Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 30 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2533, दिनांक 30.05.2018
VCD 2533, Date 30.05.2018
प्रातः क्लास 10.7.1967
Morning Class dated 10.7.1967
VCD-2533-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.15
Time- 00.01-17.15


प्रातः क्लास चल रहा था - 10.7.1967. सोमवार को पाँचवें पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – यहाँ तो आत्मा आकरके, आत्मा को पढ़ाती है ना। नॉलेजफुल आप समान बनाती है। तुम जानते हो कि हम बहुत नॉलेजफुल बनते हैं। और वो दुनियावालों के पास कोई नॉलेज थोड़ेही है। वो उनकी भक्तिमार्ग की नॉलेज है। पंच तत्वों की नॉलेज है। भौतिकवादी नॉलेज कही जाती है। अनेक प्रकार की नॉलेज होती है उसमें। और वो कमाई के लिए भी कॉलेज होते हैं बच्चे। और शास्त्रों की भी नॉलेज होती है। और इसको जो तुम पढ़ते हो, उसको कहा जाता है एक ही बार ये नॉलेज, रूहानी नॉलेज है। और दुनिया में सब हैं जिस्मानी नॉलेज। इस समय में तुमको रूह बैठकरके रूहों को नॉलेज सुनाती है। ये नई बात हो गई ना बच्ची। कभी भी ऐसे नहीं सुना होगा। ये ड्रामा में है। उन दुनियावालों में तो ये वंडरफुल बात लगेगी। भई, ये ऐसे तो हो नहीं सकता। जो तुम सुनते हो जब फिर रिपीट भी तो तभी होगी। तो तुम बच्चों को मालूम भी नहीं होती है कि नॉलेज तुम बच्चों को बाप कैसे पढ़ाते हैं, ईश्वर पढ़ाते हैं ना। तुम्हारे में भी देखो कोई है, परन्तु पढ़ाई में कितना फर्क है। तो पढ़ाई में रात-दिन का फर्क पड़ जाता है। हँ? यहाँ शूटिंग कैसे होती है? हँ? जो रात-दिन का फर्क पड़ जाता है? हँ? शूटिंग होती है ना। क्या? यहाँ कैसे शूटिंग होती है? अरे, बेसिक में, एडवान्स में शूटिंग हो रही है ना। रात-दिन का फर्क है या नहीं है? है।

तो समझा बाबा रात दिन का फर्क क्यों कहते हैं? कहाँ वो राजा-रानियाँ, वो हाइएस्ट। और कहाँ प्रजा में भी लोएस्ट। प्रजा भी कोई एक तरह की थो़ड़ेही होती है। फर्स्टक्लास प्रजा, सेकण्ड क्लास प्रजा, थर्डक्लास। तो प्रजा में भी कोई लोएस्ट होते हैं। जैसे बाबा कहते हैं ना अगर मेरे को छोड़ा, निन्दा की या छोड़ दिया, या उस तरफ में दुनिया की ओर चला गया तो वहाँ जाकरके अगले जन्मों में चांडाल का जन्म लेंगे। कौन बनते हैं चांडाल? हँ? देते हैं, फिर ले लेते हैं तो चांडाल बनते हैं। तो है ना। अभी वो अक्षर है ना उनका। यानि दुनिया में जो कम से कम पद है वो पाएंगे, अगर छोडेंगे तो। तो कम से कम ऐसे-ऐसे पद होते हैं ना बच्चे। तो देखो, यहाँ तो बाप पढ़ाते हैं। कितनी मार्जिन है पढ़ने में। हँ? क्या ऊँच ते ऊँच। और वो उस पढ़ाई में ऐसे तो नहीं है कि कोई इतना फर्क पड़ जाते। अच्छा, मान लो बैरिस्ट्री में कोई फेल हुआ। तो कोई इतना थोड़ेही नीचे गिर जाएगा। कितना? कि जाके चांडाल बनना पड़े। ना। पढ़ा-लिखा होता है बहुत अच्छा मिलता है। अच्छा मिलेगा। और इसमें तो देखो पढ़ाई बड़ी लम्बी-चौड़ी है। बिल्कुल। हँ? कितनी लम्बी-चौड़ी पढ़ाई है? हँ? अरे, नौ कुरियों के ब्राह्मण बनते हैं ना। तो पढ़ाई भी नंबरवार होगी ना। कहाँ तुम सूर्यवंशी राजाई पाएंगे, चन्द्रवंशी बनेंगे। नहीं बनेंगे तो उनके दास-दासी बनेंगे। नहीं तो प्रजा में जाकर बड़े साहूकार बनेंगे। अच्छा, कम साहूकार बनेंगे। नहीं तो फिर उन साहूकारों में जाकरके दास-दासी बनेंगे।

तो देखो, यहाँ जो राजधानी स्थापन होती है, कितने दर्जे हैं यहाँ। क्योंकि तुम बच्चे जानते हो और बाप ने समझाया है कि बच्चे मैं आता हूँ, यहाँ आकरके जो भविष्य के देवी-देवताएं हैं, ये राजधानी पहले भी थी, डीटी किंग्डम, ये डीटी किंग्डम थी ना। तो ये सभी किंग्डम है ना। ये बौद्धियों की भी किंग्डम है। इस्लामियों की किंग्डम है। सबकी किंग्डम स्थापन हो। और ये सभी हैं इस समय में। और ये भी बच्चे जानते हो कि यहाँ पढ़ाने वाला बाप एक ही है जो यहाँ किंग्डम स्थापन करते हैं। हँ? वो धरमपिताएं आते हैं, कोई किंग्डम स्थापन थोड़ेही करते हैं। बस धर्म स्थापन किया। और यहाँ पुरानी दुनिया में बैठकरके तुमको किंग्डम स्थापन करते हैं। तो लायक बनो, जो नई दुनिया में जाकरके ऊँच पद पाओ। है तो दूसरे जनम में। परन्तु वो नई दुनिया और ये दुनिया तो विनाश हो जाने की है। सब कुछ विनाश हो जावेगा। इसलिए बाप कहते हैं; क्या? कि जल्दी-जल्दी तैयारी करते जाओ। हँ? जल्दी करो, सुस्ती ना करो। गफलत नहीं करो। हँ?

गफलत क्या होती है? हँ? हिन्दी में कहते हैं प्रमाद मत करो। हँ? आज का काम कल के ऊपर टाल दिया। वो भी गफलत कही जाती है। टाइम वेस्ट नहीं करो। क्योंकि टाइम वेस्ट हो जाता है। जितना तुम याद नहीं करते हो तो टाइम वेस्ट हो जाता है। और तुम्हारा तो ये मोस्ट वैल्युबल टाइम है। इसलिए बहुत ज्यादा नुकसान हो जाता है। तुम्हारा मोस्ट वैल्युबल क्यों है? क्योंकि तुम अभी संगमयुग में ही ये पढ़ाई पढ़ते हो। वो पढ़ाईयां तो जन्म-जन्मान्तर चलती चली आई हैं। इसलिए याद की, भले वे धंधे भी करो शरीर निर्वाह अर्थ। कोई मना नहीं है। भले करो। उसके लिए तो बाबा ने टाइम दे दिया। और वो भी बोलते हैं। क्या? कम डे, हँ, कार डे। और दिल यार डे। सच्चे-सच्चे अपन को ऐसे बैठो, बरोबर हम तो आशिक थे आधा कल्प के इस एक माशूक के। अभी जाकरके मिला है। हँ? किनको? उन आशिकों को। और वो कहते हैं; कौन? माशूक। कि मुझे याद करो तो हम तुमको बादशाही दे देंगे।

ये खुदा दोस्त की आखानी सुनी है ना बच्ची। हँ? मुसलमानों में कहते हैं खुदा दोस्त। हँ? हिन्दुओं में किसका दोस्त बताया? हँ? अर्जुन को सखा कहा ना। तो दोस्त हो गया। तो बाबा ऐसी आखानियाँ बहुत सुनाते रहते हैं पुरानी-पुरानी। हँ? तो एक तो खुदा दोस्त की कहानी। हातमताई की कहानी। और? अल्लाह अव्वलदीन की कहानी। और? और भी। अलाउद्दीन का भी नाटक दिखाते हैं। ये सब देखा है? हत तेरे की। तो वो अलाउद्दीन क्या करते हैं? वो ठक्का करते हैं। हँ? तो वो खजाना निकल आता है। हँ? तो तुम बच्चे जानते हो यहाँ कि किसके ऊपर अल्लाह जो अव्वलदीन स्थापन करते हैं; अव्व्ल माने पहले नंबर का धर्म स्थापन करते हैं; क्या नाम है उसका? सत्य सनातन देवी-देवता धर्म। तो वो ठक् तुमको करना है। लेकिन अभी तो ठक्का नहीं करते हैं ना। हँ? दृष्टि से ऐसे देखते हैं ना। तो वो ध्यान में चली जाती है। जैसे वैकुण्ठ में चली गई। ओहो! बैठकरके वैकुण्ठ में डांस करती हैं। कृष्ण के महलों में जैसे बैठे रहते हैं। तो हुआ ना बरोबर जैसे अल्लाह अव्वलदीन। या आदि सनातन देवी-देवता धर्म। अव्वल नंबर धर्म है ना बच्चे। तो इस एक ही धर्म के ऊपर स्थापना की बातों में कितनी नाटक बनाए हुए हैं।

A morning class dated 10.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the fifth page on Monday was - Here, the soul comes and teaches the soul, doesn't it? It makes you knowledgeful, equal to itself. You know that we become very knowledgeful. And those people of the world do not have any knowledge. They have knowledge of the path of Bhakti. They have the knowledge of the five elements. It is called the materialistic knowledge. There is various kind of knowledge in it. And children, there are also colleges for earning income. And there is knowledge of the scriptures as well. And this knowledge which you study is called a one-time knowledge, spiritual knowledge. All others in the world are physical knowledge. At this time the soul sits and narrates the knowledge to the souls. This is the new thing, is not it daughter? You might not have heard about this ever. This is in the drama. Those people of the world would find this to be wonderful. Brother, this cannot be possible at all. Whatever you listen will repeat at the same time. So, you children do not know that how the Father teaches the knowledge to you. God teaches, doesn't He? Even among you there are some, but look there is so much difference between the studies. So, there emerges a difference of day and night in the studies. Hm? How does the shooting take place? Hm? How does the difference of day and night emerge? Hm? Shooting takes place, doesn't it? What? How does the shooting take place here? Arey, shooting is taking place in the basic, in advance, is not it? Is there a difference of day and night or not? There is.

So, did you understand why Baba says that it is a difference of night and day? On the one side are the kings and queens, the highest ones. And on the other side are the lowest even among the subjects (praja). Subjects are also not of one kind. First class praja, second class praja, third class. So, there are some lowest ones even among the praja. For example, Baba says - If you leave me, if you defame Me or leave me or if you go to that side towards the world, then you will get birth as Chaandaals in the future births there. Who become Chaandaals? Hm? Those who give and then take it back, become Chaandaals. So, they are there, aren't they? Now there is that word, is not it? It means that they will get the lowest post in the world if they leave. So, children, the lowest posts are like this, children, aren't they? So, look, the Father teaches here. There is such margin in studies. Hm? What? The highest on high. And in that learning, it is not as if such a vast difference emerges. Achcha, suppose someone fails in Barristry. So, will anyone fall so low? How much? That he goes and becomes Chaandaal. No. If someone is educated, then he gets very good returns. He will get nice returns. And look the learning is very lengthy and broad here. Completely. Hm? How lengthy and broad is the study? Hm? Arey, Brahmins of nine categories get ready, don't they? So, the studies will also be numberwise, will it not be? You will get Suryavanshi kingship; you will become Chandravanshis. If you don't become this, you will become their servants and maids. Otherwise, you will become highly prosperous ones among the subjects. Achcha, they may become less prosperous. Otherwise, they will become servants and maids of those prosperous ones.

So, look the kingdom that gets ready here; there are so many grades here because you children know and the Father has explained that children, I come, I come here and the future deities; this kingdom existed in the past as well. The deity kingdom; this deity kingdom existed, did not it? So, all these are kingdoms, aren't they? There is a kingdom of the Buddhists as well. There is a kingdom of the Islamic people. Everyone's kingdom should be established. And all these exist at this time. And children, you also know that here the Father who teaches is only one, who establishes a kingdom here. Hm? Those founders of religions come; they do not establish a kingdom. They just establish a religion. And here He sits in this old world and establishes a kingdom for you. So, become worthy so that you could achieve a high post in the new world. It is in the next birth. But that is a new world and this old world is going to be destroyed. Everything will be destroyed. This is why the Father says; what? Go on preparing quickly. Hm? Be quick; do not be lazy. Do not commit mistakes. Hm?

What is a mistake (gaflat)? Hm? In Hindi, they say that do not make pramaad (mistake). Hm? You postpone today's task to tomorrow. That is also called a mistake. Do not waste time because time is wasted. The more you don't remember, the more time gets wasted. And this is your most valuable time. This is why you suffer a lot of harm. Why is it most valuable for you? It is because now you study this knowledge only in the Confluence Age. Those studies have been continuing since many births. This is why remembrance; you may do those businesses for sustaining the body. You are not stopped from doing that. You may do. Baba has given time for that. And they also speak. What? Kam de, hm, kaar de. And 'Dil yaar de' (the hands are busy in work and the heart is engrossed in the friend). You should sit truly like this; definitely we were lovers of this beloved since half a Kalpa. Now we have found Him. Hm? Whom? Those lovers. And He says; who? The beloved. That if you remember Me, I will give you the emperorship.

Daughter, you have heard this story of the Khuda Dost (God, the friend), haven't you? Hm? Muslims speak about Khuda Dost. Hm? Among the Hindus, whose friend was He described as? Hm? Arjun was called the friend, wasn't he? So, he became a friend. So, Baba narrates a lot of such old stories. Hm? So, one is the story of the Khuda Dost. The story of Haatamtaai. And? The story of Allah Avvaldeen. And? There are more. The drama of Alauddin is also depicted. Have you seen all this? ... So, what does that Alauddin do? He just hits it [producing a sound of thak]. Hm? So, that treasure comes out. Hm? So, you children know here that Allah, who establishes the number one religion (avvaldeen); He establishes the avval, i.e. number one religion. What is its name? The Satya Sanatan Devi-Devata Dharma. So, you have to hit it. But now you don't create that sound, do you? Hm? He sees through the eyes like this, doesn't he? So, she goes into trance. It is as if she went to heaven (Vaikunth). Oho! She sits and dances in Vaikunth. It is as if they keep on sitting in the palaces of Krishna. So, it is definitely Allah Avvaldeen. Or Aadi Sanatan Devi-Devata Dharma. Children, it is the number one religion, is not it? So, so many dramas have been penned on this one religion, on the topics of establishment.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 31 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2534, दिनांक 31.05.2018
VCD 2534, Date 31.05.2018
रात्रि क्लास 10.7.1967
Night Class dated 10.7.1967
VCD-2534-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.33
Time- 00.01-18.33


आज का रात्रि क्लास है - 10.7.1967. जो-जो मुख से कहा जाता है, फिर करना भी ऐसा ही चाहिए। ऐसा पुरुषार्थ भी करना चाहिए। कथनी और करनी एक होनी चाहिए। पुरुषार्थ क्या है? पुरुषार्थ मुख्य यही है, सबको यही बताना है – ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त। वो है बाबा। और भगवानुवाच है मुझे याद करो। हँ? ऊँचे ते ऊंचा भगवन्त? हँ? ऊँचे ते ऊँचा और नीचे ते नीचा किस दुनिया की बात है? इस दुनिया की बात है। सोलवर्ल्ड में तो कोई ऊँचा, नीचा होता नहीं। और शिव बाप को किसी से टैली नहीं किया जा सकता कि वो किससे ऊँचा है। तो बताया कि शिव बाप जिसमें प्रवेश करते हैं, तब उनको कहा जाता है शिवबाबा। और वो ही है ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त। वो साकार तन में आकर कहते हैं मुझे याद करो क्योंकि पर्सनालिटी तो एक ही है। कहते हैं – मुझे याद करो इसीलिए कि मैं पतित-पावन हूँ। क्या? हँ? पतित-पावन हूँ? एक बात बताओ। पतित या पावन? हँ? निराकार है पावन। जिसमें प्रवेश किया है वो पतित। दोनों के मेल से हुआ पतित-पावन। तो वो भक्त लोग कह देते हैं – पतित-पावन सीता-राम। सीता का नाम क्यों पहले रख देते? हँ? राम का नाम बाद में क्यों? हाँ। क्योंकि पावन है तो सीता है। सीता को दिखाते हैं ना। अग्नि परीक्षा ली गई, आग में डाला गया। जैसे सोना होता है तो शुद्ध सोना को तपाया जाए तो शुद्ध ही बना रहेगा। उसमें खाद तो है ही नहीं।

तो बताया, शिव तो सदाकाल ही एवरप्योर है। बोला कि मैं निराकार ज्योतिबिन्दु हूँ। इसलिए कहता हूँ तुम भी ज्योतिबिन्दु बनो। और फिर मुझे याद करो। तो तुम्हारा ये जो भी पाप है, विकर्म है, वो कट जाएगा। जो जैसे को याद करेंगे वैसे ही बन जाएंगे। तो सभी पाप भस्म हो जाएंगे। तो अभी ये पैगाम हो गया। सभी को ये पैगाम देना है। और जो वास्तव में जो गीता के अक्षर हैं ना उनमें भी कोई ना नहीं है क्योंकि पतित-पावन बाप है और मानते भी हैं। सभी उनको ही बुलाते हैं। हँ? बोलने वाला कौन है? ये सब जो बोला वो किसने बोला? हँ? शिव बाप ने बोला। फिर ऐसे क्यों कहते हैं थर्ड पर्सन के लिए – सभी उनको बुलाते हैं? वो भगवान है। वो। और भगवान के तुम बच्चे हो। बच्चों को कहते हैं कि मुझे याद करो तो तुम्हारा जो ये पाप है जन्म-जन्मान्तर का वो नाश हो जाएगा। पावन बन जाएगा। ये तुम पहले भी पावन थे क्योंकि हमारे बच्चे हो। हँ? हमारे बच्चे? मेरे बच्चे हो या हमारे बच्चे हो? क्योंकि हमारे इसलिए कहा कि कम्बाइन्ड हैं ना। जिसमें प्रवेश किया उसको माता बनाय दिया। प्रवेश करने वाला बाप हो गया। कहते ही हैं उसे परमपुरुष। पुरुष और स्त्री। तो पुरुषों में परमपुरुष किसे कहें? उसे ही कहेंगे शिव बाप को। तो जिसका आधार लेता है दुनिया बनाने के लिए, वसुधैव कुटुम्बकम रचने के लिए उसको माता बनाय देते हैं।

तो शास्त्रों में नाम दिया है परमब्रह्म। वो सन्यासी फिर समझते हैं परमब्रह्म रहने का स्थान, वो, क्या, भगवान का नाम है। अरे, वो तो रहने का स्थान है ना। बाप भी आते हैं। तो जिस तन में प्रवेश करते हैं वो घर हो गया ना। तो शिव बाप का भी घर है। और तुम बच्चों का भी घर है। तो जरूर उस घर में बच्चे हमारे साथ में रहते होंगे। हँ? हमारे माने? दो कम से कम। एक शिव और दूसरा जिसमें प्रवेश किया - शंकर। तो दो हो गए ना। तो जरूर हमारे साथ भी रहते होंगे। कब? जब सारी सृष्टि का विनाश होता है तो। और बच्चे हैं ना बच्चे। बच्चे तो जरूर बाप के साथ रहते होंगे। हँ? तो माता-पिता का यादगार क्या है? यादगार मन्दिर बनाय दिये। जिन्होंने शुरुआत में बनाए थे वो सतोप्रधान बुद्धि थे। वो तो जरुर जानते होंगे। ये जो शिवलिंग है ये क्या है? सोमनाथ मन्दिर में लिंग भी था बड़ा रूप, शरीर की यादगार। और उसमें बिन्दु रूप आत्मा की यादगार हीरा था। तो मात-पिता दोनों हो गए ना। तो बच्चे भी माँ-बाप के पास रहते होंगे।

तो जरूर पावन बाप के साथ पावन बच्चे रहते होंगे ना। हँ? पावन बच्चे कौन हैं जो रहते होंगे? हँ? जो पावन नहीं हैं वो नहीं रहते होंगे। तो किनको कहें पावन? हँ? जरूर बाप के बच्चे हैं। हँ? पावन बच्चे रहते होंगे बाप के साथ तो जरूर उनका भी यादगार होगा ना। हँ? आत्मा शरीर में है तो संग का रंग लगता है। पतित बनती है। आत्मा शरीर से जुदा है तो पावन है। अब शरीर से जुदा, जब जन्म-मरण के चक्कर में आते हैं तो भले शरीर छोडते हैं। लेकिन शरीर से, स्थूल शरीर छोड़ते हैं। बाकि सूक्ष्म शरीर तो साथ में रहता है ना। तो ये कबकी बात है कि जरूर बच्चे बाप के साथ रहते होंगे? हँ? और कौनसे बच्चों की बात है? जो बच्चे, उन बच्चों की यादगार ही है शालिग्राम। या तो रुद्राक्ष के मणके।

तो वो जरुर तुमने पहले-पहले जनम लिया है। क्या? पहले-पहले माने? सतयुग के एकदम आदि में जनम लिया है। और तुमने 84 जनम भोगे हैं। हिसाब देखो कितना सहज है। और फिर यहाँ रावण के राज्य में पतित बन गए। क्यों? हँ? रावण के राज्य में फिर भक्ति भी आ जाती है। तो उन भक्तों को पतित क्यों कहा? हँ? भक्ति कहाँ से आती है? कहते हैं रावण से आती है। तो रावण को अनेक सिर दिखाय दिये। इसका मतलब जो भक्त होते हैं वो एक की मत पर नहीं चलते हैं। जो जिसने जैसा सुनाय दिया सत वचन महाराज। सबकी बातों में आते रहते हैं तो पतित बनते रहते हैं। तो बात क्या हुई? कि एक से पावन और अनेक से? पतित। और फिर भी देखो भक्ति में लोग नाचते कितना हैं। हँ? मनुष्य नाच नाचते हैं ना। और एक प्रकार का नाच नहीं करते हैं। अनेक प्रकार के नाच। हँ?

