक्त स्थिति स्वरूप द्वारा अव्यक्त मिलन का अनुभव
102 - ज्वालामुखी योग - संगठित स्वरूप की तपस्या
111 - स्वराज्य अधिकारी सो विश्व राज्य अधिकारी

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SPIRITUAL RESEARCH Index - Section C

ओम् मण्डली - OM MANDALI

(36 Topics)

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22 - सत्य ज्ञान, परमात्म ज्ञान - अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है
23 - ‘जो आदि, सो अन्त’ – Part 1
24 - संगठन की शक्ति
33 - स्वर्ग, वैकुण्ठ की ओपनिंग कन्याओं माताओं द्वारा - ‘वन्दे मातरम्’
34 - शिव बाप की स्पष्ट प्रत्यक्षता का नगाड़ा
35 - 108 माला के मणके, कौन सी विशेषता से बनते हैं?
38 - ‘साइलेन्स बल से साइंस पर विजय’ – Part 1
44 - वायदा (promise) क्या है - बापदादा का? – Part 1
45 - वायदा (promise) क्या है - बच्चों का? – Part 2
47 - फाइनल पेपर - final paper – Part 1
48 - फाइनल पेपर - final paper – Part 2
49 - (साक्षात्कार) ‘जो आदि, सो अन्त’ – Part 2
50 - (साक्षात्कार) ‘जो आदि, सो अन्त’ – Part 3
54 - बाबा मिलन
55 - ‘साइलेन्स बल से साइंस पर विजय’ – Part 2
56 - ट्रिब्युनल (Tribunal)
70 - अष्ट रतन - ‘पास विद् ऑनर’ - ‘pass with honour’
78 - महारथी - घोड़े-सवार - प्यादे - की निशानी
87 - गंगा सागर मेला - कलकत्ता
88 - बंगाल - कलकत्ता
89 - इस्टर्न जोन - (कलकत्ता)
104 - अंत तक दाल-रोटी जरूर मिलेगी
106 - मिनी मधुबन
107 - शिव शक्ति, पाण्डव सेना
108 - गुप्त वेश में बापदादा का पार्ट
109 - ब्रह्मा द्वारा स्थापना, शंकर द्वारा विनाश, विष्णु द्वारा पालना
110 - एवररेडी (Ever Ready)
112 - आदि-देव - ब्रह्मा बाप
113 - ‘एडम’ (Adam) - ब्रह्मा बाप
114 - ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर - ब्रह्मा बाप
115 - अन्तिम नारा - ‘भारत माता शिवशक्ति अवतार’
116 - विनाश के समय बच्चों के शरीर सेफ (safe) रहेंगे
117 - ओम् मण्डली
118 - सद्गति दाता सतगुरू एक ही है
119 - गुप्त वेश में बापदादा का पार्ट – Part 2
120 - गॉड-फ़ादर सभी आत्माओं से मिलेंगे

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The INFINITE Power of the audible RESONANCE of OM (AUM)
- Part 1

The singular word OM (AUM) encompasses EVERY POSSIBLE sound that can EVER be made in ANY language spoken on this ENTIRE planet. It encompasses EVERY POSSIBLE sound that can EVER be made by ANY human being. Therefore, it is a PORTAL within this FINITE REALM, through which one can ENTER and EXPERIENCE the INFINITE REALM; and the REGULAR chanting of same, EVERYDAY, has the DEFINITE potential to take the Self, the soul, to the CLEAR EXPERIENCE of ABSOLUTE REALITY, which is also known as UNIVERSAL CONSCIOUSNESS, or TRANS-CONSCIOUSNESS!

The sound is made to originate deep within the throat with ‘A’, and is then allowed to move upwards around the curvature of the palate with ‘U’, until it reaches the lips with ‘M’, and is allowed to fade gradually, with the lips closed, until it is felt deep within the throat, once again, at the POINT of origin, thus completing one FULL cycle. The brief SILENCE between two such successive cycles, GRADUALLY attracts the Self, the soul, towards the ACTUAL EXPERIENCE of UNIVERSAL CONSCIOUSNESS, in which the individual EXPERIENCES a state of EXTREME BLISS, with increasing INTENSITY!

This PRACTICE has the potential to FREE the Self, the soul, from ANY form of DisEASE – whether physical, emotional, illusional, mental, intellectual, delusional, or spiritual !
With the regular PRACTICE of chanting OM (AUM), one is ALSO able to FREE oneself from EVERY bondage of karma, REGAIN the AWARENESS of oneself as a PURE soul, ONCE AGAIN, and become the COMPLETE MASTER of one’s OWN Self!

While chanting OM (AUM) it would be necessary to ALSO maintain the AWARENESS (VISUALISATION) of the Self, the soul, in the CENTER of the forehead - as a Point source of Vibrant, Luminous Spiritual Light Energy (JUST LIKE a star, seen at night in the sky) - and ALSO the AWARENESS (VISUALISATION) of the Supreme Soul, also as a POINT source of Vibrant, Luminous Spiritual Light Energy. This COMBINED AWARENESS of the Self, the soul, AND the Supreme Soul, enables the SUPREME Spiritual Energy from the Supreme Soul to flow to the individual soul, during this PRACTICE, and assists the individual in PROGRESSIVELY developing soul-consciousness, to be able to EVENTUALLY EXPERIENCE a state of super-sensuous Joy, or EXTREME BLISS!

The PRACTICAL EFFICACY of this SIMPLE and EASY PRACTICE can be EFFECTIVELY VERIFIED by carrying out the PRACTICE, as explained above, while SIMULTANEOUSLY holding the AWARENESS (VISUALISATION) of ANY form of MINOR discomfort, or DisEASE, within the physical body - that may be felt and sensed by the concerned individual at any time - which would subsequently DISSIPATE, DISSOLVE and DISAPPEAR very rapidly - PROVIDED the PRACTICE is carried out SINCERELY, FAITHFULLY and APPROPRIATELY!

EVERYONE should try out this PRACTICE SINCERELY, and CONVINCE one’s OWN self about the EFFICACY of same! There is NO QUESTION of BLIND FAITH in this, AT ALL! One should NEVER fall prey to BLIND FAITH, which is a DisEASE, by ITSELF!
The EFFICACY is INEVITABLE and SELF-verifiable !
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