देखो, अगर बड़े दिन आते हैं, मान लो दीपमाला आती है देखो, हमारे बच्चे, जो व्यापारी हैं, उनको बड़ी तकलीफ होती होगी क्योंकि व्यापारी हैं और जरूर लक्ष्मी पूजा कराते हैं। ब्राह्मणों को बुलाय कर-करके पूजा कराते हैं ना। ठीक है ना। ये क्यों खयाल आया आज लक्ष्मी का, जो वो लक्ष्मी के आने से पहले सफाई कराते हैं? हँ? क्या? क्यों सफाई कराते हैं? हँ? क्योंकि लक्ष्मी है पवित्र। तो कीड़े-मकोडों की तो सफाई होनी चाहिए। हँ? और सफाई करने वाला भी कोई होगा। तो किससे सफाई कराते हैं? हँ? कहते हैं महाकाली आके सफाई करती है। तो जब सारी सफाई हो जाती है तब लक्ष्मी का आवाहन करते हैं। हम लोग उस दिन सफाई नहीं करते हैं। खुद नहीं करते हैं, कराते हैं। क्या मतलब? हम लोग माने कौन लोग? हँ? जो इस दुनिया में रहकरके अच्छा पुरुषार्थ करते हैं, और आने वाली दुनिया में ऊँच पद पाने वाले हैं, वो थोड़ेही सफाई करते होंगे। तो कराते हैं। मान लो विश्व का मालिक होगा तो खुद सफाई करेगा? फिर क्या करेगा? हँ? अरे, किसी को बुलाएगा क्या? हँ? किसको? हाँ। यज्ञ के आदि में भी तो किसी को बुलाया था। कोई आई थी कि नहीं? आई थी। फिर उसके परिवार वालों ने बड़ा हंगामा मचाया, उसको ले गए। तो देखो, दीपावली में भीड़-भीड़ बहुत होती है। और कोई सफाई करने के लिए आते भी नहीं हैं। सफाई करने वाले मनुष्य मिलते नहीं हैं। और वो तो पीछे कराय लेते हैं। कभी भी करावें। परन्तु इनको तो भक्तिमार्ग के लिए पोची, वगैरा, दुकान की भी सफाई वगैरा करनी होती है। तो ऐसे व्यापारी तो बाबा के पास बहुत आते हैं।

Today's night class is dated 10.7.1967. Whatever you say through your mouth, you should also do accordingly. You should also make such purusharth. The words and actions should be the same. What is the purusharth? The main purusharth itself is that you should tell everyone - the highest on high God. He is Baba. And God says - Remember Me. Hm? Highest on high God? Hm? Highest on high and lowest on low is about which world? It is about this world. Nobody is high or low in the Soul World. And Father Shiv cannot be tallied with anyone that He is higher than whom? So, it was told that the one in whom Father Shiv enters, then he is called ShivBaba. And he himself is the highest on high God (Bhagwant). He comes in a corporeal body and says - Remember Me because the personality is only one. He says - Remember Me because I am the purifier of the sinful ones. What? Hm? Am I the purifier of the sinful ones? Tell one thing. Sinful or pure? Hm? The incorporeal one is pure. The one in whom He has entered is sinful. The combination of both is the purifier of the sinful ones. So, those devotees say - Patit-paavan Sita-Ram. Why is Sita's name placed first? Hm? Why is Ram's name placed afterwards? Yes. Because when she is pure, she is Sita. Sita is depicted, is not she? She had to pass through the fire test. She was put in fire. For example, if the gold is pure, when it is heated, then it will remain pure. There is no alloy in it at all.

So, it was told that Shiv is forever ever pure. It was told that I am an incorporeal point of light. This is why I tell you - You too become points of light. And then remember Me. Then your sins, sinful actions will be burnt. You will become like the one whom you remember. So, all your sins will be burnt. So, now this is the message. You have to give this message to everyone. And actually the words of the Gita are not wrong because the Father is purifier of the sinful ones and people also believe so. Everyone calls Him only. Hm? Who is the speaker? Who spoke all these words? Hm? Father Shiv said. Then why is it said for a third person that everyone calls Him? He is God. He. And you are the children of God. He tells the children that if you remember Me, then your sins of many births will be burnt. You will become pure. You were pure in the past also because you are our children (hamaarey bachchey). Hm? Are you My children (merey bachchey) or our children? It was said 'our' because they are combined, aren't they? The one in whom He entered was made the mother. The one who entered became the Father. He is called the Parampurush. Purush (male) and stree (female). So, who will be called the Parampurush among the males (purush)? He alone will be called, the Father Shiv. So, the one whose support He takes to make the world, to create the vasudhaiv kutumbkam (one world family), He makes him the mother.

So, the name Parambrahm has been mentioned in the scriptures. Those Sanyasis then think that Parambrahm is the place of residence, no, the name of God. Arey, it is the place of residence, is not it? The Father also comes. So, the body in which He enters happens to be the home, is not it? So, it is the home of Father Shiv also. And it is the home of you children also. So, definitely the children must be living with us (hamaarey saath) in that home. Hm? What is meant by hamaarey? At least two. One is Shiv and the other is the one in whom He entered - Shankar. So, they are two, aren't they? So, definitely they must be living with us. When? It is when the entire world is destroyed. And children are children, aren't they? Children must be definitely living with the Father. Hm? So, what is the memorial of the Mother and the Father? Memorial temples have been built. Those who had built in the beginning had a satopradhan intellect. So, definitely they must be aware. What is this Shivling? In the temple of Somnath, there was a ling also, the big form, the memorial of the body. And there was a memorial diamond of the point-like soul in it. So, there are both mother and Father, aren't they? So, children also must be living with the mother and Father.

So, definitely, pure children must be living with the pure Father, do they not? Hm? Who are the pure children, who might be living [with the pure Father]? Hm? Those who are not pure must not be living. So, who will be called pure? Hm? Definitely they are the Father's children. Hm? The pure children must be living with the Father; so, definitely there must be their memorial as well, will there not be? Hm? When the soul is in the body, then the colour of company is applied. The soul becomes sinful. When the soul is separate from the body, then it is pure. Well, separate from the body; when you pass through the cycle of birth and death, then although you leave the body, yet you leave the physical body. But the subtle body remains with you, doesn't it? So, it is about which time that definitely the children must be living with the Father? Hm? And it is about which children? It is about those children, whose memorial is the shaligram. Or the beads of Rudraksh.

So, you have definitely been born first of all. What? What does first of all mean? You have been born at the very beginning of the Golden Age. And you have experienced 84 births. Look the account is so simple. And then here you have become sinful in the kingdom of Ravan. Why? Hm? Then Bhakti is also included in the kingdom of Ravan. So, why were those devotees called sinful? Hm? Where does Bhakti come from? It is said that it comes from Ravan. So, many heads have been shown for Ravan. It means that the devotees do not follow the opinion of one. Whatever any one narrates, they believe it to be the gospel truth (sat vachan maharaj). When they keep on getting influenced by everyone's versions, then they keep on becoming sinful. So, what is the topic? That you become pure through one and through many? You become sinful. And yet, look people dance so much in Bhakti. Hm? People dance, don't they? And they do not perform one kind of dance. Many kinds of dances. Hm?

Look, when the big days (festivals) arrive, suppose Deepmala (the festival of lights) arrives, look, our children, who are businessmen must be facing a lot of difficulty because they are businessmen and they definitely organize worship of Lakshmi. They call the Brahmins and get the process of worship completed through them, don't they? It is correct, is not it? Why did the thought of Lakshmi occur today that cleaning is got done before the arrival of Lakshmi? Hm? What? Why is cleaning got done? Hm? It is because Lakshmi is pure. So, the worms and insects should be cleaned. Hm? And there must also be someone who undertakes the cleaning. So, through whom is the cleaning got done? Hm? It is said that Mahakali comes and undertakes cleaning. So, when the entire cleaning is completed, then Lakshmi is invoked. We people do not undertake cleaning on that day [of Deepawali]. We people do not do it ourselves, we get it done. What does it mean? 'We people' refers to which people? Hm? Those who live in this world and make good purusharth and are going to achieve a high post in the forthcoming world, do not undertake the cleaning. So, they get it done. Suppose, it is the master of the world. Will he undertake the cleaning himself? Then what will he do? Hm? Arey, will he call someone? Hm? Whom? Yes. Even in the beginning of the Yagya, someone was called. Did any lady come or not? She had come. Then her family members created a big uproar; they took her away. So, look, a lot of crowd gathers in Deepawali. And nobody comes to clean. It is hard to find people who clean. And they get it done afterwards. They may get it done at any time. But these people have to get the floor mopped, get the shops cleaned for the path of Bhakti. So, many such businessmen come to Baba.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 01 Apr 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2535, दिनांक 01.06.2018
VCD 2535, Date 01.06.2018
रात्रि क्लास 10.7.1967
Night Class dated 10.7.1967
VCD-2535-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.20
Time- 00.01-17.20


रात्रि क्लास चल रहा था – 10 जुलाई, 1967. तीसरे पेज के मध्य में बात चल रही थी –कोई बच्चे, बात होती है, जिसमें थोड़ा सा भी संशय होता है, मुंझते हो, फट से बाबा को लिख देना चाहिए। नहीं तो कोई न कोई भूल कर देते हैं। ऐसा उल्टा काम कर देते हैं। कहाँ जाते हैं पार्टी में, आफीसर हैं, कोई बड़े आफीसरों की पार्टी में जाते हैं, तो अगर कह देते हैं, हम नहीं खाते हैं बाहर की चीज़, फलाने की बनाई हुई चीज़, तो बोलते हैं अच्छा मिठाई खा लो। जी, हम दूसरे के हाथ का बना हुआ नहीं खाते हैं। तो फिर क्या, वो लोग इन्सल्ट समझते हैं। अरे, हम कोई मेहतर हैं क्या? हँ? कोई नीची जाति के हैं हम क्या? तो कोई-कोई की नौकरी भी हाथ से निकल जाती है। समझा? हँ। एक दो दफा मनुष्यों ने अपनी गुमाय दी है नौकरी। वो उन आफीसरों को गुस्सा आ जाता है। तो कोई न कोई युक्ति निकाल करके, कोई न कोई एलिगेशन लगाके उनको डिसमिस कर दिया। या डिसमिस कराय दिया।

तो देखो, पार्टी वार्टी में जाते हैं बाबा से पूछ के नहीं जाते हैं ना। बाबा तो कहते हैं कदम-कदम पर श्रीमत लेना है। तो अपनी अकल नहीं चलती, अपनी मत काम नहीं करती है तो बाबा से पूछना चाहिए। बाबा इस हालत में मुझे क्या करना है? एडवांस में ही ये बच्चों को सबको मालूम है कि हमारी नौकरी में ये, ये काम करने होते हैं। तभी बाबा इन बच्चों को बोलते हैं कि बच्चों, जो कुछ भी तुमको कोई तकलीफ होनी पड़े या कहाँ आना-जाना पड़े या कोई आफीसर के यहाँ खाना पड़े, तो बाबा से पूछ के जाओ क्योंकि हरेक जानते हैं बच्चे कि सर्विस में हमको ये, ये बातें होंगी। तो चलो पूछ लो। ऐसा न हो कि कोई वक्त में कुछ हम उल्टा-सुल्टा कर लेवें। आजकल तो बहुत ही ऐसे उल्टे काम करते हैं। सर्विस में रिश्वत-विश्वत बहुत चलती है। नहीं लेवें, लाइन ही रिश्वतों की रहती है। आफिस में सारे ही रिश्वतखोर होते हैं। एकदम रिश्वतखोरी है। है ना। स्टेशन मास्टर से लेकरके... दास-दासी हैं, घर के नौकर हैं, उनके बड़े-बड़े आफीसरों के, मंत्रियों के, उनके तक जो भी हैं, वो सब एक-दूसरे को आपस में बांट करके खा लेते हैं। तो ऐसे बहुत डिपार्टमेन्ट हैं। लाइन लगी रहती है। आपस में बांट लेते हैं नंबरवार। जिसका जितना ऊँचा पद उतना पैसा उनको हिस्से में दे देंगे ओहदे के अनुसार। समझा ना। जिसका ओहदा बड़ा तो उनको रिश्वत भी जास्ती देनी पड़े। वो उनका हिस्सा मिल जाता है। 10.7.1967 की वाणी का चौथा पेज। रात्रि क्लास। तो कम ओहदा है तो कम। अरे, ब्राह्मण परिवार में शूटिंग में, अकल ही नहीं चल रही है कैसे चल रही है। हँ? उनको मान-मर्तबा ज्यादा देना पड़ता है कि नहीं? हँ? नहीं देना पड़ता है? फिर? लल्लो-चप्पो करो, ज्ञान की बातें उन्हें सुनाओ। ज्ञान की बातें सारी उनके ऊपर लागू करो। तो कम ओहदा है तो कम देना पड़े। उससे कम ओहदा है तो उससे कम देना पड़े।

तो बच्चे यहाँ खिटपिट बहुत है। कहाँ? यहाँ माने कहाँ? हँ? क्यों बताया यहाँ? यहाँ माना प्रजातंत्र राज्य में। प्रजातंत्र राज्य कहाँ से आया? प्रजा से आया ना। पहले कौनसा राज्य था, तंत्र था? हँ? प्रजातंत्र राज्य तो अब आया हिस्ट्री में, लास्ट में। हँ? ये राजतंत्र कहाँ से आया? जो हिस्ट्री में दो-ढ़ाई हज़ार साल से लगातार राजाओं का राज्य रहा। वो राजतंत्र कहाँ से आया? अरे, कहाँ से आया? हँ? बाबा ने बनाया? तो बाबातंत्र होना चाहिए। हँ? प्रजा ने बनाया तो प्रजातंत्र। अब बाबा ने बनाया तो बाबातंत्र होना चाहिए। अरे, राजतंत्र है ना। तो किसने बनाया? हँ? क्या लिखाया, सिखाया? भगवान ने बनाया? तो भगवानतंत्र होना चाहिए। लक्ष्मी-नारायण? तो लक्ष्मी-नारायण तंत्र होना चाहिए। अरे! राजतंत्र तो राजयोग से आया ना। कहाँ से आया? कोई योगी हुआ होगा ना। क्या? तो बड़े ते बड़ा योगी होगा ना। तो क्या किया होगा उसने? हँ? वशीकरण मंत्र फेंका होगा। हँ? जो भी सामने आए, सामने न आए, बुद्धि में आए, मन में आए, बैठे-बैठाए सबको वशीकरण मंत्र दे, वशीभूत कर ले। तो ये हुआ राजयोग विद्या। हँ? गुह्यात् गुह्यतरम् ज्ञानम्।

सबकी समझ में तो नहीं आएगा। हँ? सबकी माने? और प्रजा की समझ में नहीं आएगा? हँ? हाँ, प्रजा की समझ में आ जाए तो फिर प्रजा वाले भी राजा बन जाएं। तो प्रजा को तो कभी राजाई मिली नहीं। तो क्या करती है? वो लास्ट में प्रजा वाली आत्माएं जो उनमें बड़े-बड़े साहूकार होते हैं प्रजा में, तो वो अपनी राजाई चलाते हैं। फिर उनकी राजाई का नाम क्या दिया शास्त्रों में? हँ? उनकी राजाई का नाम दिया है धृतराष्ट्र की राजाई। क्या? राष्ट्र माने धन संपत्ति। हँ? राज्य की सारी धन-संपत्ति जिन्होंने चालाकी से हड़प करके रख ली। क्या? ये जो आज की दुनिया में कोई पसीने की कमाई से अरबपति, करोड़पति बनता है? हँ? चालाकी से बनते हैं या पसीने की कमाई से बनते हैं? हँ? तो ये जो बनते हैं ना बड़े-बड़े पूंजीपति, ये जो प्रजातंत्र तैयार होता है ना सरकार का, तो वोटिंग के टाइम पर खूब पैसा बांटते हैं। हँ? जो ज्यादा एलेक्शन लड़ने के लिए ज्यादा खर्च करेगा, खूब एडवरटाइज़मेन्ट करेगा तो प्रजा उससे प्रभावित हो जाती है। प्रजा का मतलब ही है प्रभावित होने वाली।

तो देखो, यहाँ इस प्रजातंत्र शासन में बहुत खिटपिट है। तो हरेक बच्चे को कहाँ कोई आफत ना आ जाए तो बाबा को चिंता रहती है। तो बाबा से पूछ सकते हैं। बाबा कहते हैं मैं आया हूँ तुम बच्चों को रास्ता बताने के लिए। क्या? कि इस प्रजातंत्र शासन में भी जो धृतराष्ट्रों का शासन चल रहा है पूंजीपतियों का तो उनकी तिकडम से बचने के लिए कैसे चलना चाहिए, वो रास्ता बताऊँगा। अरे, तुम तो मांगते ही हो कि बाबा हम पतित से पावन कैसे बनें? वो तो तुमको बिल्कुल ही सहज बताय देते हैं। क्या करो? हँ? मीठे बच्चे, अपन को आत्मा समझ बाप को याद करो। क्या? वो प्रजातंत्र शासन में बड़े-बड़े आफीसर हैं, बड़े-बड़े मिनिस्टर हैं, उल्टे-पल्टे काम करके तुमको तंग करते हैं। तुम परेशान हो जाओगे, हँ, तो ऐसे नहीं उनकी लल्लो-चप्पो करते फिरो। क्या करो? अपन को आत्मा समझ बाप को याद करो। वो तुम्हारी कठिनाइ को दूर नहीं करेंगे। क्या? वो तो जो भी हिस्ट्री है मनुष्यों के पास उस हिस्ट्री में सब, सबके सब आधीन बनाने वाले आए ना दुनिया में। किसी ने स्वाधीन बनाया क्या? स्व माने ही आत्मा। तो ये तो बाबा है। स्वाधीन बनाने की तरकीब सिखाता है। तो स्व को पहचानो। स्व माने मैं कौन? हँ? स्व माने आत्मा। तो आत्मा का स्वरूप जानना चाहिए। क्या हूँ? कैसे हूँ? हँ? आत्मा कैसी हूँ? कछुए जैसी हूँ, चींटी जैसी हूँ, हाथी जैसी हूँ, कैसी हूँ? बिन्दी। बिन्दी दिखाई नहीं पड़ती। हँ? अरे, दिखाई नहीं पड़ती तो ये औरतें माथे पे बिन्दी कहाँ से लगा ले रही हैं? हँ? कभी तो अनुभूति हुई होगी ना किसी को। तो बिन्दी लगाना शुरु किया।

खैर बाप तो बताय देते हैं तुम इतनी बड़ी देह, दुंब नहीं हो, हँ, तुम तो अविनाशी चीज़ हो। देह तो विनाशी है। तो अपन को ज्योतिबिन्दु आत्मा समझो। दिखाई नहीं देती। इसीलिए कि अति सूक्ष्म ज्योति है। क्या? इसलिए प्रैक्टिस करनी पड़े। हँ? कहते हैं ना प्रैक्टिस मेक्स ए मैन परफेक्ट। तो याद करते-करते वो सूक्ष्म स्टार भी याद आएगा। हँ? फिर अपनी आत्मा को जब याद करेंगे तो आत्माओं का बाप भी याद आएगा। तो ऐसे करेंगे तो तुम्हारी आत्मा में जो जन्म-जन्मान्तर की पापों की, विकर्मों की कट चढ़ी हुई है, हँ, संग का रंग लगा हुआ है, तो वो कट उतर जावेगी। क्यों उतर जावेगी? कारण क्या? कोई कारण हो। बिना कारण के काम होता है क्या? क्या कारण? क्योंकि हम जिस बाबा को याद करेंगे वो बाबा में कोई कट नहीं रहती फिर। क्या? वो हमारा बाप है ना। तो वो बाप ज्यादा पावरफुल है बच्चों के मुकाबले या कम पावरफुल है? ज्यादा पावरफुल है। तो उसकी, उसकी प्रैक्टिस भी तो ज्यादा होगी ना। तो उसकी सूक्ष्म स्टेज को हम प्राप्त करें तो याद करना पड़े। संग का रंग तभी तो लगेगा। हँ? तो राय देते हैं। क्या? अपन को आत्मा समझ बाप को याद करो। क्योंकि राय भी, हँ, कौन देगा? राय भी तो पतित-पावन ही देंगे ना। हँ? कि कोई पतित देगा? पावन बनने की राय कोई पतित देगा या पतित-पावन देंगे? पतित-पावन देंगे ना।

A night class dated 10th July, 1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the third page was - Children, if you have a little doubt or confusion in any topic, then you should immediately write to Baba. Otherwise, you commit one or the other mistake. You perform such opposite task. If you go somewhere in the party; there are officers; you go to the party of a big officers, so, if you say that we don't eat any outside food, anything cooked by such and such person, then they say, okay, you can have sweets. Sir, we don't eat food cooked by others. Then what? Those people feel insulted. Arey, are we mehtars (people belonging to the lowermost caste among the Hindus)? Hm? Do we belong to a lower caste? So, some people even lose their job. Did you understand? Hm. One or two times, people have lost their jobs. Those officers feel angry. So, they employ one or the other tact, they make one or the other allegation and dismiss them [from job]. Or they get them dismissed.

So, look, when you go to the parties, you don't ask Baba and go, do you? Baba says - You should seek Shrimat at every step. So, when your intellect doesn't work, when your wisdom doesn’t work, then you should ask Baba. Baba, what should I do in this condition? In advance [party] itself children know everything that they have to do such and such works in their job. That is why Baba tells these children that, children, whatever difficulty you face or wherever you have to go or if you have to eat at any Officer's place, then ask Baba and go because every child knows that we have to face such and such things during service (job). So, okay, you can ask. It should not be that you perform any opposite task at any time. Now-a-days you perform many such opposite tasks. Lots of bribes are paid in service. One may not take, but the line itself is of bribes. All are bribe-seekers in office. There is complete bribery. It is there, is not it? From the station master to ... there are servants and maids, servants at homes of those big officers, ministers and all those upto that level, they all share the bribe. So, there are many such departments. There is a big line. They share amongst each other numberwise. The higher the post the more the amount they are given in their share as per their post. Did you understand? If the post is high, then they will have to be paid a bigger bribe. They get their share. Fourth page of the Vani dated 10.7. 1967. Night class. So, if the post is lower, then the amount is less. Arey, your intellect doesn't work at all as to how the shooting is going on in the Brahmin family. Hm? Do they have to be given more respect and position or not? Hm? Don't they have to be given? Then? Butter them; narrate the topics of knowledge to them. Apply all the topics of knowledge on them. So, if the post is less, then they have to be given lesser value. If the post is still lower, then they have to be given lesser value.

So, children, there is a lot of disturbance here. Where? Here refers to which place? Why was it told 'here'? 'Here' means 'in the democratic rule'. Where did the democratic rule (prajaatantra raajya) start? It started from the subjects (praja), did not it? Which rule, system existed earlier? Hm? Democratic rule has come now in the history, in the last. Hm? Where did the monarchy (raajtantra) come from? There was a continuous rule of kings in the history since two or two and a half thousand years. Where did that monarchy come from? Arey, where did it come from? Hm? Did Baba create it? So, it should be Babatantra. Hm? When the subjects (praja) created it, it was called prajaatantra (democracy). Now, if Baba has created it, then it should be Babatantra. Arey, it is raajtantra, is not it? So, who created it? Hm? What were you made to write, what were you taught? Did God (Bhagwaan) create? So, it should be Bhagwaantantra. Lakshmi-Narayan? Then it should be Lakshmi-Narayan tantra. Arey! Monarchy (raajtantra) came from rajyog, did not it? Where did it come from? There must have been a yogi, is not it? What? So, he must have been the biggest yogi, was he not? So, what would he have done? Hm? He must have used the Vashikaran mantra. Hm? Whoever comes in front of him, he may not come in front, he may come in the intellect, he may come in the mind, he may give Vashikaran mantra while sitting, he should control. So, this is called the art of Rajyog. Hm? Guhyaat guhyataram gyaanam.

It will not be understood by everyone. Hm? What is meant by everyone? And will it not be understood by the subjects (praja)? Hm? Yes, if it is understood by the subjects, then the subjects will also become kings. The subjects never got kingship. So, what does it do? The souls of subjects which come in the last, among them some are very prosperous ones; so, they start their own kingships. Then, what is the name assigned to their kingships in the scriptures? Hm? Their kingship has been named as the kingship of Dhritrashtra. What? Raashtra means wealth and property. Hm? Those who cleverly usurped the entire wealth and property of the kingdom. What? Does anyone become millionaire, billionaire through hard-earned money in the world today? Hm? Do they become through deceit or through hard earned money? Hm? So, those who become big capitalists distribute a lot of money at the time of voting when the democracy (prajatantra) of the government gets ready. Hm? The more someone spends money to fight elections, the more advertisement someone does, the more the subjects (praja) are influenced. Praja itself means those who are influenced (prabhaavit honay waali).

So, look, there is a lot of disturbance in this democratic rule. So, Baba worries lest any child faces any difficulty. So, you can ask Baba. Baba says - I have come to show the path to you children. What? In this democratic rule also the rule of Dhritrashtras or capitalists which is going on, I will tell you how to act to avoid their manoeuvrings (tikdam). Arey, the only thing you want from Baba is to how you can become pure from sinful? He tells you in a completely simple manner. What should you do? Hm? Sweet children, consider yourself to be a soul and remember the Father. What? There are big officers, big ministers in that democratic rule; they perform inappropriate tasks and trouble you. You will be disturbed, hm, so, it is not as if you keep on buttering them. What should you do? Consider yourself to be a soul and remember the Father. They will not remove your difficulties. What? In the history available with human beings, in that history, all those who came in the world made others subservient. Did anyone make you independent (swaadheen)? Swa itself means soul. So, this is Baba. He teaches you to become independent. So, recognize the self. Swa means 'who am I'? Hm? Swa means soul. So, you should recognize the form of the soul. What am I? How am I? Hm? What kind of a soul am I? Am I like a tortoise, am I like an ant, am I like an elephant? How am I? A point. The point is not visible. Hm? Arey, if it is not visible, then why do these [Indian] ladies apply bindi on their foreheads? Hm? Someone must have experienced at some point in time. So, they started applying bindi.

Anyways, the Father tells that you are not this big body, the tail, hm, you are an imperishable thing. The body is perishable. So, consider yourself to be a point of light soul. It is not visible because it is very minute light. What? This is why you have to practice. Hm? It is said that practice makes a man perfect. So, while remembering that subtle star will also come to the mind. Hm? Then, when you will remember your soul, then the Father of souls will also come to the mind. So, if you do like this, then your soul is covered by the rust of sins, sinful actions since many births, hm, you have been coloured by the company, so that rust will be removed. Why will it be removed? What is the reason? There should be a reason. Is any task performed without any reason? What is the reason? It is because if we remember Baba, then there does not remain any rust on that Baba. What? He is our Father, is not He? So, is that Father more powerful when compared to the children or is he less powerful? He is more powerful. So, his practice will also be more, will it not be? So, if we want to achieve his subtle stage, then we have to remember. The colour of company is applied only then. Hm? So, an advice is given. What? Consider yourself to be a soul and remember the Father because who will give the advice as well? It is the purifier of the sinful ones (patit-paavan) who will give the advice also, will he not? Hm? Or will any sinful one give? Will the advice of becoming pure be given by any sinful one or by the purifier of the sinful ones? The purifier of the sinful ones will give, will He not?
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 03 Apr 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2536, दिनांक 02.06.2018
VCD 2536, Date 02.06.2018
प्रातः क्लास 11.7.1967
Morning Class dated 11.7.1967
VCD-2536-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.58
Time- 00.01-16.58


आज का प्रातः क्लास है - 11.7.1967. मंगलवार को रिकार्ड चला था – रात के राही थक मत जाना। सुबह की मंजिल दूर नहीं है। दुनिया में तो भक्तिमार्ग में तीर्थ यात्राएं करने जाते हैं। पैदल भी करते हैं। तो रात में यात्रा थोड़े ही करते हैं। वो तो दिन में करते हैं। हँ? फिर ये रिकार्ड क्यों चलाया गया? क्योंकि वो अपन को ये थोड़ेही समझते हैं कि हम आत्मा अज्ञान अंधेरे में चल रहे हैं। हमारी जो मंजिल है वो ही उनको पता नहीं है कि मंजिल क्या है। तो वो रोज़ मंजिल बदलती रहती है। चार धाम की यात्रा करेंगे, अमरनाथ की यात्रा करेंगे, कैलाश की यात्रा करेंगे। हैं तो वास्तव में रात के ही राही। अभी यहाँ शूटिंग होती है। तो यहाँ रात के राही कैसे? हँ? यहाँ तो ज्ञान मिल गया ना। रोशनी में आ गए। हँ? तो यहाँ ये कैसे लागू होगा? हँ? रिकार्ड चलाया है तो इसका अर्थ तो होगा ही। क्योंकि जो भी बाबा का ज्ञान समझ लेते हैं आत्मा, परमात्मा, सृष्टि चक्र का, तो जानते हैं कि हमारी आत्मा की जो यात्रा है वो यात्रा दिन की है या रात की है? हँ? किस समय की असली यात्रा है? तीखी यात्रा कब होती है? रात को होती है क्योंकि रात को कोई धंधा-धोरी नहीं होता है। बस बैठकरके आत्मा को याद करो, आत्मा के बाप को याद करो। तो; तो भी बच्चे थकान महसूस करते हैं। हँ? बार-बार थकान होती है तो नींद आती है।

तो बोला रात के राही थक मत जाना। सुबह की मंजिल दूर नहीं। कौनसी सुबह की मंजिल? सतयुग रूपी सवेरा आया कि आया। कौनसा सतयुग रूपी सवेरा? हँ? जब 16 कला संपूर्ण कृष्ण होता है वहाँ की बात? नहीं। वैकुण्ठ की बात है जहाँ 16 कला संपूर्ण से भी ऊँचा सुख है। अतीन्द्रिय सुख। सतयुग में देवताएं फिर भी इन्द्रियों का सुख भोगेंगे। हँ? इन्द्रियां नीचे या मन-बुद्धि नीचे? मन-बुद्धि नीचे थोड़ेही है। न मन-बुद्धि; मन तो सारी इन्द्रियों के ऊपर कंट्रोल करता है। तो जो मन-बुद्धि के वायब्रेशन का सुख है, वो तो सबसे ऊँचा है। वो मंजिल अभी मिल गई है कि मिलनी है? हँ? अतीन्द्रिय सुख लेने वाली मंजिल। वो मंजिल मिल जाएगी तो इन्द्रियों का सुख तो किसी काम का नहीं भासेगा। हं? किसी को मानसरोवर में स्नान करने के लिए मिल जाए तो गड्ढे-गढीचियों में क्यों स्नान करेगा? तो मंजिल दूर है या नज़दीक महसूस हो रही है? हँ? क्या हो रहा है?
(किसी ने कुछ कहा।) दूर है? हँ? ऐसे क्यों कहते हो? हँ? बताओ। 80 साल बीत गए। जैसे और धरमपिताएं 100 साल में ज्यादा से ज्यादा अपना धर्म स्थापन कर लेते हैं। तो शिव बाबा भी आकरके 100 साल में अपना धर्म स्थापन करते हैं। 80 साल बीत गए। अभी भी मंजिल दूर है? हँ? कभी-कभी बाबा को मुरली चलाते समय गुस्सा आ जाता है। शरम नहीं आती है? ऐसे-ऐसे बोलते रहते हैं।

ओमशान्ति। जीवात्मा बाप बैठ करके समझाते हैं। ये क्या कहा? हँ? कौन है जीवात्मा? किसके लिए बोला? हँ? जीवात्मा बाप कौन? अरे! इसमें भी सोचने की बात है? हँ? हाँ। जो जीवन में आ जाए तो जीवात्मा। चैतन्य। चैतन्य की परिभाषा बताई मुरली में। बोलते-चालते को चैतन्य कहा जाता है। तो जीवात्मा बाप जिसे कहा वो ऐसे नहीं कि परमधाम में बैठा हुआ है। बुद्धि से तो सदैव परमधाम में रहता है लेकिन अभी तो शरीर में आया हुआ है ना। तो बताया कि वो भी जीवात्मा है। वो बैठकरके बच्चों को समझाते हैं। हँ? काहे में बैठकरके? हँ? इस शरीर में बैठकरके समझाते हैं। हँ? दादा लेखराज ब्रह्मा के शरीर में बैठकरके समझाते हैं? कि सिर्फ सुनाते हैं? हँ? हाँ। दादा लेखराज का जो तन है वो तो है ही आखरी ब्रह्मा। नंबरवार सभी ब्रह्मा नामधारियों ने अपना पार्ट बजाय लिया क्योंकि एक ब्रह्मा तो है नहीं। हँ? चित्र बनाए हुए हैं। चित्र चरित्र की यादगार होते हैं ना। जैसे रावण का चित्र बनाते हैं 10 सिरों वाला। तो कोई चरित्र करने वाले हुए हैं ना 10 धरमपिताएं खास। हँ? तो वो इकट्ठे हो जाते हैं प्रजा के ऊपर प्रजा का राज्य चलाने के लिए। प्रजातंत्र राज्य। कहते हम अपना राज्य चलाएंगे। क्या? अब हम राजाई करेंगे; हम कंट्रोल में करेंगे दुनिया को।

तो बाप समझाते हैं कि मनुष्य मनुष्य को राजाई नहीं सिखा सकता। ये राजाई सिखाने का काम तो एक ही शिवबाबा का है। उसमें भी जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं, उसके द्वारा सुप्रीम टीचर बनकरके समझाते भी हैं। बाकि तो ब्रह्मा नामधारी तो हैं। उनमें प्रवेश करते हैं तो उनका नाम ब्रह्मा तो पड़ता है लेकिन वो सिर्फ क्या करते हैं? सुनाते हैं। गहराई से बात को समझाते नहीं हैं। तो समझाने वाली बात कहीं आई है शास्त्रों में कि विस्तारपूर्वक गहराई से समझाया हो? हँ? नहीं आई? ओहो।
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, सांख्ययोग की बात आई। हँ? गीता में भी नाम आया है – सांख्ययोगौ पृथक बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। (गीता 5/4) जैसे आजकल ब्राह्मण समझते हैं ना, एडवांस के ब्राह्मण समझते हैं बेसिक नॉलेज अलग है; हँ? और एडवांस ज्ञान? अलग है। तो पहले कोई नया जिज्ञासु आएगा तो उसको बेसिक ज्ञान देंगे। दो-चार महीने तो बर्बाद कर देंगे। फिर एडवांस ज्ञान देंगे। अरे! क्या अलग-अलग ज्ञान है? हँ? अरे, ज्ञान तो एक ही है। हाँ, ये है देहधारी धरमगुरुओं ने उसमें अपनी मनमत मिक्स करके उसे नीची कोटि का बनाय दिया तो बेसिक नॉलेज ही रह गई। जो ईश्वर ने ज्ञान दिया वो तो बड़े ते बड़ा कवि है ना। कहते हैं ना कै समझे कवि, कै समझे रवि? हमें जिस कवि ने कविता की है उसकी गहराई को या तो वो कवि समझता है या रवि ज्ञान सूर्य आ जाए तो असली बात बताएगा। विस्तार में बताएगा।

तो जहाँ सांख्ययोग का नाम आता है वहाँ गीता में ये भी बताया है, सांख्य का अर्थ बताया ज्ञान। क्या? शिवबाबा, जिसे हम कहते हैं शिवबाबा। तो कौनसी आत्मा बुद्धि में आती है? हँ? शिवबाबा कहते हैं तो कौनसी आत्मा बुद्धि में आती है? शिव आता है ना बुद्धि में। बाबा तो शरीर के आधार पे नाम रखा गया। तो शरीर थोड़ेही समझने-समझाने वाला होता है। समझने वाला हो सकता है। समझाने वाला तो नहीं हो सकता। तो शिव जो है वो ही सुप्रीम टीचर का काम करता है। हँ? शरीर तो एक ही है। बाप का भी वो ही काम करता, टीचर का भी वो ही काम करता, सदगुरु का भी वो ही काम करता। वो मुकर्रर रथ एक ही है। तो जिसके द्वारा समझाते हैं, उसका गीता में नाम क्या दिया है? हँ? कितनी देर लगाते?
(किसी के कुछ कहा।) अर्जुन नाम दिया? अर्जुन समझाता है? हँ? (किसी के कुछ कहा।) कृष्ण समझाता है? वाह तुम तो झूठा ही नाम डाल दिया कृष्ण का। वो क्या समझाएगा बच्चा? बच्चा समझता है? हँ? बच्चा समझता है? न समझता है ना समझाय सकता है।

तो गीता तो पढ़ी नहीं अपन लोगों ने। हँ? गीता में नाम आया है सांख्यानाम कपिलोमुनि। (गीता 10/26) क्या? जो सांख्य तो ज्ञान की गहराई में जाने वाले ऋषि-मुनि हैं, उनमें कपिल मुनि का नाम दिया कि वो कपिल मुनि मैं हूँ। क्या? नदियों में गंगा मैं हूँ। माना दुनिया में जो कुछ भी श्रेष्ठ-श्रेष्ठ है वो गीता में भगवान ने अपने लिए बता दिया मैं हूँ। अरे, तो ये तो मैं-4 करने वाली बात हो गई। वो तो बकरी करती है। हँ? अरे, बकरी तो गड्ढे में ले जाती है। अपने पीछे-पीछे सबको। भेड़-बकरियां क्या करती हैं? गड्ढे में ले जाती हैं। शिव बाबा किसी को गड्ढे में ले जाता है क्या? वो तो सारी दुनिया को गड्ढे में से निकाल के कहाँ ले जाता है? ऊँचे से ऊँचे धाम में ले जाता है। ऐसे ऊँचे धाम में ले जाता है जहाँ अनुभव करती है आत्मा कि हम त्रिलोकीनाथ हैं। क्या? एक लोक के नाथ नहीं। तीनों लोकों के नाथ। कौन-कौनसे तीन लोक? कितनी देर लगाते! अरे, दुखधाम, सुखधाम, शान्तिधाम। तीनों लोक के मालिक अनुभव करते। वैकुण्ठ में रहने वाले।

Today's morning class is dated 11.7.1967. The record played on Tuesday was - Raat ke raahi thak mat jana, subah ki manzil door nahi hai. People in the world go to perform pilgrimages on the path of Bhakti. They also go by walk. So, they do not travel in the night. They travel in the day time. Hm? Then why was this record played? It is because they do not think that we souls are in the darkness of ignorance. They do not know at all as to what their destination is. So, that destination keeps on changing every day. They will perform the pilgrimage of four dhaams (Hindu temples located on the Himalayas in the state of Uttarakhand in north India); they will perform the pilgrimage of Amarnath; they will perform the pilgrimage of Kailash. They are actually travellers of the night only. The shooting takes place here only. So, how are you the travelers of the night here? Hm? Here you have received knowledge, haven't you? You have come into light. Hm? So, how will this be applicable here? When the record has been played then there will be its meaning because all those who understand Baba's knowledge about the soul, the Supreme Soul and the world cycle, they know that the journey of our soul is of day or of night? Hm? It is a true journey of which time? When does fast travelling take place? It takes place in the night because there is no business in the night. You have to just sit and remember the soul, remember the Father of the soul. So; still children feel tired. Hm? When you feel tired again and again, you feel sleepy.

So, it was told - O traveler of the night, do not feel tired. The destination of dawn is not far away. Destination of which dawn? The Golden Age like dawn is about to begin. Which Golden Age like dawn? Hm? Is it about the time when Krishna is perfect in 16 celestial degrees? No. It is about Vaikunth where the happiness is higher than being perfect in 16 celestial degrees. It is super sensuous joy. The deities of the Golden Age will however experience the joy of the organs. Hm? Are the organs lower or is the mind and intellect lower? The mind and intellect are not lower. Neither the mind nor intellect; mind controls all the organs. So, the happiness of the vibrations of the mind and intellect is the highest joy. Have you found that destination or are you yet to find it? Hm? The destination of receiving supersensuous joy. When you find that destination, then the pleasure of the organs will not appear to be of any use. Hm? If anyone gets to bathe in the Mansarovar (lake), then why will he bathe in the small pits of water? So, do you feel the destination to be far or near? Hm? What is happening?
(Someone said something.) Is it far? Hm? Why do you say so? Hm? Tell. 80 years have passed. Just as other founders of religions establish their religion at the most within 100 years. So, ShivBaba also comes and establishes His religion within 100 years. 80 years have passed. Is the destination still far away? Hm? Sometimes Baba feels angry while narrating Murli. [He asks] Don't you feel ashamed? He keeps on saying like this.

Om Shanti. Jeevatma Father sits and explains. What has been said? Hm? Who is jeevatma? For whom was it said? Hm? Who is Jeevatma Father? Arey! Is there anything to think about in this topic as well? Hm? Yes. The one who comes in life (jeevan) is Jeevatma. Chaitanya (living). The definition of chaitanya was mentioned in the Murli. The one who speaks and walks is called chaitanya. So, it is not as if the one who was called Jeevatma Father is sitting in the Supreme Abode. He lives in the Supreme abode always through his intellect, but now He has come in a body, hasn't He? So, it was told that He too is a Jeevatma. He sits and explains to the children. Hm? Sitting in what? Hm? He sits in this body and explains. Hm? Does He sit in the body of Dada Lekhraj Brahma and explain? Or does He just narrate? Hm? Yes. The body of Dada Lekhraj is the last Brahma. Numberwise all the Brahmas played their parts because there is not one Brahma. Hm? Pictures have been prepared. Pictures (chitra) are memorials of the character (charitra), aren't they? For example, a picture of ten-headed Ravan is prepared. So, there have been some 10 special founders of religions. Hm? So, they gather to run the rule of subjects over subjects. Democratic rule. They say that they will run their kingdom. What? Now we will rule; we will control the world.

So, the Father explains that a human being cannot teach kingship to another human being. This task of teaching Rajyog belongs to ShivBaba alone. Even in that the permanent Chariot in which He enters, He also explains through him in the form of a Supreme Teacher. The rest do hold the title of Brahma. When He enters in them, then they do get the name Brahma, but what does He just do? He narrates. He does not explain the topic deeply. So, has the topic of explaining mentioned anywhere in the scriptures that it has been explained elaborately and deeply? Hm? Has it not been mentioned? Oho.
(Someone said something.) Yes, the topic of 'Saankhyayog' has been mentioned. Hm? The name has been mentioned in the Gita also - Saankhyayogau prithak baalaah pravadanti na panditaah. (Gita 5/4) For example, today's Brahmins think, don't they? The Brahmins of advance [party] think that the basic knowledge is separate; hm? And advance knowledge? Is separate. So, when a new student comes, they will give them the basic knowledge first. They will waste two-four months. Then they will give advance knowledge. Arey! Are these two different kinds of knowledge? Hm? Arey, the knowledge is only one. Yes, it is true that the bodily religious gurus have mixed their own opinion in it and made it lower category knowledge, so it remained a basic knowledge only. God gave knowledge; He is the biggest poet is not He? It is said that - kai samjhe kavi, kai samjhe ravi (a poet can imagine even about a place where even the Sun's light cannot reach). Either the poet who has written a particular poem understands its depth or when the Sun, i.e. the Sun of Knowledge comes, then He will tell the actual thing. He will tell in detail.

So, wherever the name of Saankhyayog is mentioned in the Gita, it has also been mentioned that the meaning of saankhya is knowledge. What? ShivBaba, whom we call ShivBaba. So, which soul comes to the intellect? Hm? When we say ShivBaba, then which soul comes to the intellect? Shiv comes to the intellect, doesn't He? Baba is the name based on the body. So, it is not the body which understands or explains. He can be the one who understands. He cannot be the one who explains. So, Shiv performs the task of Supreme Teacher. Hm? The body is only one. It is He who performs the task of the Father also; it is He who performs the task of the teacher also, it is He who performs the task of the Sadguru also. That permanent Chariot is only one. So, the one through whom He explains, what is the name given to him in the Gita? Hm? You take so much time.
(Someone said something.) Was he named Arjun? Does Arjun explain? Hm? (Someone said something.) Does Krishna explain? Wow! You have falsely inserted the name of Krishna. What will that child explain? Does a child understand? He neither understands nor can he explain.

So, we people haven't read the Gita. Hm? The name has been mentioned in the Gita as -Saankhyaanaam kapilomuni (Gita 10/26) What? Among the sages and saints who go into the depth of saankhya, i.e. knowledge, the name of sage Kapil has been mentioned that I am that sage Kapil. What? Among the rivers I am river Ganga. It means that whatever righteous things are there in the world were mentioned by God in the Gita for Himself that it is He. Arey, so, it is like saying I, I, I (mai, mai, mai). A goat produces such sound. Hm? Arey, a goat takes others to the pit. It takes everyone behind itself. What do sheep and goats do? They take them to the pit. Does ShivBaba take anyone to a pit? He pulls out everyone from the pit and takes them to which place? He takes them to the highest on high abode. He takes them to such high abode where the souls experience that we are Trilokinath (masters of the three abodes). What? Not the masters of one abode. Masters of all the three abodes. Which three abodes? You take so much time! Arey! The abode of sorrows (dukhdhaam), the abode of happiness (sukhdhaam), the abode of peace (shaantidhaam). You experience yourself to be the masters of all the three abodes. Residents of Vaikunth.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 04 Apr 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2537, दिनांक 03.06.2018
VCD 2537, Date 03.06.2018
प्रातः क्लास 11.7.1967
Morning class dated 11.7.1967
VCD-2537-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.35
Time- 00.01-17.35


प्रातः क्लास चल रहा था - 11.7.1967. मंगलवार को पहले पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – पहले पक्का करना है कि हम आत्मा हैं। हम आत्मा मालिक हैं इस शरीर के। हँ? क्यों कहा ‘मैं आत्मा’ नहीं? हँ? तुम, तुम आत्मा मालिक हो इस शरीर के, ये भी नहीं कहा। हम मालिक हैं इस शरीर के। ये ‘हम’ क्यों लगाया? हँ? कौन बोल रहा है? बोलने वाली तो शिव है आत्मा। हँ? तो उसे बोलना तो ये चाहिए कि ‘मैं इस शरीर का मालक हूँ‘ जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश किया। ‘हम’ क्यों कहा? हँ? क्योंकि जिसमें प्रवेश किया है उसको भी अपने साथ मिलाय लिया। इसलिए बोला ‘हम दोनों मालिक हैं इस शरीर के’। शरीर मालिक नहीं है आत्मा का। नहीं। आत्मा मालिक है शरीर का। शरीर से और उनकी इन्द्रियों से आत्मा काम लेती है, पार्ट बजाती है। तो इस समय में बच्चों को ये ही आत्मा में निश्चय रखने के लिए क्योंकि यं तो आत्मा मालिक है इस शरीर का। ऐसे ख्यालात नहीं आते हैं किसी को क्योंकि जन्म-जन्मान्तर से देह अभिमान में चले आ रहे हैं। तो ख्यालात नहीं आते हैं। तो फिर यहाँ प्रैक्टिस कराई जाती है अपन को आत्मा समझो इस ख्यालात में बिठाया जाता है कि आत्मा शरीर का मालिक है। ये शरीर और इसके अंग-प्रत्यंग तुम्हारी प्रजा है आत्मा का। और आत्मा मालिक है। अर्थात् मैं जो आत्मा हूँ और मेरा जो शरीर है क्योंकि ये बात तो जन्म-जन्मान्तर से चली आ रही है ना कि मैं और मेरा। ये तो चलता आया है।

तो मैं ये आत्मा इस शरीर का मालिक हूँ। हँ? मैं आत्मा वास्तव में परमपिता परमात्मा का संतान हूँ। हँ? ये किसने बोला? कि मैं आत्मा वास्तव में परमपिता परमात्मा की संतान हूँ। और झूठ-मूठ में किसकी? हँ? जो अल्पकाल थोड़े समय के लिए मात-पिता बने, जन्म-जन्मान्तर बने ना। तो वो कोई वास्तव में थोड़े ही हुए परमानेन्ट। तो परमानेन्ट में किसकी संतान हूँ? परमपिता परमात्मा की संतान हूँ। अब दो शब्द क्यों लगा दिये? हँ? परमपिता परमात्मा की संतान हूँ। अब दो शब्द क्यों लगा दिये? हँ? परमपिता फिर परमात्मा। सिर्फ परमपिता कह देने से नहीं चलेगा? हं? अच्छा शिवबाबा कह दें तो चलेगा? हँ? शिव जिसमें, तन में प्रवेश करते हैं, वो पतित है, जिसे बाबा कहा या पावन है? हँ? पतित है। तो मैं आत्मा उसकी संतान हूँ? वो दोनों का नाम लिया परमपिता परमात्मा। उनमें एक पतित है और एक पावन है। हँ? क्यों? कौनसा पावन है कौनसे पतित है? अम्मा पतित है कि बाप पतित है? कि दोनों अव्यभिचारी हैं? किसकी संतान हूँ वास्तव में? हँ? किसकी संतान हूँ? हँ? अरे, वास्तव में संतान हूँ तो एकदम सृष्टि के आदि में चले गए ना। तो किसकी संतान हूँ? जो पक्की-पक्की मैं आत्मा बन गई 84 के चक्कर में आने वाली? हँ?

बाबा तो बुड्ढे को कहा जाता है। और बाबा ग्रैण्डफादर को भी कहा जाता है। जिस तन में प्रवेश करते हैं वो हुआ बाबा। और प्रवेश करने वाला परमानेन्ट तो शिव। तो उन दोनों को कहा जाए परमपिता परमात्मा? हँ? दोनों को? वो परमात्मा हो गया जिसे बाबा कहा? क्योंकि पतित तन में प्रवेश करते हैं। हँ? तो हम आत्मा जो हैं वो जिनकी संतान हैं मात-पिता की उनमें एक पतित है, एक पावन है? ऐसे? कि परमपिता परमात्मा दोनों ही पावन हैं? हँ? परम आत्मा शब्द कहा गया, इससे साबित होता है कि वो ही पार्टधारी आत्मा संसार में प्रत्यक्ष हो गई। सबने जान लिया कि हाँ, परम पार्टधारी है। हँ? उसका नाम बाद में। और उसपे फिदा होके आया परमपिता। तो मात-पिता हुए? हुए तो लेकिन सवाल ये है एक पतित की संतान, एक पावन की संतान। एंग्लो इंडियन हैं क्या? पक्के भारतवासी नहीं हैं? हँ? तो परमात्मा शब्द कहा ही जाता है जब संपन्न स्टेज बन जाए। हँ? जब संपन्न स्टेज बन जाए तो परमपिता उसमें रहेगा? हँ? रहेगा? अरे, रहेगा कि नहीं? नहीं रहेगा। तो फिर ये परमपिता किसके लिए कहा? हँ? जिसमें प्रवेश किया वो आत्मा बाप समान बनी या नहीं बनी? तो नाम शिव लगाया गया। शिव माने कल्याणकारी। जैसे बाप कल्याणकारी था सारी सृष्टि का, प्राणीमात्र का, ऐसे वो आत्मा भी क्या बनी? कल्याणकारी बनी। तो वो टाइटल मिल जाता है परम आत्मा।

एक ही शरीर है। उसी शरीर में पिता है आत्मा। हँ? बीज रूप। और शरीर है, जिसे कहते हैं, वेदों में कहा गया हिरण्य गर्भ। हिरण्य माने सोना। गर्भ माने माता। गर्भ कौन धारण करती है? माता धारण करती है ना। तो वो शरीर जो है जिसे लिंग कहा जाता है यादगार, वो लिंग ही परमात्मा हो गया। तो क्या चैतन्य है कि जड़ है? हँ? हाँ। चैतन्य इसलिए है कि बाप की याद की पावर रग-रग में रोम-रोम में भरी हुई है। तो वो जो पांच तत्वों का शरीर बनता है वो सामान्य शरीर तो सब विनाशी हो गए। लेकिन जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश किया वो योगबल के आधार पर कैसा हुआ? योग का भण्डारी। माने परमपिता ज्ञान का भण्डारी, अखूट ज्ञान का भण्डारी। और परमात्मा? अखूट योग का भण्डारी। तो वो योग की पावर वो सारी सृष्टि में वितरित होती रहती है। हर प्राणी मात्र जैसे एक इस्ट्रूमेन्ट हो गया। जड़ पांच तत्वों का पुतला। और उसमें परमपिता का करेंट तो है लेकिन परमपिता तो नहीं है। तो किसका करेंट चालू रहता है? परमात्मा का करेन्ट चालू रहता है। तो लोगों ने समझ लिया परमात्मा सर्वव्यापी है।

अरे परमात्मा सर्वव्यापी थोड़ेही है, कण-कण में व्यापी है? परमात्मा चैतन्य है या जड़ है? चैतन्य है। आत्मा भी चैतन्य है। तो अगर सर्वव्यापी है तो मुर्दा हो जाए तो उसमें भी व्यापी होना चाहिए। हँ? पहले तो हलन-चलन करता था। आँखों में रोशनी थी। फिर बाद में तो न हलन-चलन करता है, न रोशनी है आँखों में। तो व्यापी कहें? नहीं। उसमें जो ऊर्जा व्यापी थी वो ऊर्जा क्या हुई? चली गई। अपना सारा तंत्र समेट के चली गई। क्या तंत्र है ऊर्जा का? हँ? दसों इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहंकार। और उनमें जो पाँच इन्द्रियाँ हैं ज्ञानेन्द्रियाँ, उन ज्ञानेन्द्रियों का जो रस होता है। क्या रस है? हँ? शब्द, स्पर्श; शब्द माने? कान। स्पर्श त्वचा। रूप आँख। हँ? शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और; हाँ, जिह्वा रस लेती है ना। तो ये पांच उसके, ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं। वो भी साथ ही जाते हैं। पूर्व जन्म में किसी ने कौनसी इन्द्रिय का कितना, कैसा विषय ग्रहण किया, वो संस्कार साथ में जाता है।

तो अब वो प्राणी तो ढ़ेर हैं। क्या? योनियाँ ही 84 लाख हैं वो प्राणी तो पता नहीं कितने होंगे? तो सब इन्स्ट्रूमेन्ट्स हैं। क्या? लौकिक दुनिया में, भौतिकवादी दुनिया में इन्स्ट्रूमेन्ट्स होते हैं ना। टेपरिकार्डर है, टीवी है, ये है, वो है। तो वो काम करते हैं अपने आप? नहीं काम करते। कब काम करेंगे? हँ? वो बिजली की ऊर्जा, कनेक्शन आता है तो काम करते हैं। तो ऐसे ही परमपिता तो नहीं है शिव उनमें लेकिन उसकी पावर भरी हुई है। हँ? परमात्मा की। तो वास्तव में मैं सिर्फ माता की संतान नहीं हूँ। बीज उसने डाल दिया। किसने? जो गीता में कहा – अहं बीज प्रदः पिता। (गीता 14/4) किसने बीज डाल दिया? वो निराकार ने। ज्ञान का बीज डाल दिया। अब ये है पहले-पहले बच्चों को अच्छी तरह से याद करना है। क्या? नहीं तो 63 जन्म में ही कहीं फंसे रहें। क्या? कि हमारा वास्तव में एकदम कारण रूप मात-पिता कौन है? आत्मा के। अच्छी तरह से याद करेंगे तो घड़ी-घड़ी भूलेंगे नहीं। हँ? नहीं तो क्या होता है? घड़ी-घड़ी अपनी आत्मा भी भूल जाती है और आत्मा का माता भी भूल जाती, पिता भी भूल जाता। जानते ही नहीं माता-पिता कौन है पहले तो इतनी गहराई से। जानते हैं? हँ? नहीं जानते। तो सृष्टि प्रवृत्तिमार्ग से चलती है या निवृत्तिमार्ग से चलती है? प्रवृत्ति से चलती है। तो शिव जिसे परमपुरुष कहा जाता है वो परमपुरुष इस सृष्टि पर आता है। तो परम कार्य करके जाएगा या जैसे दुनिया सृष्टि चलाती है ऐसे काम करके जाएगा? हँ? बड़े ते बड़ा परम पार्ट बजा के जाता है। क्या पार्ट बजाता है? हँ? नंबरवार जो जैसी आत्माएं हैं पुरुषार्थ करने वाली, तो उन पुरुषार्थी आत्माओं में ज्ञान और योग की पावर भर जाती है।

A morning class dated 11.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the first page was - First you have to decide firmly that you are a soul. We souls are masters of this body. Hm? Why it was not said 'I, the soul'? Hm? It wasn't even said - You, you soul are master of this body. We are masters of this body. Why was this word 'we' (hum) added? Who is speaking? The speaker soul is Shiv. Hm? So, He should have said that I am a master of this body, the permanent Chariot in which He has entered. Why did He say 'we'? It is because He joined with Himself the one in whom He entered. This is why it was said 'we both are masters of this body.' The body is not the master of the soul. No. The soul is master of the body. The soul works, plays its part through the body and its organs. So, children, at this time, in order to have faith in this soul, because in a way the soul is the master of this body. Nobody thinks like this because they have been treading in body consciousness since many births. So, the thoughts do not emerge. So, then you are made to practice to consider yourself to be a soul. You are made to sit in this thought that the soul is the master of the body. This body and all its organs are your subjects, of the soul. And the soul is the master. It means that I, the soul and my body because this topic has been going on since many births - I and mine. This has been going on.

So, I, the soul am a master of this body. Hm? I, the soul am actually the child of the Supreme Father Supreme Soul. Hm? Who said this that I, the soul am actually the child of the Supreme Father Supreme Soul? And in a false way, whose child am I? Hm? Those who became mother and Father for a short period, for a little while, birth by birth, did not they? So, they are not in reality, permanent. So, whose child am I in a permanent manner? I am the child of the Supreme Father Supreme Soul. Well, why were two words used? Hm? I am a child of the Supreme Father Supreme Soul. Well, why were two words used? Hm? Supreme Father and then the Supreme Soul. Will it not be sufficient if you say just Supreme Father? Hm? Achcha, will it be sufficient if you say ShivBaba? Hm? Is the one, the body in which Shiv enters, who was called Baba, a sinful one or a pure one? Hm? He is sinful. So, am I, the soul his child? The name of both Supreme Father and Supreme Soul was uttered. Among them one is sinful and one is pure. Hm? Why? Which one is pure and which one is sinful? Is the mother sinful or is the Father sinful? Or are both of them unadulterated (avyabhichaari)? Whose child am I in reality? Hm? Whose child am I? Hm? Arey, I am a child in reality; so, He went to the very beginning of the world, did not He? So, whose child am I that I became the firm soul which passes through the cycle of 84 births? Hm?

An old person is called Baba. And a grandfather is also called Baba. The body in which He enters happens to be Baba. And the one who enters permanently is Shiv. So, should both of them be called the Supreme Father Supreme Soul? Hm? Both? Is the one who was called Baba, the Supreme Soul? It is because He enters in a sinful body. Hm? So, the mother and the Father whose children we souls are, among them, is one sinful and one pure? Is it so? Or are both Supreme Father and Supreme Soul pure? Hm? The word Supreme Soul was used; it proves that that actor soul was revealed in the world. Everyone came to know that yes, he is the supreme actor. Hm? His name comes later on. And the Supreme Father came losing heart to him. So, are they mother and Father? They indeed are, but the question is that one is the child of the sinful one, and one is the child of the pure one. Is he an Anglo-Indian? Are they not firm Indians? Hm? So, the word Supreme Soul is used only when his stage becomes perfect. Hm? Will the Supreme Father remain in him when he achieves the perfect stage? Hm? Will He remain? Arey, will He remain or not? He will not remain. So, then, for whom was this Supreme Father said? Hm? Did the soul in whom He entered become equal to the Father or not? So, the name Shiv was added. Shiv means benevolent (kalyaankaari). Just as the Father was benevolent for the entire world, for all the living beings, similarly, what did that soul also become? It became benevolent. So, he receives that title of Supreme Soul.

There is only one body. In the same body the soul is the Father. Hm? Seed form. And the body, which is called in the Vedas as hiranyagarbh. Hiranya means gold. Garbh means mother. Who conceives? The mother conceives, doesn't she? So, that body, which is called the ling, the memorial, that ling itself is the Supreme Soul. So, is he living or non-living? Hm? Yes. He is living because the power of remembrance of the Father is contained in every hair follicle. So, that body which is formed through the five elements, all those ordinary bodies are perishable. But the permanent Chariot, in which He entered, how is that body on the basis of the power of Yoga? Store-house (bhandaari) of Yoga. It means that the Supreme Father is the store house of knowledge, store house of inexhaustible knowledge. And the Supreme Soul? He is the inexhaustible store house of Yoga. So, that power of Yoga keeps on distributing in the entire world. Every living being is like an instrument. An effigy of five non-living elements. And it does contain the current of Supreme Father, but the Supreme Father is not present in them. So, whose current remains active in them? The current of the Supreme Soul remains active. So, people thought that the Supreme Soul is omnipresent.

Arey, is the Supreme Soul omnipresent? Is He present in every particle? Is the Supreme Soul living or non-living? He is living. The soul is also living. So, if He is omnipresent, then He should be present in a corpse as well. Hm? Earlier he used to move around. There was light in his eyes. Then later on, he neither moves, nor is there light in the eyes. So, will he be said to be present? No. What happened to the energy that was present in him? It departed. It packed-up its entire system and departed. What is the system of energy? Hm? The ten organs, mind, intellect and ego. And the five organs among them, the sense organs and the pleasure of those sense organs. What is the pleasure? Hm? Shabd (sound/words), sparsh (touch); what is meant by shabd? Ears. Sparsh (touch), twacha (skin). Roop (form), aankh (eyes). Hm? Sound, touch, form, pleasure and; yes, the tongue experiences pleasure, doesn't it? So, these five are the subjects of the sense organs. They too travel along [with the soul]. The sanskar (resolves) of how much and what kind of pleasure that someone experienced in respect of a particular organ in the past birth travels with him/her.

So, now those living beings are numerous. What? There are 84 lakh species and we don't know how many living beings are there? So, all are instruments. What? In the outside world, in the materialistic world, there are instruments, aren't there? There is tape recorder, there is TV, there is this, there is that. So, do they work on their own? They do not work. When will they work? Hm? They work when the energy, the connection of the electricity becomes active. So, similarly, the Supreme Father Shiv is not present in them, but His power is contained in them. Hm? Of the Supreme Soul. So, actually, I am not just the child of a mother. He sowed the seed. Who? It has been said in the Gita - Aham beej pradah pita. (Gita 14/4) Who sowed the seed? That incorporeal. He sowed the seed of knowledge. Now, first of all the children have to remember nicely. What? Otherwise, you will remain entangled in 63 births. What? That who is our actual causal mother and Father? Of the soul. If you remember nicely, you will not forget every moment. Hm? Otherwise, what happens? You forget your own soul also every moment and you forget the mother of the soul as well as the Father of the soul. You don't know at all deeply that who is the mother and Father first of all. Do you know? Hm? You don't know. So, does the world function through the path of household or through the path of renunciation? It functions through the path of household. So, Shiv, who is called the Parampurush, that Parampurush comes to this world. So, will He perform a supreme task and go or will He perform a task just as the world performs and go? Hm? He performs the biggest supreme part. Which part does He play? Hm? The power of knowledge and Yoga is filled in the numberwise purusharthi souls, which make purusharth.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 06 Apr 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2538, दिनांक 04.06.2018
VCD 2538, Date 04.06.2018
प्रातः क्लास 11.7.1967
Morning Class dated 11.7.1967
VCD-2538-extracts-Bilingual

समय- 00.01-15.26
Time- 00.01-15.26


प्रातः क्लास चल रहा था - 11.7.1967. मंगलवार को पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – कोई विकर्म करते हैं तो कमाई करना बंद हो जाता है। पवित्र बनना है। जहाँ के राही बने हो जाने के लिए तो खड़ा हो जाना पड़ता है। इसीलिए याद की यात्रा में ढ़ीले नहीं पड़ना चाहिए। क्योंकि जहाँ जाना है वो है बड़े ते बड़ा एकांत। और यहाँ है एकांत में विचार सागर मंथन करना। सूक्ष्म वतन में एकांत है ना। तो प्वाइंट्स निकलते हैं, नई-नई प्वाइंट्स निकलती हैं। तो फिर विचार सागर मंथन करके नए-नए प्वाइंट्स भी निकालने हैं। और फिर देखना है कौन-कौनसी प्वाइंट्स हमको मिली है जिस पर हमको भाषण करना है। तो उन प्वाइँट्स में विचार सागर मंथन और इसमें विचार सागर मंथन कि हम कितना समय बाबा को याद करते हैं। कितना समय बाबा को याद करने से हमारा कितना विचार सागर मंथन चलता है क्योंकि बाबा है अति सूक्ष्म। सूक्ष्म ज्योतिबिन्दु को याद करेंगे तो बुद्धि सूक्ष्म बनेगी। और सूक्ष्म बुद्धि में ज्ञान की गहराइयाँ ज्यादा आवेंगी। मनन-चिंतन-मंथन ज्यादा चलेगा।

तो इसको यात्रा कहा जाता है। जैसे मीठी चीज़ होती है ना। तो मीठी चीज़ की याद बहुत पड़ती है। तो देखो, जब कुमार जीवन है और कोई कन्या मिलती है तो बहुत मीठी चीज़ लगती है। मीठी हो जाती है ना। फिर देखो कितना उनको याद करते हैं। मीठी चीज़ याद आती है ना। कितना लव जाता है। तो वहाँ तो उस दुनिया में देह के ऊपर लव जाता है। और यहाँ तो रूहानी बाप है, रूहानी बच्चे हैं। देह से परे की स्टेज है। तो बाप ने जो ज्ञान सुनाया उसके ऊपर मनन-चिंतन-मंथन करते हैं तो नए-नए प्वाइंट्स निकलते हैं। तो बाप के ऊपर लव जावेगा ना। तो देखो उस दुनिया में लव करते हैं तो नुकसान हो जाता है। और यहाँ हम जिस से लव करते हैं ऊँच ते ऊँच बाप, जो हमें कितना ज्ञान धन का भण्डार देते हैं, तो नुकसान होने की बात ही नहीं। क्योंकि यही ज्ञान धन तो जन्म-जन्मान्तर का बन जावेगा।

ये बच्चों को समझाया गया है कि जिसको भी एक-दूसरे को देखो तो आत्मा को देखो, देह को न देखो। एक-दो की देह को देखेंगे तो नुकसान हो जावेगा। और बाबा सिर्फ टीचरों को इशारा करते हैं। क्यों? क्योंकि तो टीचर्स ही बाबा के ज्यादा कनेक्शन में आते हैं। और फिर टीचर्स ही दूसरों को समझाती हैं। और इशारा भी उन टीचर्स को करते हैं जो अच्छे-अच्छे टीचर होते हैं। नहीं तो कोई-कोई टीचर्स भी बड़े खराब होते हैं। समझा ना। जैसे उस दुनिया में कोई-कोई गुरु भी बहुत खराब होते हैं। विकारों में चले जाते हैं। तो वैसे ही यहाँ भी कोई-कोई टीचर्स होते हैं जो बहुत खराब हो जाते हैं। माना टीचर्स का माने टीच करने वाला, ऐसी टीच करे, ऐसी विद्या सिखाने वाला, मैनर्स सिखाने वाला हो। शिक्षा तो बाप भी देते हैं। जो अच्छे-अच्छे बच्चे होते हैं, धर्मात्मा होते हैं, रिलीजियस माइन्डेड, अच्छे स्वभाव के होते हैं, तो उनकी चलन भी अच्छी होती है। देखो, कई बाप ऐसे होते हैं, शराब पीते हैं, ये करते हैं, यहाँ जाते हैं, वहाँ जाते हैं, फलाना करते हैं। तो उनके बच्चे भी उनको देख करके बिगड़ पड़ते हैं।

तो देखो, संग की बलिहारी हुई ना। बाबा बताते हैं – संग तारे, कुसंग बोरे। तो जानते हो कि वो दुनिया में जो संग है वो दुनिया का संग तो खराब ही है क्योंकि उस दुनिया को कहा ही जाता है शैतानों की दुनिया। शैतानी संग है। क्योंकि गाते तो है ना और समझते भी हैं कि ये रावण राज्य है। और राम राज्य जिसको कहा जाता है वो तो गुजर गया। तो था तो जरूर ना। तो वो कौनसा राज्य था? कैसा था? और वो स्थापन कैसे हुआ? वो रामराज्य किसने स्थापन किया? ये वंडरफुल बातें तुम बच्चे ही जानते हो। तो जो जानते हैं उनको कहा जाता है स्वीट, स्वीटर, स्वीटेस्ट बच्चे। नंबरवार तो होते हैं ना। ऐसे नंबरवार बच्चे होते हैं ना। जो बहुत अच्छी सर्विस करते हैं और बहुत अच्छे से बाबा के मददगार बनते हैं। किसमें मददगार बनते हैं? हँ? पहली बात क्या? पहली बात याद में मददगार बनते हैं। हँ? याद में मददगार बनते हैं? हँ? किसके मददगार बनते हैं? हँ? ऊपरवाले को? हँ? नीचे वाले को? कभी ऊपरवाले, कभी नीचेवाले। ऊपरवाले का धंधा क्या है? और नींचेवाले का मुख्य धंधा क्या है? बाप तो दोनों बेहद के हैं। वो है आत्माओं का बाप। सुप्रीम सोल। हँ? जिसमें प्रवेश करते हैं वो है मनुष्यों का बाप। मनुष्य, सारी मनुष्य सृष्टि का बाप। तो दोनों का क्या मुख्य धंधा है? हँ? ऊपर वाला है ज्ञान का अखूट भण्डारी। त्रिकालदर्शी। हँ? और नीचे वाला है, ज्ञानी भी बनता है और जितना-जितना ज्ञानी बनता है उतना-उतना योगी बनता है। तो आखरीन करके ज्ञान तो खलास। क्या होना है आखरीन? संपूर्ण बनेंगे तो ज्ञान खलास हो जाएगा और याद रह जाएगी। तो दूसरा जो नीचे वाला है मनुष्य सृष्टि का बाप, उसको कहा जाता है योगीश्वर। हँ? तो योग की जो ऊर्जा आती है उसमें वो योग की ऊर्जा फिर सारी मनुष्य सृष्टि में काम करती है। तो उस याद की यात्रा में, जो बच्चे मददगार बनते हैं तो यहाँ मददगार बनेंगे तो वहाँ जन्म-जन्मान्तर? वहाँ भी मददगार बनेंगे।

11.7.67 की वाणी का दूसरा पेज। मंगलवार। तो याद से तुम भी पवित्र बनते हो। हँ? ‘भी’ क्यों लगा दिया? हँ? तुम भी पवित्र बनते हो और सारी दुनिया भी वायुमण्डल शुद्ध हो जाता है। तो इस सृष्टि को भी तुम पवित्र बनाते हो। बाप आते हैं ना बच्ची। किसलिए आते हैं? हँ? बच्चों को ज्ञान देने आते हैं कि तुम पतित बन गए हो। हँ? ये दुनिया ही पतित बन गई। तो पतितों को पावन बनना है। पतित बनते हैं तो दुखी होते हैं। पावन बनेंगे देवता, तो सुखी हो जाएंगे।

तो बाप आते हैं पतित सृष्टि को पावन बनाने के लिए। और सारी सृष्टि की आत्माएं पावन बनेंगी या कोई बनेगा, कोई नहीं बनेगा? नहीं। उस पावनपने के धंधे में सब आ जाते हैं। तो एक तो आत्मा को पावन बनाना है। हँ? और दूसरा? ये जो शरीर है पांच तत्वों का पुतला, ये पांच तत्वों को भी पावन बनाना है। तो कौनसे बाप का धंधा किसके ऊपर चलेगा? हँ? निराकारी आत्माओं का बाप का धंधा ज्ञान देने का है। वो ज्ञान का अखूट भण्डारी है। तो वो ज्ञान तो मनुष्य आत्माएं ही लेंगी नंबरवार क्योंकि मनुष्य आत्माओं में मन-बुद्धि होती है। और प्राणियों में उतनी सक्रिय मन-बुद्धि थोड़ेही होती है। मनुष्य विचार-सागर-मंथन करता है, सोच-विचार करता है, संकल्प-विकल्प करता है। अच्छे-बुरे को पहचानता है। जानवर पशु पक्षी तो नहीं पहचानेंगे ना। तो सुप्रीम सोल शिव बाप आत्माओं का धंधा है ज्ञान देना। तो जानवर तो ज्ञान नहीं लेंगे। जो मनुष्यात्माएं हैं उनमें भी नंबरवार हैं जो ज्ञान लेती जरूर हैं। कोई पहले और कोई बाद में। बाद में कब? जब एकदम सृष्टि का विनाश, सर के ऊपर डंडा आ जाता है कि अब सबको खलास होना है तो फिर मजबूरी में ले लेते हैं, लेना ही पड़े। ज्ञान भी लेते हैं और फटाफट याद भी करते हैं। तो देखो, पतित सृ्ष्टि को पावन बनाने के धंधे में सब प्राणी मात्र आ जाते हैं। चाहे मनुष्यात्माएं हों, पशु-पक्षी हों, कीड़े-मकोड़े हों। है ना ये सारी सृष्टि।

A morning class dated 11.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page on Tuesday was - If you perform any sin, then your income stops. You have to become pure. You should stand up for the destination whose traveler you have become. This is why you should not become loose in the journey of remembrance because the place where you have to go is the biggest solitude. And here you have to churn the ocean of thoughts in solitude. There is solitude in the Subtle Region, is not it? So, points emerge, newer points emerge. So, then you should churn the ocean of thoughts and cause newer points to emerge. And then you should see which points we have received on which we have to deliver lecture. So, churning on those points and churning about how much time we spend in Baba's remembrance. By remembering Baba for how long can we churn the ocean of thoughts for how long because Baba is very subtle. If you remember the subtle point of light, then the intellect will become subtle. And there will be more depth of knowledge in a subtle intellect. You will think and churn more.

So, this is called a journey. For example, there are sweet things, aren't there? So, one remembers sweet things a lot. So, look, when it is a Kumar (bachelor) life and if you find a virgin, then she appears to be very sweet. She becomes sweet, doesn't she? Then look, he remembers her so much! A sweet thing comes to the mind, doesn't it? One showers so much love. So, there in that world the love is for the body. And here it is the spiritual Father and spiritual children. It is a stage beyond the body. So, when you think and churn over the knowledge that the Father narrated, then newer points emerge. Then you will love the Father, will you not? So, look, when you love in that world, you suffer loss. And the one whom we love here, the highest on high Father, who gives us such a stock house of wealth of knowledge, then there is no question of suffering any loss at all because this wealth of knowledge itself will become ours for many births.

Children have been explained that whomsoever you see, observe the soul; do not see the body. If you see each other's body, then you will suffer loss. And Baba gives hints to just the teachers. Why? It is because it is the teachers only who come more in connection with Baba. And then it is the teachers only who explain to others. And He gives hints only to those teachers who are nice teachers. Otherwise, some teachers are also very bad. Did you understand? For example, some Gurus are also very bad in that world. They indulge in lust. So, similarly, even here there are some teachers who become very bad. It means that the teachers, who teach, should teach knowledge in such a way that they teach manners. The Father also gives teachings. The nice children, the religious minded ones with nice nature have a good behavior also. Look, there are many fathers who drink wine, do this, go here, go there, do such and such thing. So, their children also observe them and get spoiled.

So, look, it is a greatness of the company, is not it? Baba tells - good company salvages, while bad company drowns you. So, you know that the company in that world is only bad because that world is called the world of satans. It is a satanic company because you do sing and also understand that this is a kingdom of Ravan. And the one which is called the kingdom of Ram has passed. So, it did exist, did not it? So, which was that kingdom? How was it? And how was it established? Who established that kingdom of Ram? You children alone know these wonderful topics. So, those who know are called sweet, sweeter, sweetest children. They are numberwise, aren't they? There are such numberwise children, who render very good service and become helpful to Baba very nicely. In which aspect do they become helpers? Hm? What is the first topic? Firstly they become helpers in remembrance. Hm? Do they become helpers in remembrance? Hm? Whose helpers do they become? Hm? For the above one? For the below one? Sometimes you say the above one, sometimes you say the below one. What is the business of the above one? And what is the main business of the below one? Both the fathers are unlimited. That one is the Father of souls. The Supreme Soul. Hm? The one in whom He enters is the Father of human beings. He is the Father of the human beings, the entire human world. So, what is the main business of both? Hm? The above one is the inexhaustible stock house of knowledge. He is Trikaaldarshii. Hm? And the below one becomes knowledgeable also and the more he becomes knowledgeable, the more he becomes a yogi. So, ultimately the knowledge will end. What is to happen ultimately? When you become perfect, then the knowledge will end and remembrance will remain. So, the second one, the below one, the Father of human world is called Yogiishwar. Hm? So, the energy that is received through Yoga, the energy of Yoga contained in him works in the entire human world. So, the children who become helpers in that journey of remembrance, then if they become helpers here, then they will become helpers there also birth by birth.

Second page of the Vani dated 11.7.67. Tuesday. So, you too become pure through remembrance. Hm? Why was 'too' added? Hm? You too become pure and the atmosphere of the entire world also becomes pure. So, you make this world also pure. The Father comes, doesn't He daughter? Why does He come? Hm? He comes to give knowledge to the children that you have become sinful. Hm? This world itself has become sinful. So, the sinful ones have to be made pure. When you become sinful you become sorrowful. When you become pure deities you will become happy.

So, the Father comes to purify the sinful world. And will the souls of the entire world become pure or will someone become and will someone else not become? No. Everyone is included in that business of purification. So, firstly, the soul has to be made pure. Hm? And secondly? This body, the effigy of five elements, these five elements also have to be made pure. So, the business of which Father will work over whom? Hm? The business of the Father of the incorporeal souls is to give knowledge. He is the inexhaustible stock house of knowledge. So, it is the human souls only who will obtain that knowledge numberwise because there is mind and intellect in the human souls. And there is not that much active mind and intellect in other living beings. A human being churns the ocean of thoughts, thinks, creates good and bad thoughts. He discerns good and bad. Animals and birds will not discern, will they? So, the business of the Supreme Soul Father Shiv is to give knowledge. So, animals will not obtain knowledge. Even among the human souls, who do obtain knowledge, there are numberwise. Some early and some late. When later? When the destruction of the world is about to begin, when the stick is on the head that now everyone has to perish, then they obtain [knowledge] under compulsion; they will have to obtain. They also obtain knowledge and also remember [the Father] quickly. So, look, all the living beings are included in the business of purifying the sinful world. Be it human souls, be it animals and birds, be it worms and insects. This is the entire world, is not it?

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 07 Apr 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2539, दिनांक 05.06.2018
VCD 2539, Date 05.06.2018
प्रातः क्लास 11.7.1967
Morning Class dated 11.7.1967
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समय- 00.01-17.06
Time- 00.01-17.06


प्रातः क्लास चल रहा था - 11.7.1967. मंगलवार को दूसरे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – दुनियावालों बिचारों को तो कुछ पता नहीं है कि विश्व में शांति कब थी। और वो शांति कैसे स्थापन होती है। और विश्व शांति स्थापन करने के लिए कौन निमित्त बनता है। और करता कौन है? वो तो ऐसे ही पुरस्कार देते रहते हैं। तुम्हारी बुद्धि में तो रहता है विश्व की शांति हम स्थापन कर रहे हैं। इसलिए तो तुम बच्चे यहाँ बाप के बने हो। विश्व में शांति तुम स्थापन कर रहे हो। किससे बोला? हँ? तुम स्थापन कर रहे हो माने कोई सन्मुख हैं नज़र के सामने। तो कहा जाता है हाजिर-नाजिर। अभी समझावें कैसे बच्चों को? ये आपस में जैसे कहते हो ना हम आपस में सेमिनार करें, राय करें। तो ऐसी-ऐसी प्वाइंट्स इनकी बहुत चाहना है कि विश्व में शान्ति कैसे स्थापन हो। हँ? ये रडियाँ मारते रहते हैं। दुनिया में अशान्ति तो बहुत है। अच्छा, अशान्ति बहुत है, फिर शान्ति कैसे स्थापन हो? हँ? पहले कब शान्ति विश्व में स्थापन हुई थी? हुई तो थी। जब चाहना है तो जरूर हुई थी। तो कैसे हुई थी? हँ? विश्व शान्ति के लिए क्या तरीका अपनाया गया जो विश्व में शान्ति हो गई? हँ? इसके लिए शास्त्रों में कोई शान्तिदेवा गाया हुआ है? हँ? कितने धर्मपिताएं आए, विश्व में शान्ति तो स्थापन हुई नहीं। और ही ज्यादा अशान्ति बढ़ती गई।

तो पहली बात तो ये है कि शान्ति कौनसी चाहिए? हँ? ये तो कोई भी बच्चे जानते नहीं हैं। तो वो चित्र देना है सामने। कौनसा चित्र? हँ? अरे, कोई चित्र है, हँ, जिससे समझाया जाए? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) शंकर का चित्र! हँ? सांप दिखाई पड़ेगा तो भाग जाएगा देखते ही। हँ? अरे, शान्ति क्या है वो पूछा लक्ष्मी-नारायण सामने। हँ? झाड़ शान्त है। और? हँ? परमधाम शान्त है। ठीक है। धाम माने घर। परम माने बड़े ते बड़ा घर। इतना बड़े ते बड़ा घर जहाँ सिर्फ देवताओं की, मनुष्यों की, ऋषियों-मुनियों की या राक्षसों की ही आत्माएं नहीं रहती हैं। पशु, पक्षी, कीड़े, मकोड़े, सबकी आत्माएं उस धाम में रहती हैं। इसीलिए उसको कहा जाता है परमधाम। बाकि तो छोटे-छोटे घर इस दुनिया में सबके अपने होते हैं जिनको भी धाम कहते हैं।

तो चित्र कौनसा देना है ये समझाने के लिए? हँ? थोड़ा सा बताया - झाड़ का चित्र देना है। लेकिन झाड़ के चित्र में क्या देना है? जड़ें देना है? तना देना है? डालियाँ देना? क्या देना है? अरे? हँ। तीन लोक का चित्र दिया हुआ है ना झाड़ के चित्र में। तो वो बताना है कि देखो इसमें शान्तिधाम कहाँ है? ऊँच ते ऊँच धाम है। क्या? जहाँ इस सृष्टि की सारी ही प्राणी मात्र की आत्माएं रहती हैं। अरे, प्राणी मात्र को छोड़ो जो प्राणी दिखाई पड़ते हैं। हँ? जो भी चैतन हैं, सबकी आत्माएं। अच्छा, वो पेड़-पौधे चैतन हैं या नहीं हैं? हँ? क्या पहचान? हँ? हाँ। चेतन की पहचान बताई, मुरली में भी बताई; हँ? चलते-फिरते को, थोड़ा आवाज़ भी करते हैं, तो उनको चैतन्य कहा जाता है। जो भी प्राणी मात्र हैं, पेड-पौधे से लेकरके सारे ही। चित्र में दिखाई देगा। नीचे है पृथ्वी। उसके चारों तरफ है वायुमण्डल। उसके चारों और है स्पेस। स्पेस में वो जड़ सूरज, चाँद, सितारे। लेकिन जो आत्माओं का धाम है बिन्दी, बिन्दु-बिन्दु आत्माओं का धाम वो तो सबसे पार, क्रास। क्या? स्पेस से भी पार। ये जो आकाश दिखाई देता है ना नीला-नीला, उसकी भी सीमा होगी। लेकिन इससे भी क्रास जो धाम है वो आत्माओं का धाम है। तो वो चित्र में दिखाना है। ये देखो। हँ?

तुम चित्र में दिखाओ और वहाँ आत्माओं का जखीरा दिखाओ। सारा आत्माओं का झाड़। उनमें दिखाओ कि विश्व में शान्ति कौन स्थापन कर सकता है? अरे, वो है परमधाम। तो परमधाम में जो परमपिता होगा वो ही अपने धाम में शान्ति स्थापन करेगा ना। हँ? तो वो तो है निराकार। आत्माएं भी निराकार। जहाँ निराकार आत्मा है वहाँ तो शान्ति-शान्ति। आत्मा है शान्त स्वरूप। तो आत्माएं जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आती हैं, तब हलन-चलन, शरीर लेने से आवाज़ शुरू होती है। तो बताओ, वो शिव बाप निराकार इस सृष्टि में आकरके जिनको निमित्त बनाता है; किस बात के लिए? सुख और शान्ति स्थापन करने के लिए। तो उनकी तरफ इशारा करके बताओ कि झाड़ के चित्र में शिव तो निराकार है, लेकिन उसके नीचे जो आत्माएं हैं, वो सब साकार हैं। तो उनमें जो अव्वल नंबर है, जिनके लिए कहा जाता है कि भगवान आते हैं तो नर को नारायण जैसा देवता, नारी को लक्ष्मी बनाते हैं।

तो इन लक्ष्मी-नारायण का जब राज्य था तब तो विश्व में शान्ति कहेंगे ना जरूर। हँ? अभी तुमने प्रजा के ऊपर प्रजा का राज्य चालू कर दिया। शान्ति कैसे होगी? तो लक्ष्मी-नारायण के राज्य स्थापन करने के लिए बाप आते हैं, ज्ञान देते हैं। लक्ष्मी-नारायण का राज्य कैसे स्थापन होता है? जहाँ सुख ही सुख होता है, दुख का नाम-निशान नहीं होता। वहाँ टोटल 100% शान्ति भी और सुख भी होता है। तो ज़रूर कहेंगे कि विश्व में शान्ति थी। बड़ी मनीशा है इसलिए उनको ही कहते हो ना हैविन कहते हो, जन्नत कहते हो। दैवी डीटी वर्ल्ड कहते हो, स्वर्ग कहते हो। तो देखो, ये कैसे नाम हैं? हँ? हैविन। क्या किया है? विन किया है। तो किसने विन किया है? उन्होंने विन किया है जिन्होंने अहिंसा का पाठ पढ़ाया कि हिंसा से विश्व की बादशाही नहीं मिलेगी। बड़े-बड़े इस दुनिया में निकले। हिटलर, नेपोलियन, मुसोलिनी। हं? अलेक्जेन्डर। कोई ने विश्व में शान्ति स्थापन नहीं कर पाई क्योंकि सब हिंसक थे। आत्मा जब अपन को पहचाने कि मैं शान्त स्वरूप हूँ, सुख स्वरूप हूँ, तो लक्ष्य मिल जाता है शान्त रहना है, शान्त करना है, सुखी रहना है, सुखी करना है। तो विश्व के ऊपर विजय होगी। विश्व की बादशाही मिलेगी। ये दुनिया में जो साधु-संत, महात्माएं होते हैं, कोई भी धरम में होते हैं, वो भी तो हिंसा करना नहीं सिखाते। तो भगवान आकरके कैसे हिंसा करना सिखाएंगे?

ये तो दुनिया का जो ऊँचे ते ऊँचा मूल ग्रंथ है गीता, उसी में ऋषि-मुनि, मनुष्यों ने ऐसी बातें लिख दी हैं कि खूने नाहक खेल हुआ। ये हुआ, वो हुआ। बड़े-बड़े शस्त्रों से, अस्त्रों से युद्ध हुआ। अब ऐसे कुछ थोड़ेही है। डीटी वर्ल्ड स्थापन होगी तो डीटीज़ को तो देवता ही कहा जाता है ना। वो तो सुख देने वाले होते हैं ना। वो ऐसी दुनिया में कैसे रहेंगे? दुनिया भी ऐसे स्थापन होगी उनके सहयोग से। कैसे स्थापन होगी? सो भारत में नाम लिया स्वर्ग। कैसे? स्वस्थिति में स्थित हो जाओ। स्व माने आत्मा। तो कहाँ चले जाएंगे? ग माने गया। कहाँ गए? स्वर्ग में चले गए। माने इसी दुनिया में जो 100% स्वस्थिति में स्थापन, स्थित हो सकते हैं, वो इसी दुनिया में स्वर्ग का अनुभव करेंगे। देखो, जैसे नाम रखे हैं, वैसा ही काम हुआ होगा ना। तो तुम बच्चों को तो ये बातें समझाना बहुत सहज, बिल्कुल सहज है कि ये शान्ति भारत में स्थापन होती है।

A morning class dated 11.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the second page on Tuesday was - The poor people of the world do not know anything as to when there was peace in the world. And how is that peace established. And who becomes instrumental in establishing that world peace. And who establishes? They simply keep on giving prizes. It is in your intellect that we are establishing peace in the world. This is why you children belong to the Father here. You are establishing peace in the world. To whom was it said? Hm? 'You are establishing' means that there are some persons face to face, in front of the eyes. So, it is called 'haazir-naazir' (present in front of the eyes). Now, how the children should be explained? You tell each other that you should organize a seminar, consult each other. So, there are such points; they desire a lot as to how peace could be established in the world. Hm? They keep on crying. There is a lot of peacelessness in the world. Achcha, if there is a lot of peacelessness, then how will peace be established? Hm? When was peace established in the world first? It was indeed established. When there is a desire, then it must have definitely been established. So, how was it established? Hm? What was the method adopted for world peace so that peace was established in the world? Hm? Is there any deity of peace (shaantideva) praised in the scriptures? Hm? So many founders of religions came; peace was not established in the world. Peacelessness went on increasing further.

So, the first topic is that which peace is required? Hm? Children, nobody knows this. So, you should keep that picture in front of them. Which picture? Hm? Is there any picture, hm, through which you could explain? Hm?
(Someone said something.) Shankar's picture! Hm? If he sees the picture of a snake he will run away immediately. Hm? Arey, it was asked as to what is peace. Lakshmi and Narayan are in the front. Hm? The Tree is peace. Anything else? Hm? The Supreme Abode (Paramdhaam) is peace. It is correct. Dhaam means home. Param means the biggest home. Such a big home where not just the souls of the deities, human beings, sages and saints or demons live. Souls of all the animals, birds, worms and insects live there. This is why it is called Supreme Abode. Each one has a small house in this world, which are called dhaam.

So, which picture should be given to explain? Hm? You said a little - The picture of the Tree should be given. But what should be shown in the picture of the Tree? Should you show the roots? Should you show the stem? Should you show the branches? What should you show? Arey? Hm. The picture of the three abodes has been given in the picture of the Tree, hasn't it been? So, you should tell that - Look, where is the abode of peace in this? It is the highest on high abode. What? It is the place where the souls of all the living beings of this world live. Arey, leave alone the living beings (praani maatra) which are visible. Hm? Souls of all the living beings (chaitan). Achcha, are those trees and plants living or not? Hm? What is the indication? Hm? Yes. The indication of a living thing was mentioned; it was mentioned in the Murli also; hm? The one who walks and moves, and also produces a little sound is called living thing (chaitanya). All the living beings, everyone from the trees and plants. It will be visible in the picture. There is the Earth below. There is atmosphere all around it. There is space around that. There are those non-living Sun, Moon and stars in the space. But the abode of the souls, the abode of the point like souls is beyond everything else, across them. What? Across even the space. There will be a limit of even this blue sky that is visible. But the abode that is present across even this is the abode of the souls. So, you should show that in the picture. Look at this. Hm?

You show in the picture and there you show the group of souls. The entire tree of souls. Show among them that who can establish peace in the world? Arey, that is the Supreme Abode. So, the Supreme Father in the Supreme Abode will establish peace in His abode, will He not? Hm? So, He is incorporeal. The souls are also incorporeal. The place where there are incorporeal souls, there is only peace. The soul is an embodiment of peace. So, the souls, which come on this world stage, then, when they assume a body, then movement and sound starts. So, tell, the ones whom the incorporeal Father Shiv comes and makes instrumental in this world; for what? To establish happiness and peace. So, point out towards them and tell that Shiv is incorporeal in the picture of the Tree, but the souls below Him are all corporeal. So, among them the one who is number one, for whom it is said that when God comes, then He makes man a Narayan like deity and makes woman Lakshmi.

So, when there was the kingdom of Lakshmi-Narayan, then there will definitely be peace in the world. Hm? Now you have started the rule of subjects over subjects. How will there be peace? So, the Father comes to establish the kingdom of Lakshmi-Narayan, gives knowledge. How is the kingdom of Lakshmi-Narayan established? It is a place where there is just happiness and no name or trace of sorrows. There is total 100% peace as well as happiness there. So, definitely it will be said that there was peace in the world. ....This is why you call it heaven, Jannat. You call it divine deity world, swarg. So, look, what kind of names are these? Hm? Heaven. What did they do? They have achieved a 'win'. So, who has achieved a 'win'? Those who taught the lesson of non-violence that the emperorship of the world cannot be achieved through violence, have achieved a 'win'. Big ones have emerged in this world. Hitler, Napoleon, Mussolini. Hm? Alexander. Nobody could establish peace in the world because all were violent. When the soul recognizes itself that I am a peaceful soul, happy soul, then it gets a goal that it has to remain peaceful, make others peaceful, it has to remain happy, make others happy. Then it will conquer the world. It will get the emperorship of the world. The sages, saints, mahatmas who exist in any religion in this world do not teach violence. So, how will God come and teach violence?

It is the highest on high original scripture of the world, the Gita, in which the sages, the saints, the human beings have written such topics that needless bloodshed took place. This happened, that happened. War was fought with big arms, weapons. Well, there is no such thing. When the deity world is established, then deities are called deities only, aren't they? They are givers of happiness, aren't they? How will they remain in such a world? The world that is established with their help would also be like this. How will it be established? So, the name of 'swarg' was mentioned in India. How? Become constant in soul conscious stage (swasthiti). Swa means soul. So, where will they go? Golden Age means went (gaya). Where did they go? They went to heaven. It means that in this very world, those who become constant in 100% soul conscious stage will experience heaven in this world itself. Look, the task must have been performed according to the names coined, were they not? So, it is very easy, completely easy for you children to explain these topics that this peace is established in India.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 09 Apr 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2540, दिनांक 06.06.2018
VCD 2540, Date 06.06.2018
प्रातः क्लास 11.7.1967
Morning Class dated 11.7.1967
VCD-2540-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.20
Time- 00.01-19.20


प्रातः क्लास चल रहा था - 11.7.1967. मंगलवार को तीसरे पेज के चौथी लाइन में बात चल रही थी, पाँचवीं लाइन में – विश्व में शान्ति कब थी, वो कोई को पता नहीं है। शान्ति थी 5000 वर्ष पहले। एकदम डेड साइलेन्स। ये बातें कोई नहीं जानते हैं। जबकि उन्होंने कलहयुगी फतहयुगी सभी दूर कर दिये, 40000 बताय दिया अभी बचे हैं कलियुग के। कितनी दूर की बात हो गई। तो मुख्य बात है जबकि आपस में मिलते हो या कहते हो सेमिनार। ये अक्षर तो हैं अंग्रेजी में कॉमन बिल्कुल। तो है ये मुख्य बात क्योंकि सब कहते हैं विश्व में शान्ति कैसे हो? विश्व में शान्ति कैसे हो? कहते हैं। समझा ना। अभी सभी आत्मा हैं ना। आपस में मिलकरके क्योंकि समय आ गया है तो इसलिए विश्व में शान्ति होनी चाहिए। बिचारी सभी आत्माएं पुकारती हैं। और तुम पुरुषार्थ कर रहे हो श्रीमत पर विश्व में शान्ति स्थापन करने के लिए क्योंकि तुम जानते हो। वो तो जानते नहीं हैं। तुम जानते हो कि आत्मा शान्त स्वरूप है। तो उस स्थिति में टिकने की अभ्यास करते हो।

तो देखो, वो दुनियावालों में और तुम्हारे में कितना रात-दिन का फर्क हो जाता है। तो मुख्य उन दुनियावालों को समझाना ही क्या है? बोलो, विश्व में शान्ति चाहते हो ना। चाहते हो, इच्छा है, माने कभी शान्ति ऐसी भोगी है ना। तो विश्व में शान्ति थी ना कभी। तो कहाँ थी? सारे विश्व में थी या भारत में पहले थी? हँ? सुख-शान्ति की दुनिया कहाँ होती है जहाँ सुख ही सुख हो, शान्ति ही शान्ति हो, दुख-अशान्ति का नाम-निशान न हो। तो पहले तो थी शान्ति। फिर बाद में सुख की दुनिया भी आती है। जैसे लोग दुनिया में भी सो जाते हैं तो शान्ति मिल जाती है। गहरी नींद सो गए तो एकदम शान्ति। फिर बाद में अशान्ति। तो भई, कौनसे युग में कहें शान्ति? दुनिया और दुनिया की हर चीज़ चार अवस्थाओं से पसार होती है। तो शान्ति कब थी? जरूर कहेंगे सतयुग में। शान्ति का स्वराज्य था। हँ? शान्ति का स्वराज्य था? वो शान्तिधाम में नहीं होता है? सतयुग में होता है? हँ? शान्ति का स्वराज्य सतयुग में होता है जहाँ कृष्ण की आत्मा 16 कला संपूर्ण पार्ट बजाती है, वहाँ शान्ति का स्वराज्य होता है या शान्तिधाम में होता है? हँ? सतयुगी दुनिया में शान्ति का राज्य होता है? हँ? संगमयुगी सतयुगी दुनिया में। हाँ, जिसे कहते हैं वैकुण्ठ। तो शान्ति का स्वराज्य। लेकिन वैकुण्ठ भी तो पराकाष्ठा है। किस बात की? हँ? शान्ति की पराकाष्ठा कि सुख की पराकाष्ठा? कहेंगे, सुख की पराकाष्ठा क्योंकि सतयुग में तो इन्द्रियों का सुख होता है, ज्ञानेन्द्रियों का। और जो पुरुषोत्तम संगमयुग में सुख होता है वो ज्ञानेन्द्रियों का होता है? नहीं। अतीन्द्रिय सुख होता है। तो वो तो सुख का अखूट भण्डार जैसे हो गया ना। वहाँ तो इन्द्रियों की भी दरकार नहीं।

तो फिर शान्ति का स्वराज कब हुआ? किसे कहें असली शान्ति का स्वराज्य? हँ? राज्य। क्योंकि इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर शान्तिधाम से जो आत्माएं आती हैं वहाँ तो कोई राज्य करने की बात है ही नहीं। तो फिर इस दुनिया में शान्ति का स्वराज्य कैसे होता है? कहाँ होता है? हँ? होता भी है या नहीं होता है? भारत में होता है? अरे, भारत में; भारत में वैकुण्ठ भी तो होता है। सुख की पराकाष्ठा भी तो होती है। हँ? लेकिन वहाँ शान्तिधाम कहें? हँ? वैकुण्ठ में आपस में मिलेंगे-जुलेंगे नहीं? बातचीत नहीं करेंगे? भले इशारे से करेंगे। हँ?


(किसी ने कुछ कहा।) माउंट आबू में शान्ति का स्वराज्य होगा? हँ? वहाँ सारी दुनिया से; (किसी ने कुछ कहा।) परमब्रह्म। हँ। जिसे हम कहते हैं ब्रह्मा नाम अनेकों के हैं। तो होते तो हैं नंबरवार। तो जो अव्वल नंबर है परमब्रह्म, वो बड़े ते बड़ी माँ हो गई ना। तो उस माँ के पेट से तो सभी बच्चे जन्म लेते हैं। और वो? माँ भी है, पर्सनालिटी माँ की भी है और बाप की भी है। उन्होंने चित्र बनाय दिया अर्धनारीश्वर। हँ? आधी नारी आधा पुरुष। अब ऐसे तो होता नहीं कि शंकरजी आधे एक तरफ खड़े हो जाएं: उनका आधा हिस्सा निकाल दिया जाए और पार्वती का आधा हिस्सा निकाल लिया जाए और दोनों को जोड़ दिया जाए। हँ? वो तो जरासंध जैसा हो गया राक्षस। हँ? नहीं। ऐसी कोई बात थोड़ेही है। हँ? ये एक ही व्यक्तित्व की बात है जो इस सारी सृष्टि का बीज है। क्या? इस सृष्टि में शान्ति भी है, सुख भी है, और दोनों मिक्स भी है। शान्ति, अशान्ति, सुख और दुख।

तो सृष्टि रूपी झाड़ बताया है। झाड़ से तुलना की जाती है। अश्वत्थ वृक्ष नाम दिया है। क्यों नाम दिया? अश्व माने क्या? हँ? अश्व माने मन रूपी घोड़ा। उसको बुद्धि की लगाम न लगाई जाए तो गड्ढे में ले जाता है। तो कौन हुआ मन रूपी घोड़ा? हँ? जिसको कहते हैं कि मन बड़ा चंचल है। चन्द्रमा का टाइटल देते हैं। ज्ञान चन्द्रमा ब्रह्मा। हँ? तो जरूर वो आत्मा को जो ब्रह्मा के रूप में पार्ट बजाती है संगमयुग में तो वो नीचे की ओर ले जाती है या ऊपर की ओर ले जाती है? नीचे ले जाने वाली है क्योंकि मन रूपी घोड़े का काम ही है चंचलता करना। तो सारी इन्द्रियों को भी क्या करेगा? चंचल ही बनाएगा ना। तो उस मन रूपी घोड़े को, अश्व को इत्थ, स्थिर कर दिया। क्या? कैसे स्थिर कर दिया? हँ? घोड़ा है; वो तो जानवर है। कैसे स्थिर कर दिया? हँ? मनु्ष्य हों तो ज्ञान सुनें, समझें। नहीं। स्थिर कैसे किया? योगबल से स्थिर कर दिया। तो योग; कैसा योग? किससे योग? हँ? किसने लगाया योग? हँ? योग किसने लगाया? किससे लगाया? हँ? हाँ। जो मनुष्य सृष्टि का बीज है, राम बाप को कहा जाता है, कृष्ण बच्चे को कहा जाता है। तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर जो बीज रूप आत्मा राम बाप है, वो आत्मा जिसे आदम, एडम, आदिनाथ, आदि देव कहा जाता है, तो वो शिव बाप को गहराई से पहचान करके, हँ, क्या पहचान करके जो और आत्माएं नहीं पहचानतीं? हँ? अरे? क्या खास बात पहचान लेता है? हँ? अरे? दुनिया के सारे काम पवित्रता की पावर से होते हैं। हँ?

और एक होती है देह की पवित्रता और दूसरी होती है आत्मा की पवित्रता। तो वो किसके पास है? हँ? एक शिव के पास है। वो पवित्रता में क्या है? ज्ञान। हँ? पवित्र ज्ञान। जैसे कहते हैं ना पवित्र जल, जिसमें कुछ भी मैल-माटी न हो। एकदम पारदर्शी। क्या? नहीं तो दुनियावालों ने जो ज्ञान सुनाया, इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, गुरुनानक, आदि ने जो भी ज्ञान सुनाया, ऋषि-मुनियों ने जो भी ज्ञान सुनाया, हँ, ढ़ेर सारे प्रश्न। हँ? प्रश्नों का जवाब ही नहीं। जवाब नहीं तो लोगों ने समझ लिया कि ये तो सब अंधश्रद्धा सिखाते हैं क्योंकि हर बात का जवाब होना चाहिए ना, क्लेरिफिकेशन होना चाहिए ना। तो किसी का ज्ञान पारदर्शी नहीं। बड़े ते बड़े महर्षि, ऋषि कहे जाते हैं व्यास ऋषि, जिन्होंने सबसे ज्यादा शास्त्र लिखे हैं, उनके ज्ञान में भी? हँ? क्लेरिटी नहीं।

तो इस सृष्टि पर वो सुप्रीम सोल ज्योतिबिन्दु शिव, हँ, जब आते हैं, जो ज्ञान का अखूट भण्डारी है, क्योंकि वो जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता। क्यों नहीं आता? कल भी बताया था। हँ? वो भोगी नहीं है। अभोक्ता है। क्या? इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली आत्माओं में एक ही आत्मा है जो अभोक्ता है। बाकि सब? बाकी सब भोगी। ए टू ज़ेड जो सृष्टि चक्र में आते हैं। वो चक्कर में नहीं आता। जो चक्र में आए तो फिर इनकी गिनती में भी आ जाए। कौन नहीं चक्र में आता? शिव नहीं आता चक्र में।

तो वो ज्ञान का अखूट भण्डारी है। और वो अखूट भण्डारी कहाँ का वासी है? हँ? सदा शान्तिधाम का वासी है। इस सृष्टि पर आता है तो भी शान्त रहता है। हँ? कोई ब्रह्माकुमार-कुमारियों से, पुरानों से पूछो, ब्रह्मा के तन में आते थे तो कभी अशान्त देखा? हँ? किसी ने देखा? कभी किसी ने नहीं देखा होगा। अकेले दादा लेखराज ब्रह्मा की बात नहीं। जिन किन्हीं शरीरधारियों में प्रवेश करके ब्रह्मा के रूप में नाम दिया हो, पार्ट बजाया हो, टेम्परेरी हो या मुकर्रर रथ हो, तो उनके तन में आकरके ज्ञान नहीं पूरा सुनाया। क्या? पूरा ज्ञान कहाँ से निकलता है फिर? अरे, कौनसा इंस्ट्रूमेन्ट है जिसके द्वारा पूरा ज्ञान सुनाते हैं, वो स्पीकर कौनसा है? हाँ, मुकर्रर रथ। वो भी आदि में नहीं। अंत में जाकरके। हर प्रश्न का समाधान। हर व्यक्ति का समाधान। आज नहीं तो कल हर मनुष्यात्मा कन्विन्स होगी अगर अडियल नहीं है, सडियल नहीं है, हठी नहीं है। भले आज नहीं मानते हैं, कल सन्मुख आएंगे, मानेंगे जरूर। क्या? ये खासियत। क्या बात? इसलिए तुलसीदास ने लिखा था रामायण में – सन्मुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं। क्या? ये वास्तव में तुलसीदास का महावाक्य नहीं है। वास्तव में तो ये संगमयुग में वो ही राम वाली आत्मा में शिव बाप आकरके सुप्रीम टीचर या सद्गुरु का पार्ट बजाते हैं तो उस समय की बात है।

A morning class dated 11.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the fourth line, fifth line of the third page on Tuesday was - Nobody knows as to when was there peace in the world. There was peace 5000 years ago. Complete dead silence. Nobody knows these topics. When they have made Kalahyugi, fatahyugi so distant and have told that there are still 40000 years left in the Iron Age (Kaliyug). It is a topic of such distant future. So, the main topic is that when you meet each other or you may call it seminar, these words are very common in English. So, this is the main topic because everyone says - How should there be peace in the world? How should there be peace in the world? They say. Did you understand? Now everyone is a soul, is not it? By coming together because the time has arrived; so, this is why there should be peace in the world. All the poor souls call [God]. And you are making purusharth on Shrimat to establish peace in the world because you know. They do not know. You know that the soul is peaceful. So, you make efforts to become constant in that stage.

So, look, there is a world of difference between those people of the world and you. So, what is the main point that you should explain to those people of the world? Tell, you want peace in the world, don't you? You want, you have a desire; it means that you have enjoyed such peace at some point in time, haven't you? So, there was peace in the world at some point in time, wasn't there? So, where was it? Was it in the entire world or was it first in India? Hm? Where does the world of happiness and peace exist where there is only happiness, only peace and there is no name or trace of sorrows and peacelessness? So, there was peace earlier. Then later on, the world of happiness also comes. For example, people in the world also get peace when they sleep. If they sleep in deep slumber then there is complete peace. Then later on disturbance. So, brother, in which Age should we say there was peace? Everything in the world passes through four stages. So, when was there peace? It will be definitely said - In the Golden Age. There was self-rule (swarajya) of peace. Hm? Was there a swarajya of peace? Does it not exist in the abode of peace? Does it exist in the Golden Age? Hm? The swarajya of peace exists in the Golden Age where the soul of Krishna plays a part of being perfect in 16 celestial degrees; does the swarajya of peace exist there or in the abode of peace? Hm? Does the rule of peace exist in the Golden Age world? Hm? In the Confluence Age Golden Age world. Yes, it is called Vaikunth. So, the swarajya of peace. But Vaikunth is also an epitome. Of what? Hm? Epitome of peace or an epitome of happiness? It will be said - Epitome of happiness because there is pleasure of organs, of the sense organs in the Golden Age. And is the pleasure that exists in the Purushottam Sangamyug (elevated Confluence Age) a pleasure of sense organs? No. It is a supersensuous joy. So, it is like an inexhaustible store house of happiness, is not it? There is no need even for organs there.

So, when did the swaraj of peace exist? What should be called the true swarajya of peace? Hm? Raajya (rule) because the souls come from the abode of peace on this world stage; there is no question of ruling there at all. So, then how does the self-rule of peace exist in this world? Where does it exist? Hm? Does it exist or not? Does it exist in India? Arey, in India; There is Vaikunth also in India. There is also an epitome of happiness. Hm? But will it be said to be an abode of peace there? Hm? Will you not meet each other in Vaikunth? Will you not talk? Although you will talk through gestures. Hm?


(Someone said something). Will there be swarajya of peace in Mount Abu? Hm? There, from the entire world; (Someone said something). Parambrahm. Hm. The one whom we call Brahma is the name of many. So, they are numberwise. So, the number one Parambrahm, is the seniormost mother, is not he? So, all the children are born from the womb of that mother. And he? He is a mother also; the personality is of the mother also and the Father also. They have prepared the picture of Ardhanaareeshwar. Hm? Half woman, half man. Well, it does not happen that half of Shankarji stands on one side; half of his body is separated and half of Parvati's body is separated and both are joined together. Hm? That will become a demon like Jarasandh. Hm? No. It is not so. Hm? It is about the same personality who is the seed of the entire world. What? There is peace as well as happiness in this world and both are mix also. Peace, peacelessness; happiness and sorrows.

So, the tree-like world has been mentioned. It is compared with a tree. It has been named Ashwatth tree. Why was this name assigned? What is meant by ashwa? Ashwa means horse like mind. If it is not reigned in through the intellect, then it takes you to the pit. So, who is the mind like horse? Hm? The one for whom it is said that the mind is very inconstant. The title of the Moon is given. The Moon of knowledge Brahma. Hm? So, definitely dose that soul, which plays a part in the form of Brahma in the Confluence Age take you below or take you up? It takes you down because the task of the horse like mind itself is to display inconstancy (chanchaltaa). So, what will he make all the organs also? He will make them inconstant only, will he not? So, he made that horse-like mind constant (ittha). What? How did he make it constant? Hm? He is a horse; he is an animal. How did he make it constant? Hm? If it is human beings, they will listen to knowledge, understand it. No. How did he make it constant? He made it constant through the power of Yoga. So, Yoga; what kind of Yoga? Yoga with whom? Hm? Who had Yoga? Hm? Who had Yoga? With whom did he have Yoga? With whom did he have [Yoga]? Hm? Yes. The seed of the human world; the Father is called Ram; the child is called Krishna. So, the seed-form soul, Father Ram on this world stage; that soul who is called Aadam, Adam, Aadinath, Aadi Dev; so, he recognizes Father Shiv deeply, hm, what does he recognize that other souls do not recognize? Hm? Arey? Which special topic does he recognize? Hm? Arey? All the tasks of the world are accomplished through the power of purity. Hm?

And one is the purity of the body and the other is the purity of the soul. So, who possesses that? Hm? One is with Shiv. What is there is purity? Knowledge. Hm? Pure knowledge. For example, it is said pure water, which does not contain any dirt or mud. Completely transparent. What? Otherwise, whatever knowledge was narrated by the people of the world, whatever knowledge was narrated by Ibrahim, Buddha, Christ, Guru Nanak, etc., whatever knowledge was narrated by the sages and saints, hm, there are numerous questions. Hm? There is no answer for the questions. If there is no answer then people thought that all these people teach blind faith because there should be an answer for every topic, there should be clarification, shouldn't there be? So, nobody's knowledge is transparent. Sage Vyas is said to be the biggest Maharshi, sage, who wrote the maximum number of scriptures. Even in case of his knowledge, hm, there is no clarity.

So, when that Supreme Soul point of light Shiv comes in this world, hm, who is an inexhaustible stock house of knowledge, because He does not pass through the cycle of birth and death. Why doesn't He pass through it? It was told yesterday as well. Hm? He is not a pleasure-seeker (bhogi). He is abhokta (non-pleasure seeker). What? There is only one soul among those who play their parts on this world stage who is abhokta. All others? All others are bhogis. A to Z everyone comes in the world cycle. He does not pass through the cycle. The one who passes through the cycle comes into calculation as well. Who doesn't pass through the cycle? Shiv doesn't pass through the cycle.

So, He is an inexhaustible stock house of knowledge. And that inexhaustible stock house is a resident of which place? Hm? He is a forever resident of the abode of peace. Even when He comes in this world, He remains peaceful. Hm? As any Brahmakumar-kumaris, ask the old ones, when He used to come in the body of Brahma, did they find Him to be disturbed ever? Hm? Did anyone see? Nobody must have seen. It is not about Dada Lekhraj alone. In whichever bodily beings He entered and named them Brahma and played His part, be it the temporary Chariot or the permanent Chariot; so, He came in their body and did not narrate the complete knowledge. What? Where does the complete knowledge emerge then? Arey, which is that instrument through whom He narrates complete knowledge? Who is that speaker? Yes, the permanent Chariot. That too, not in the beginning. In the end. Solution of every question. Solution for every person. If not today, tomorrow every human soul will be convinced, if it is not obstinate, if it is not rotten, if it is not stubborn. They may not accept today, when they come face to face tomorrow, they will definitely accept. What? This specialty. What is the topic? This is why Tulsidasji wrote in the Ramayana - Sanmukh hoi jeev mohi jabahin. Janma koti agh nasahi tabahin. What? This is actually not the statement of Tulsidas. Actually, it is about the time in the Confluence Age when the Father Shiv comes in the soul of Ram and plays the part of Supreme Teacher or Sadguru.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 10 Apr 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2541, दिनांक 07.06.2018
VCD 2541, Date 07.06.2018
प्रातः क्लास 11.7.1967
Morning Class dated 11.7.1967
VCD-2541-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.20
Time- 00.01-16.20


प्रातः क्लास चल रहा था - 11.7.1967. मंगलवार को तीसरे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी –पुरानी दुनिया में देखो अभी अनेक धर्म हैं, ढ़ेर के ढ़ेर। और फिर ऊपर से माया का राज्य। माया के राजा, माया का राज्य, वो भी अभी अंत। लेकिन अंत में बड़ा भभका है। बहुत पॉम्प एण्ड शो। भक्ति की पॉम्प है ना। दिन-प्रतिदिन देखो बढ़ते जाते हैं। जैसे रावण को हर साल जलाते हैं फिर हर साल बड़ा हो जाता है। आज वो संगम जब होते हैं, नदियों के संगम होते हैं ना। कुम्भ के मेला। तो आगे तो 50000, लाख-लाख, दो-दो लाख, अभी तो देखो बीस-बीस लाख इकट्ठे हो जाते हैं। तो मनुष्यों की जनसंख्या भी तो बढ़ती जाती है ना। तो वो भी तो भक्ति में बहुत जाते हैं ना। देखते हैं ये बहुत जाते हैं। फिर इनमें जरूर कुछ तो फायदा होगा, पुण्य होगा, कुछ होगा। तो ढ़ेर के ढ़ेर जाते रहते हैं। अब तक तुम बच्चों को नॉलेज मिली है कि नहीं, कि इन मेले-मलाखड़ों से कोई फायदा नहीं होने वाला। कोई पावन नहीं हो सकता। हँ? शूटिंग कहाँ होती है? ब्राह्मणों की संगमयुगी दुनिया में ही शूटिंग होती है। ऐसे-ऐसे ब्राह्मण बड़े-बड़े मेले-मलाखड़े करते रहते हैं। चैतन्य ज्ञान नदियाँ इकट्ठी होती हैं। सागर तो होता नहीं। भक्तिमार्ग में दे दिया कुंभ का मेला। कुंभ कहते हैं कलष को, घड़े को। ज्ञान का कलष है। अब रास्ता तो ये कोई नहीं है ना जिससे कोई पावन बन सके।

पावन बनने के लिए तो सिर्फ एक ही पतित-पावन है। भक्तिमार्ग में कहते हैं ना पतित पावन आओ। तो जरूर कभी आए होंगे ना। पतितों को पावन बनाया होगा। उनके आने के बिगर और तो कोई भी रास्ता नहीं मिलेगा कि हम पतित दुनिया में हैं। इस दुनिया से फिर हमें नई दुनिया में जाना है। अभी दुनियाएं तो दो हैं। बच्चे बात समझ जाते हैं। दुनिया भले एक है परन्तु जो नई दुनिया बनती है वो ही फिर पुरानी हो जाती है। तो एक है नई दुनिया, दूसरी है पुरानी दुनिया। तो ये तो सब कोई जानते हैं कि नई दुनिया थी। उसमें नया भारत, नई दिल्ली थी। अभी देखो भक्तिमार्ग में भी उन्होंने नई दिल्ली बना रखी है। हँ? सारी दिल्ली लाल पत्थरों की। हँ? लाल पत्थरों की क्यों? हँ? कहाँ शूटिंग होती है? ब्राह्मणों की संगमयुगी दुनिया में ही शूटिंग होती है। लाल रंग तो क्रोध का सूचक है ना। तो नई दिल्ली नाम दे देते हैं। अब नई दिल्ली ये तो जानते हो नई दिल्ली तो नई दुनिया में होगी। नई दुनिया होगी तब नई दिल्ली होगी। तो वहाँ तो एव्रीथिंग न्यू। तुम्हारा भी ये जो है ना, ये गांव मथुरा और वृंदावन। और ये जहाँ-जहाँ कहते थे कि थे।

तो वो मथुरा, वृंदावन वो कोई न्यू तो नहीं हैं ना। ये तो न्यू होने का है जिसमें नया राज्य होगा। कौन न्यू होने का है? हँ? किसकी बात हो रही थी? दिल्ली की बात हो रही थी ना कि दिल्ली पुरानी, दिल्ली नई। भारत पुराना, भारत नया। तो क्या सिर्फ जड़ जमीन की ही बात है? कोई निमित्त में चैतन्य आत्मा भी तो होगी ना। जब बाप आते हैं तो ह्यूज ड्रामा की शूटिंग कराते हैं। तो इस समय पहले तो वो चैतन्य दिल्ली भी पुरानी होगी या नई? पुरानी होती है। फिर नई हो जाती है। नई हो जाती है तो क्या अंतर पड़ता है? हँ? पुरानी दिल्ली नई, वो नई होती है तो अंतर क्या पड़ता है? हँ? उसका नाम बदल जाता है कुछ? हँ? महालक्ष्मी नाम देते हैं ना। क्योंकि देवियाँ भी जो दिखाते हैं उनमें अव्वल नंबर और लास्ट नंबर; अव्वल नंबर महागौरी और लास्ट नंबर? महाकाली। तो महाकाली को भी नया होना है या नहीं होना? तो जब वो नई बनती है तो फिर महालक्ष्मी कही जाती है।

तो हुआ ये स्वराज जहाँ आत्मा का राज होता है। स्व माने ही आत्मा। अब ये पुराना राज हो गया। पुराना माना तमोप्रधान। तो दुनिया कैसी होगी? दुनिया भी पुरानी तो पुराना राज्य। नई दुनिया में नया राज्य। तो पुरानी दुनिया में ये देखते हो क्या राज्य होते हैं। ये तुम्हारे को सब मालूम है ना बच्चे कि पुराना किसको कहा जाता है, नया किसको कहा जाता है? वो भी तो तुम समझते हो ना। हँ? वो तो नई दुनिया को नहीं जानते हैं ना। शास्त्रों में लिख दिया है तो समझते हैं कि नई दुनिया 40 हज़ार वर्ष के बाद आएगी। कलियुग की आयु 40,000 वर्ष बताय देते हैं। तो देखो, कोई कम अज्ञान की नींद में थोड़ेही पड़े हुए हैं? घोर अज्ञान की नींद। तो उसे अज्ञान ही कहा जाता है ना। अभी तुम बच्चे समझ गए कि ये सारा भक्तिमार्ग में कितना बखेड़ा है। और देखो, ये भक्ति का फैलाव कितना बड़ा है। और इसको ही कहा जाता है अज्ञान। और ज्ञान तो सागर है ना। और वो सागर एक है ना। ये भक्तिमार्ग में तो सागर भी देखो कितने बांट दिये हैं। सात-सात सागर बनाय दिये। बाप को देखते हो। बाप कोई कुछ भक्ति कराते हैं क्या? वो भक्ति के लिए कहते हैं कुछ? कहते हैं क्या राम-राम कहो? कहाँ न कहाँ जाते हैं ना कुछ-कुछ।

तो देखो, यहाँ बाप तो भक्तिमार्ग का कुछ भी नहीं, जरा भी नहीं कि तुम बच्चों को समझाते हैं कि इस सृष्टि का चक्कर कैसे फिरता है? इसलिए ये समझानी तो जरूर चाहिए। क्योंकि हरेक की बुद्धि में हिस्ट्री और जाग्राफी तो होनी ही चाहिए। सारी सृष्टि की हिस्ट्री और जॉग्राफी। तो बच्चों की बुद्धि में है वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी। क्योंकि तुम ऐसी एजुकेशन पा रहे हो। इसमें सारी दुनिया की आदि, मध्य, अंत की कहानी आ जाती है। तो इसका नाम ही है रूहानी एजुकेशन। अर्थात् स्प्रिचुअल नॉलेज है। अभी तो स्प्रीचुअल नॉलेज वाले भी बहुत गपोड़े मारते रहते हैं। 11.7.67 की वाणी का चौथा पेज। वो गपोड़े मारने वाले बोलते रहते हैं। हम स्प्रीचुअल नॉलेज देने आते हैं। अब ये तो तुम बच्चे जानते हो कि वो स्प्रीचुअल नॉलेज का अर्थ तो बिल्कुल नहीं जानते। हँ? स्प्रिट माना ही आत्मा। पावर। स्प्रिचुअल नॉलेज माने फादर, जो स्प्रिचुअल फादर है, ज्ञान का सागर है, उनको कहा ही जाता है स्प्रिचुअल नॉलेजफुल फादर। स्प्रिचुअल फादर माना सिर्फ स्प्रिट है, आत्मा है। उनको जिसम नहीं है। और जिसम नहीं है, रूह हैं, तो किससे बात करेंगे? रूहों से बात करेंगे ना। और जिनको जिसम है, वो तो तुम जानते हो कि जिस्म जिस्मों से बात करते हैं। तो ये रूहानी बाप रूहानी बच्चों को एक ही दफा बात करने के लिए आते हैं। ये एक ही बार बात होती है। रूहानी रूह पढ़ाते हैं। वो भी कोई हिस्ट्री जॉग्राफी में है ही नहीं रूह की बातें। वहाँ भी देखो कृष्ण का नाम डाल दिया। तो फिर बिचारे मनुष्य क्या समझेंगे? कुछ भी नहीं समझेंगे। तुम बच्चे तो जानते हो कि हमको तो रूहानी बाबा पढ़ाते हैं।

A morning class dated 11.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the third page on Tuesday was - Look, there are many, numerous religions in the old world now. And then there is a kingdom of Maya on top of it. Kings of Maya, kingdom of Maya; that too is at the fag end now. But there is a lot of pomp in the end. Lots of pomp and show. It is pomp of Bhakti, is not it? Look, day by day it goes on increasing. Just as Ravan is burnt every year; then it grows bigger again. Today, when that confluence takes place; there are confluences of rivers, aren't there? Kumbh mela (fair). So, earlier there used to be 50,000, one lakh, two lakh public; now look, up to twenty lakh people gather. So, the population of human beings goes on increasing, doesn't it? So, lots of people go there in Bhakti, don't they? They see that lots of people go. Then there must be definitely some benefit, some punya, something in it. So, numerous people keep on going. Till now you children have received the knowledge that no, there is no benefit from these fairs. Nobody can become pure. Hm? Where does the shooting take place? The shooting takes place in the Confluence Age world of Brahmins only. Brahmins keep on organizing such big fairs. The living rivers of knowledge gather. There is no ocean. The name assigned on the path of Bhakti is 'kumbh ka mela' (kumbha fair). A pot, an urn is called Kumbh. It is a pot of knowledge. Well, this is not the path through which one could become pure.

In order to become pure there is only one purifier of the sinful ones (patit-paavan). It is said on the path of Bhakti - O purifier of the sinful ones, come. So, definitely He must have come at some point in time, hadn't He? He must have made the sinful ones pure. Unless He comes nobody will find the path that we are in a sinful world. We have to then go from this world to the new world. Now there are two worlds. Children understand this topic. Although the world is one, but the new world which is established becomes old. So, one is the new world and the other is the old world. So, everyone does know that there was a new world. There was a new India, New Delhi in it. Now look, on the path of Bhakti also they have made a New Delhi. Hm? The entire Delhi is constructed with red stones. Hm? Why of red stones? Hm? Where does the shooting take place? The shooting takes place in the Confluence Age world of Brahmins only. Red colour is indicative of anger, is not it? So, they give the name New Delhi. Well, as regards the New Delhi, you know that New Delhi will be in the new world. New Delhi will exist when the new world exists. So, there everything is new. Your villages Mathura and Vrindavan. And wherever they say that he (Krishna) used to live.

So, that Mathura, Vrindavan are not new, are they? This is going to become new in which there will be a new kingdom. Who is going to become new? Hm? Whose topic was being discussed? Delhi's topic was being discussed that old Delhi and New Delhi. Old India, new India. So, is it just about the non-living land? There must be a living soul also instrumental, is not it? When the Father comes, then He causes the shooting of the huge drama. So, at this time initially will that living Delhi also be old or new? It is old. Then it becomes new. What is the difference when it becomes new? Hm? What is the difference when the old Delhi becomes new? Hm? Does its name change a little? Hm? It is assigned the name Mahalakshmi, is not it? Because among all the Devis who are depicted, someone is number one and someone is last number; Number one is Mahagauri and last number? Mahakali. So, is Mahakali also to become new or not? So, when she becomes new, then she is called Mahalakshmi.

So, this is Swaraj (self-rule) where there is rule of the soul. Swa itself means soul. Now this is old rule. Old means tamopradhan (degraded). So, how will the world be? The world is also old and the kingdom is also old. There will be new kingdom in the new world. So, you observe that what kind of kingdoms exist in the old world? Children, you know everything that what is called old and what is called new? You understand that as well, don't you? Hm? So, they do not know the new world, do they? It has been written in the scriptures, so they think that the new world will come after 40,000 years. The duration of the Iron Age (Kaliyuga) is mentioned to be 40,000 years. So, look, are they in any less slumber of ignorance? It is slumber of complete ignorance. So, that is called ignorance only, is not it? Now you children have understood that there is so much difficulty on the path of Bhakti. And look, there is so much proliferation of Bhakti. And this itself is called ignorance. And knowledge is an ocean, is not it? And that ocean is only one, is not it? On this path of Bhakti, the ocean has also been divided into so many parts. Seven oceans have been made. You observe the Father. Does the Father make you do any Bhakti? Does He say anything for Bhakti? Does He ask you to say 'Ram, Ram'? You go to one or the other place to some extent or the other.

So, look, here, the Father does not explain to you anything about the path of Bhakti; He explains to you children as to how this world cycle rotates. This is why this explanation is definitely required because the history and geography should definitely be in the intellect of every person. The history and geography of the entire world. So, the history-geography of the world is in the intellect of the children because you are obtaining such education. The story of the beginning, middle and end of the entire world is included in it. So, its name itself is spiritual education, i.e. it is spiritual knowledge. Now those who have spiritual knowledge also bluff a lot. Fouth page of the Vani dated 11.7.67. Those bluffers keep on speaking. We come to give spiritual knowledge. Now you children know that they do not know the meaning of spiritual knowledge at all. Hm? Spirit means soul. Power. Spiritual knowledge means Father, who is the spiritual Father, the ocean of knowledge; He Himself is called spiritual knowledgeful Father. Spiritual Father means that He is just a spirit, soul. He does not have a body. And when He is not a body, when He is a soul, then with whom will He talk? He will talk to the souls only, will He not? And those who have bodies, you know that bodies talk to bodies. So, this spiritual Father comes to talk to the spiritual children only once. This conversation takes place only once. The spirit teaches. The topics of spirit are not mentioned in history, geography. Look, even there the name of Krishna has been inserted. So, then what will the poor human beings understand? They will not understand anything. You children know that the spiritual Baba teaches us.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 11 Apr 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2542, दिनांक 08.06.2018
VCD 2542, Date 08.06.2018
प्रातः क्लास 11.7.1967
Morning Class dated 11.7.1967
VCD-2542-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.06
Time- 00.01-19.06


प्रातः क्लास चल रहा था - 11.7.1967. मंगलवार को छह पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – यहाँ तो देवी-देवताओं का सिजरा है। वो अलग है। यहाँ आकरके पीछे ये अदल-बदल हो गया। फिर उनकी वो जगह कौन भरेंगे? क्रिश्चियन्स में तो अभी यहाँ चले गए। और वहाँ जगह कौन भरेंगे? तो जरूर यहाँ आ जाएंगे ना। अपनी जगह जाकर भरेंगे। क्योंकि ये चीज़ बनी-बनाई है। अविनाशी ड्रामा है। तो वहाँ का जो भी है, बच्चे जो यहाँ कनवर्ट हो गए हैं, देह अभिमान में आकर कन्वर्ट हो गए क्योंकि ये बहुत महीन-महीन बातें बुद्धि में धारण करनी है कि वहाँ जो जाएंगे तो जगह जो वहाँ हैं सारी जो फिर जिस जगह से एक-एक को आना है। वो कौन भरेंगे? माना सभी जाएंगे ना बच्ची। ऐसे बहुत हैं अच्छे-अच्छे भी। तुम देख लेते हो अच्छे-अच्छे भी आएंगे। जो अच्छे-अच्छे दूसरे धरम में चले गए। देखो कोई आर्य समाज में, कोई चिदाकाशी, कोई फलाने धरम में ट्रांसफर हो गए हैं ना। तो जो-जो भी इस धरम के हैं और कन्वर्ट हो गए हैं वो फिर भी तो पहले-पहले तो आवेंगे ना। कन्वर्ट तो बाद में हुए हैं ना। पहले तो इसी धरम के थे। तो वहाँ भी इसी धरम में होंगे। तो अगर इस धरम में तो वहाँ जगह रह जाएगी ना एकदम। तो ऐसे तो ना तो वो भी आएंगे अपने-अपने धरम वाले। जो-जो भी जगह उनको ऊपर मिली हुई है वो नंबरवार वहाँ जाकरके जाना होगा जरूर।

इसलिए यहाँ कोई सिक्ख, कोई मुसलमान, कोई आए थे ना। यहाँ मुसलमान भी आए थे ना पार्टी। ठीक है ना। तो बड़ी खबरदारी करनी पड़ती है। ये बड़ी इंक्वायरी हो जावे। अगर समझो कि कोई ने जाकरके बोला - अरे इनके पास तो मुसलमान भी जाते हैं, ढ़ेर आए हैं, दूर देश से आए हैं। तो झट वो इंक्वायरी करना शुरू कर देंगे। हमारे धरम के लोग वहाँ कैसे चले गए? उनको शॉक आवेगा। मुसलमान इनके पास कैसे जाते हैं यहां? अरे, ये दूसरे धर्म वाले एकदम कैसे जाते हैं? तो इन्क्वायरी भी चली जावे। और फिर कोई तो इन्क्वायरी करने में बहुत मत्था खपाते हैं। समझा ना। आजकल तो बहुत है। तो बिगर दरियाफ्त डाल दो उसको उसमें। ऐसे स्ट्रिक्ट हो जाते हैं। जेल के अन्दर बन्द कर देते हैं। 11.7.1967, मंगलवार को सातवें पेज पर। तो ये कायदा वो बन्द नहीं करते हैं ना अभी। तुम बच्चे तो अखबार नहीं पढ़ते हो। तो जो पढ़ते हैं वो जानते हैं। तो उनका ऐसे कायदा है कि बिगर दरियाफ्त किसको डाल दो एकदम। समझा ना। ऐसे ही शक में डाल दो। उनको इमरजेंसी कहते हैं। तो इमरजेंसी में तो बच्ची एकदम कोई भी बहुत 10-20 पैसे भी कमाते हैं। कोई न कोई को कुछ न कुछ उसमें पचास हज़ार दे दिया। चलो, पैसा मिल गया। छोड़ दिया। तो ये बहुत चलता है एकदम।

अब ये तो बच्चे जानते हो कि रावण राज्य है, अब पिछाड़ी है। ये तो कुछ भी कल्प पहले हुआ, वो ही ये तुम देख रहे हो। अब जो कुछ यहाँ होते हैं, इस-इस कलियुगी दुनिया में जो देखते हो वो कल्प-कल्प होता आया है। आगे भी इस समय में ऐसे-ऐसे होता था जबकि बाप तुम बच्चों को बैठकरके ये नॉलेज देते थे। ऐसे भी कहा जाता है कि उस तरफ में कलियुग और ये है पुरुषोत्तम संगमयुग। और ये है भी तो ना। पुरुषोत्तम संगमयुग इसको ही कहेंगे। संगम का युग, जो पुरुषोत्तम बनते हैं, तुम मनुष्य से देवता बनते हो। तो उत्तम पुरुष बनते हो ना। अभी तो पत्थरबुद्धि मनुष्य हो ना। तो उनको कनिष्ठ पुरुष कहेंगे ना। तो फिर उनको उत्तम तो नहीं कहेंगे। उत्तम बनने के लिए तुम यहाँ आते हो। सर्वोत्तम-सर्वोत्तम कहते हैं ना। ये सर्वोत्त्म कुल ब्राह्मण कुल का है। सर्वोत्तम कुल। ऐसे बाबा क्यों कहते हैं? इस समय में बाप और बच्चे ये रूहानी सेवा पर हैं। तो सेवा को तो उत्तम कहेंगे ना। किसको बहुत धनवान बनाना, जो 21 जनम बैठकरके वो सदा सुखी रहे।

तो देखो ये कितनी रूहानी सर्विस है। कितना कल्याण करने का होता है बच्चों को। जैसे बाप कल्याण करते हैं तो बच्चों को भी कल्याण करने में मदद करनी चाहिए ना। बाप तो इतनी सब कुछ कर सकते हैं। अब बाहर का काम तो बच्चों का है ना। फिर उन बच्चों में जो-जो भी किसको उत्तम बनाते हो, मेहनत कर-करके रास्ता बताते हो उत्तम बनने का। हाँ, वो बहुत होशियार भी हो जाते हैं। तो इसमें बच्चे कभी भी तुम्हारा तो काम ही है पुरुषार्थ करना। और सब जोर-शोर से पुरुषार्थ करो। फिर उनका फल निकलता है या नहीं निकलता है, वो तो फिर कह दो, ड्रामा में जो हुआ। जो सारा दिन पास्ट हुआ, वो ड्रामा में बिल्कुल ही कल्प पहले हुआ था। तो सर्विस से बाप जान जाते हैं। इनके ऊपर तो रिस्पान्सिबिलिटी है।

बाबा ने कहा ना बच्ची – जब दुख आता जाएगा और देखेंगे बरोबर विनाश होता है तो फिर आएंगे। तो बच्ची तुम्हारा व्यर्थ कुछ भी नहीं जाएगा। तुम तो अपनी मेहनत करते जाओ। तुम्हारा काम है सबको ये रास्ता बताना कि बाबा कहते हैं शिवबाबा, मुझे याद करो। मैं पतित-पावन हूँ। मुझे याद करोगे तो तुम्हारा विकर्म विनाश हो जाएगा। हँ? अभी लड़ाई चल रही है महाभारत की महाभारी लड़ाई। और फिर वही मूसलों वाली लड़ाई। और बाप भी जरूर है। बहुत हैं यहाँ, जो कहते हैं कि जरूर भगवान है क्योंकि भगवान था ना जब महाभारत की लड़ाई लगी थी। हाँ, सिर्फ भगवान कौनसा था वो मुंझे हुए हैं। समझ में नहीं आता है। बाकि भगवान तो जरूर था। अभी कृष्ण, वो तो नहीं हो सकता है। वो फीचर तो कभी मिल ही नहीं सकते हैं। किसको भी नहीं। और फिर कृष्ण द्वापर में भी नहीं कहते हैं कुछ। उन्हें तो द्वापर के अंत में ठोक दिया। न ये संगम पर कृष्ण की बात है। नहीं। कृष्ण तो वहाँ फीचर्स बदलते रहते हैं हर जनम में। 11.7.67 की वाणी का आठवां पेज। तो जब हर जनम में फीचर्स बदलते रहेंगे तो पूर्व जन्म की बात याद रहेगी? नहीं याद रहेगी। तो जन्म-मरण के चक्र में आने वाली आत्मा सृष्टि के आदि, मध्य, अँत का ज्ञान कैसे सुनाय सकती?

तो ये कहेंगे, फिर ये समझें कि भगवान कौन है? क्योंकि सृष्टि बदल रही है। और सृष्टि को बदलाने के लिए भगवान बिगर कोई होगा ही नहीं जो सृष्टि को, पुरानी को नई बनावे। और अभी पुरानी सृष्टि को नई बनावे कैसे? वो भी तो कोई नहीं जानते हैं। बिल्कुल ही नहीं जानते सिवाय तु्म्हारे। अगर ये भी कोई कहे कि मैं भगवान हूँ, ये जब तुम्हारा बहुत आवाज़ अखबारों में यहाँ-वहाँ छपेगा ना, बाबा कहते हैं ना अखबार में तुम्हारा ये त्रिमूर्ति का जो ऊपर वाला जो चित्र है सारा पड़े तो बहुत अच्छा। पर अभी तो पड़ नहीं सकते। पड़ ही नहीं सकेंगे। अभी तो समझ ही नहीं सकेंगे। बाकि त्रिमूर्ति में जो है ये लिखा हुआ है स्थापना हो रही है। आजकल लिखते हो ना ब्रह्मा द्वारा स्थापना। और ये विष्णु राज्य करेंगे। तो ये स्थापना हो रही है। तो राज्य तो कोई जरूर करेंगे ना। विनाश भी जरूर करेंगे। विनाश होगा। देखो, एक तरफ में दिखलाते हैं पुरानी दुनिया और एक तरफ में दिखलाते हैं नई दुनिया। अब इन चित्रों से ये चित्र बडा अच्छा है। ये भी तो बच्चे जानते हो कि त्रिमूर्ति तो पहले से ही बनती आती है ना। ये समझाते हैं त्रिमूर्ति है तीन देवताओं की – ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।

A morning class dated 11.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle of the sixth page was - Here, there is a tree of deities. That is separate. After coming here, this exchange has taken place. Then who will take their place? Now they have gone here to the Christians. And who will take their place there? So, definitely they will come here, will they not? They will go and take their place because this thing is pre-determined. It is an imperishable drama. So, children, whatever is there of that place, those who have converted here, they have converted due to body consciousness because these very minute topics should be inculcated in the intellect that those who will go there, so that entire place, from where each one has to come. Who will fill up that place? It means all will go, will they not daughter? There are many such nice ones also. You see that nice ones also will come. Those nice ones who have gone to the other religions. Look, some have got transferred to Arya Samaj, some to Chidakashi, some to another religion, haven't they? So, all those who belong to this religion and have converted will come first of all, will they not? They have converted later on, haven't they? Earlier they belonged to this religion only. So, there also they will be in this religion only. So, if in this religion, the place remains there completely. So, in this manner, they will also come from individual religions. Whatever place they have been assigned, they will have to go there numberwise.

This is why some Sikhs, some Muslims had come here, hadn't they? A party (group) of Muslims had also come here, hadn't they? It is correct, is not it? So, you have to be very careful. A big inquiry may take place. Suppose someone goes and tells - Arey, Muslims also go to them; they have come in large numbers, they have come from far-off places, then they will start an inquiry immediately. How did people of our religion go there? They will be shocked. How do Muslims go to them here? Arey, how do these people of other religions go there immediately? So, inquiry may also start. And then some spoil their heads a lot in inquiry. Did you understand? Now-a-days there are many. So, put him in that [jail] without [allowing] any representation. They become so strict. They put them in the jail. 11.7.1967, on the seventh page on Tuesday. So, this is the rule; they do not put them behind the bars now, do they? You children do not read news papers. So, those who read know. So, it is their rule that they can put anyone in the jail without any representation. Did you understand? [They can] put them in jail just on suspicion. That is called emergency. So, daughter, in emergency some also earn 10-20 paise (money). Someone or the other is paid something or the other like fifty thousand rupees. Okay, they got the money. They release him. So, this goes on a lot.

Children you know that it is a kingdom of Ravan. Now it is the end. You are seeing whatever had happened Kalpa ago. Whatever happens here now, whatever you see in this Iron Age world has been happening every Kalpa. Even in the past it used to happen like this when the Father used to sit and give this knowledge to you children. It is also said that there is Iron Age on that side and this is Purushottam Sangamyug. And this is indeed, is not it? This alone will be called Purushottam Sangamyug. Age of Confluence (sangam), when you become highest among all human beings (Purushottam); you become deities from human beings. So, you become best human beings (uttam purush), don't you? Now you are human beings with stone-like intellect, aren't you? So, they will be called lower human beings (kanishth purush), will they not be? So, then they will not be called best (uttam). You come here to become uttam. People say 'sarvottam, sarvottam' (highest, highest), don't they? This best clan is of the Brahmin clan. The highest clan. Why does Baba say so? At this time the Father and the children are on spiritual service. So, the service will be called uttam, will it not be? To make someone very wealthy, so that they sit for 21 births and remain happy always.

So, look, this is such a spiritual service. Children have to cause so much benefit. Just as the Father causes benefit, children should also help in causing benefit, shouldn't they? The Father can do so much. Well, the outside work has to be done by the children. Then, among those children, whoever makes anyone best (uttam), shows the path to become best by doing hard work. Yes, they become very intelligent, too. So, in this, children your task is only to make purusharth. And all of you should make vigorous purusharth. Then, whether it produces a result or not, you can say whatever happened was drama. Whatever passed throughout the day happened exactly as it had happened Kalpa ago. So, the Father comes to know through service. This one carries responsibility.

He tells you children - Children, do not worry. Go on working hard. If the hard work is not fruitful, if nobody listens, however, all the monkeys will not be taught to drink tea and to wear a suit. Arey, monkeys are also taught to wear, act like this, aren't they? Even among those monkeys there is one such variety. Among those monkeys there is a clan which is caught and taught many a things. And now many are such that howevermuch you explain to them, whatever you do, they will not learn at all. It is like this, is not it? If you spoil your head over them, they will never learn. The learners are explained. So, howevermuch you spoil your head over someone, all are human beings only. That too everyone is a monkey. But there is variety among them with such learning capabilities that they learn. And they learn very well. So, it is a similar case with this Brahmin clan. And your variety is hidden. And you are numberwise as per purusharth. So, definitely someone will spoil your head a lot. Some will spoil your head a little. And some will not understand even after you spoil your head on them. It will continue sooner or later. He will come later on.

Baba said, did not He daughter - When the sorrows go on increasing and when they see that definitely destruction is taking place, then they will come. So, daughter, nothing of yours will go waste. You go on working hard. Your task is to show this path to everyone that Baba, ShivBaba says - Remember Me. I am the purifier of the sinful ones. If you remember Me, your sins will be burnt. Hm? Now the fiercest Mahabharata war is going on. And then the same war of missiles. And the Father is also definitely present. There are many here who say that definitely God is present because God was present when the Mahabharata war broke out. Yes, they are only confused as to which God it was. They don't understand. But God was definitely present. Now Krishna cannot be that one. That feature can never be found again. Nobody can get. And then Krishna does not say anything in the Copper Age. He has been put in the end of the Copper Age. Nor is it a topic of Krishna in the Confluence Age. No. Krishna keeps on changing features there in every birth. Eighth page of the Vani dated 11.7.67. So, when the features keep on changing in every birth, then will you remember the topic of the past birth? You will not remember. So, how can the soul which passes through the cycle of birth and death narrate the knowledge of the beginning, middle and end of the world?

So, this one will say, then they should understand as to who is God? It is because the world is changing. And in order to change the world there will not be anyone except God who could transform the old world to a new one. And now how can the old world be transformed to a new one? Nobody knows that as well. They do not know at all except you. Even if someone says that I am God, when your topic is published in the newspapers here and there, Baba says that if your picture of Trimurti is published in the newspaper completely, then it would be very good. But it cannot be published now. It cannot be published at all. They will not be able to understand now at all. But as regards the write-up in Trimurti that establishment is taking place. Now-a-days your write 'establishment through Brahma', don’t you? And this Vishnu will rule. So, this establishment is taking place. So, definitely someone will rule, will they not? Destruction will also definitely take place. Destruction will take place. Look, on the one hand the old world is depicted, and on the other hand the new world is depicted. Well, this picture is very good among these pictures. Children you also know that Trimurti is being prepared from the beginning itself, is not it? It is explained that Trimurti consists of three deities - Brahma, Vishnu, Shankar.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 13 Apr 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2543, दिनांक 09.06.2018
VCD 2543, Date 09.06.2018
प्रातः क्लास 11.7.1967
Morning Class dated 11.7.1967
VCD-2543-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.00
Time- 00.01-17.00


प्रातः क्लास चल रहा था - 11.7.1967. मंगलवार को दसवें पेज के मध्य में बात चल रही थी, बात चल रही थी काम महाशत्रु है। बहुत इसकी संभाल करनी है क्योंकि अभी तो एकदम तमोप्रधान हैं। इसलिए संभाल करनी होती है। एक तरफ में तमोप्रधान और इस समय तुम बच्चे सतोप्रधान। देखो, कितना रात-दिन का फर्क हो जाता है। कहाँ एकदम अधम गति और कहाँ एकदम ऊँच गति। तो तुम बच्चे जो डटे रहते हो उनकी एकदम खास है ऊँच गति। है ना क्योंकि ऊँच में ऊँच भी तुम बनते हो। तो नीच में नीच भी तुम बनते हो। कब बनते हो? हँ? ऊँच में ऊँच की शूटिंग होती है और नीच में नीच की भी शूटिंग होती है। संस्कार तो यहाँ भरे जा रहे हैं ना। भले ये जनम कभी बच्चों का अच्छा है। परन्तु आगे का जनम क्या होगा कुछ कह थोड़ेही सकते हैं। पाप तो जन्म-जन्मान्तर करते आए हैं। तो पापों का घड़ा तो भरा हुआ है ना। और ये भी समझते हो घड़ा ज़रूर भरा हुआ होगा क्योंकि इस दुनिया की सारी आत्माएँ इस समय तमोप्रधान हैं। यहाँ इस समय में कहा ही जाता है तमोप्रधान। यहाँ माने, क्या चीज़ तमोप्रधान? आत्मा तमोप्रधान। आत्मा जो सतोप्रधान थी तो ये जरूर है ना तमोप्रधान जरूर है। और फिर उसको ऊँच बनना है सतोप्रधान।

तो तुम्हीं सबसे जास्ती जानते हो कि बरोबर ही हम सतोप्रधान थे। हम ही सतोप्रधान हैं और हमको ही पहले बाबा से मिलना भी है। बाबा से मिलना है? अभी मिले नहीं हैं? हँ? अरे? कबकी वाणी है? सडसठ की है ना। तो उस समय मिले नहीं हैं बाबा से? मिलना ही है। भविष्य की बात बता दी। क्यों कहा? हँ? क्योंकि जिस बाबा की बात कर रहे हैं, वो बाबा के लिए तो बता दिया, जरूर साकारी है। और भी साथी हैं जो पहले मिलते हैं। यज्ञ के आदि में भी पहले मिले थे। परन्तु उस समय कुछ पता नहीं था साकार और निराकार के मेल का। अभी पता तो है परन्तु फिर ये पता नहीं है कि वो बाप, वो टीचर, वो सद्गुरु एक ही व्यक्तित्व में कब होगा और कब प्रत्यक्ष होगा? क्योंकि शिव का जन्म तो दिव्य गाया हुआ है ना। कोई दुनियावी बच्चों की तरह तो जन्म है नहीं गर्भ से। दिव्य जन्म का मतलब ही है प्रवेशता। और प्रवेशता भी कोई भूत-प्रेतों जैसी नहीं। उसमें भी दिव्यता है। क्या? भूत-प्रेतों का तो पता चल जाता है – कब आते हैं, कब चले जाते हैं। और शिवबाबा का तो पता ही नहीं चलता – कब आते हैं, कब चले जाते हैं। दूसरी बात, आत्मा तो गरभ में भी आती है। वहाँ तो माता को कुछ न कुछ चुर्र-पुर्र का पता चलता है। यहाँ तो ऐसा दिव्य जन्म है कि प्रवेशता की तो बात छोड़ो। जन्म कहा ही जाता है प्रत्यक्ष होने को। संसार में बच्चा प्रत्यक्ष होता है तो कहते हैं जनम हुआ।

तो ऐसे ही अभी बाबा का गुप्त पार्ट है या प्रत्यक्ष पार्ट है? क्या कहेंगे? हँ? प्रत्यक्ष होता तो सारी दुनिया जानती जल्दी-जल्दी। तो गुप्त पार्ट है। प्रत्यक्ष होगा तो निशानी बताई। क्या? जो देखे, जो सुने; क्या? इन स्थूल आँखों से देखे; क्या देखे? वो ही नाक, आँख, हाथ, पाँव, कान सभी को होते हैं। हँ? जिस तन में प्रवेश करता होगा वो भी वो ही आँख, देहधारी। तो क्या देखेंगे? अरे, देखने से क्या देखने को मिल जाएगा? अव्यक्त स्टेज देखने को मिलेगी। जैसे और धरमपिताएं आते हैं ना। बुद्ध को उठाओ, चित्र को, क्राइस्ट को उठाओ, गुरु नानक को उठाओ। सभी के चेहरों में क्या दिव्यता दिखाई गई? निराकारी स्टेज, अव्यक्त स्टेज देखने में आती। तो वो तो बापों का बाप है। उसकी तो अव्यक्त स्टेज बुहत ही सबसे जास्ती उत्तम होनी चाहिए ना। तो वो स्टेज देखने से ही, जो भी देखने वाले सबकी बुद्धि में बैठेगा और दो शब्द भी सुनेंगे तो सुनने मात्र से ही उनको निश्चय हो जाएगा। ज्यादा लंबे-चौड़े भाषण आदि की तरह करने की जरूरत नहीं।

तो बोला, हमको ही पहले बाबा से मिलना ही है। हमको माने किसको? हमको किसके लिए कहा? हँ? हमको उनके लिए कहा जो आत्मिक स्थिति में प्रैक्टिकली टिके हुए बच्चे होते हैं। और आत्मिक स्थिति में टिके हुए होंगे तो जैसी बाप की स्टेज बनेगी नंबरवार बच्चों की भी बनी होगी। इसलिए गाया जाता है; क्या? आत्मा परमात्मा अलग रहे बहुकाल। और सुन्दर मेला कर दिया जब सद्गुरु मिला दलाल। तो आत्माओं के रूप में पार्ट बजाने वाली नंबरवार आत्माएं और परमात्मा के रूप में परम पार्ट बजाने वाली हीरो पार्टधारी आत्मा, दोनों का मिलना तब ही कहें। कब? जब एक दूसरे के पार्ट की भी पहचान हो। क्या? बच्चों को अपनी पहचान हो कि मैं कौनसे नंबर का बच्चा हूँ? और बाप को तो पहचान हो ही जाएगी। तो नंबरवार कहेंगे ना अलग रहे बहुकाल। तो, जिनसे बहुकाल अलग रहे उनसे मिलेंगे ना।

तो तुमको बताते हैं। क्या बताते हैं? कि तुमने पूरा 84 जन्म लिया है। हँ? एकदम शुरुआत से। कबसे शुरुआत कहें? हँ? कबसे नया जन्म कहें, पहला जन्म कहें? जबसे बाप को पक्का-पक्का निश्चयबुद्धिपूर्वक सदाकाल के लिए पहचान लिया। सदाकाल माने? संगमयुग जब तक रहे तब तक अनिश्चय का नाम-निशान न आए। तो शुरुआत में आए हो। हँ? कौन? जो आत्मिक स्टेज में टिकने वाले बच्चे हैं वो कब आए यज्ञ में? अरे, ओम मण्डली में आए होंगे। पहले-पहले तो वो ही बच्चे आए होंगे ना। पिछाड़ी पड़े हो। अभी भी पिछाड़ी पड़े हो। हँ? तो पहले तुमको ही पढ़ाना पड़ता है। क्या? किस बात के पिछाड़ी पड़े हो? हँ? अरे? बच्चों को क्या प्रिय है? और बाप को कौनसे बच्चे प्रिय हैं? ज्ञानी तू आत्मा बाप को प्रिय हैं। तो बच्चे को क्या प्रिय है? जो ज्ञानी बच्चे होंगे उनको प्रिय है कि सब कुछ जानकारी मिल जाए। क्या? कुछ भी छूटे नहीं। बेहद की दुनिया की बेहद की जो भी पढ़ाई है उस पढ़ाई में हम हाउ-हप करके बैठें। तो पहले तुमको ही पढ़ाना पड़ता है। क्या? पड़ता है की क्या मजबूरी आ गई? हँ? ये क्या मजबूरी दिखाय दी? पड़ता है। बड़ी मजबूरी है क्या? हाँ। क्योंकि जिनको पढ़ाना पड़ता है, उनकी खासियत ये बताई; क्या? मुझ निर्गुणहारे में कोई गुण नाहिं। और गुण नहीं हैं तो अवगुण ज्यादा होंगे। तो फिर उनको कौन पढ़ाएगा? हँ? लेकिन बाप तो ये सब कुछ देखता नहीं सुप्रीम सोल। वो तो रूह को देखता है। हँ? वो तो कहते हैं रूहानी बाप को रूहानी बच्चे ही पहचानते हैं। हाँ।

तो तुम पढ़ते हो जो फिर तुम भी ऊपर में जाओ तो उनके पिछाड़ी दूसरे भी जावेंगे। जैसे कल्प-कल्प दूसरे भी जाते हैं, कैसे ही जाएंगे। हँ? कौन-कौन जावेंगे? किसके-किसके पीछे जावेंगे? नंबरवार ही जावेंगे ना। दस ग्रुप हैं ना दस धर्मों के। तो उसमें भी भारतवासी हैं और पक्के विदेशी भी हैं। तो जो भारतवासी हैं वो पहले जाएंगे। जो अपने धरम के पक्के हैं, द्वैतवादी द्वापरयुग से ही आते हैं, जनम लेकरके सुख-दुख का पार्ट बजाते हैं, वो आए भी थे बाद में, तो जाएंगे भी बाद में। तो बताया कि तुम पहले जाते हो ऊँची स्टेज में। कौनसी ऊँची स्टेज? जो बाप का घर है उस घर में तुम भी जाते हो नंबरवार। बाप का घर कौनसा है? हँ? कहते हैं बाप का घर है परमधाम। हँ? धाम माने घर। परम माने बडे ते बड़ा घर। तो तुम बच्चों का घर, हँ, और दुनियावालों का घर। कुछ अंतर होगा या नहीं होगा? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। तुम बच्चों का घर है, जिस तन में शिव बाप प्रवेश करते हैं वो बाप का घर हो गया। तो बाप रूह तो रूहानी स्टेज में टिकने वाले जो बच्चे हैं उनका घर भी वो ही। तो बोला - तुम बच्चों को प्रिफरेंस है। तुम्हारा घर भी वो ही। तुम्हारा बाप भी वो ही। हँ? और? और क्या? तुम्हारी नई दुनिया भी, वर्सा भी वो ही। तो बाप को याद करो, घर को याद करो, वर्से को याद करो। तुम्हारे लिए तो बहुत सहज हो गया।

A morning class dated 11.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the tenth page on Tuesday was that lust is the biggest enemy. You should be very careful about it because now people are completely tamopradhan (impure). This is why you have to be careful. On the one side people are tamopradhan and at this time you children are satopradhan (pure). Look, there is a difference of day and night. One the one hand is the lowest fate and on the other hand is the highest fate. So, you children, who remain steadfast, achieve the highest fate. It is so, is not it because it is you who become highest on high as well. So, it is you who become lowest on low as well. When do you become? Hm? The shooting of highest on high takes place and the shooting of lowest on low also takes place. The sanskars are being recorded here, aren't they? Although this birth is good in case of many children, but one cannot say how the future births will be. You have been committing sins since many births. So, the pot of sins is full, is not it? And you also understand that the pot will definitely be full because all the souls of this world are tamopradhan at this time. Here, at this time it is said tamopradhan. Here, which thing is tamopradhan? The soul is tamopradhan. The soul which was satopradhan, so, it is sure that it is definitely tamoprdhan. And then it has to become high, satopradhan.

So, you alone know the most that definitely we alone were satopradhan. We are only satopradhan and we ourselves have to also meet Baba first. You have to meet Baba? Have you not met yet? Hm? Arey? It is a Vani of which time? It is a Vani of 67, is not it? So, did you not meet Baba at that time? You have to meet. A topic of the future was mentioned. Why was it said so? It is because the Baba about which He was talking, it was told about that Baba that he is definitely corporeal. There are other companions also who meet first. They had met in the beginning of the Yagya also first. But at that time nothing was known about the combination of corporeal and incorporeal. Now it is known, but then it is not known that when that Father, that Teacher, that Sadguru will be present in the same personality and when He will be revealed. It is because Shiv's birth is praised to be divine, is not it? His birth is not like the worldly children through the womb. Divine birth means entry (praveshata). And the entry is also not like the ghosts and devils. There is divinity in it as well. What? In case of ghosts and devils you can know as to when He comes and when He departs. And in case of ShivBaba you cannot know at all as to when He comes and when He departs. Secondly, the soul comes in the womb as well. There, the mother gets to know about the movements to some extent. Here, the birth is so divine that leave the topic of entry; revelation itself is called birth. When a child is revealed in the world then it is said that he has been born.

So, similarly, is Baba's part incognito now or is it a revealed part? What will be said? Hm? Had it been revealed, the entire world would know quickly. So, the part is incognito. If it is revealed, then an indication was mentioned. What? Whoever sees, whoever listens; what? Whoever sees through these physical eyes; what should they see? Everyone has the same nose, eyes, arms, legs, ears. Hm? The body in which He enters must be having the same eyes, the same bodily being. So, what will they see? Arey, what will they get to see by seeing? They will get to see the Avyakt stage. Just as other founders of religions come, don’t they? Take Buddha's picture, take Christ, take Guru Nanak. Which divinity has been shown in the faces of all of them? Incorporeal stage, Avyakt stage is visible. So, He is the Father of fathers. His Avyakt stage should be the best one, shouldn't it be? So, just by seeing that stage, it will sit in the intellect of all the observers and even if they listen to two words, they will develop faith just by listening. There is no need to deliver long speeches, etc.

So, it was said, we alone have to meet Baba first. 'We' refers to whom? For whom was 'we' used? Hm? 'We' was said for those children who are practically constant in soul conscious stage. And if they are constant in soul conscious stage, then as is the stage that the Father develops, numberwise children will also develop the same stage. This is why it is praised; what? The soul remained separate from the Supreme Soul for a long time. And a beautiful meeting occurred when the Sadguru was found as a dalaal (middleman). So, the meeting between the numberwise souls which play a part in the form of souls and the hero actor soul which plays the supreme part in the form of the Supreme Soul will be said to be only at that time. When? It is when they recognize the part of each other. What? The children should realize themselves that I am a child of which serial number? And the Father will automatically realize. So, it will be said that they remained separate numberwise. So, He will meet those who remained separate for a long time, will He not?

So, He tells you. What does He tell? That you have taken complete 84 births. Hm? From the very beginning. From when will it be called a beginning? Hm? From when will it be called the new birth, the first birth? Ever since you recognize the Father forever with a firm faith of the intellect. What is meant by forever? As long as the Confluence Age continues there should not be any name or trace of losing faith. So, you have come in the beginning. Hm? Who? When did the children who become constant in the soul conscious stage enter the Yagya? Arey, they must have come in the Om Mandali. Initially, only those children must have come, haven't they? You are behind it. Even now you are behind it. Hm? So, first you alone have to be taught. What? You are behind which topic? Hm? Arey? What is dear to the children? And which children are dear to the Father? Knowledgeable souls are dear to the Father. So, what is dear to the child? The knowledgeable children like to get the entire information. What? Nothing should be left out. In the unlimited studies of the unlimited world, we should gobble whatever knowledge is available. So, first you alone have to be taught. What? 'Have to be' - what is the compulsion? Hm? What is the compulsion that has been shown? 'Have to be'. Is it a big compulsion? Yes. It is because those who have to be taught, their specialty has been mentioned; what? There is no virtue in a virtueless person like me. And if there are no virtues, then there will be more vices. So, then who will teach them? Hm? But the Father, the Supreme Soul doesn't see all this. He sees the soul. Hm? He says that the spiritual children alone recognize the spiritual Father. Yes.

So, you study and then, when you too go up, then others will also go behind them. Just as others also go every Kalpa, they will go in whatever manner. Hm? Who all will go? Behind whom all will they go? They will go numberwise only, will they not? There are ten groups of ten religions, aren't there? So, even in it there are Bhaaratwasis and firm videshis (foreigners) also. So, the Bharatwasis will go first. Those who are firm in their religion, come from the dualistic Copper Age itself, play the part of happiness and sorrows by getting birth, they had come later on and will also go later on. So, it was told that you go first in the high stage. Which high stage? You also go numberwise to the Father's home. Which is the Father's home? Hm? It is said that the Father's home is the Supreme Abode (Paramdhaam). Hm? Dhaam means home. Param means the biggest home. So, the home of you children, hm, and the home of the people of the world. Will there be any difference or not? Hm?
(Someone said something.) Yes. It is the home of you children; the body in which Father Shiv enters is the Father's home. So, when the Father is a soul, then the home of the children who become constant in the spiritual stage is also the same. So, it was said - There is preference for you children. Your home is also that only. Your Father is also that one only. Hm? And? What else? Your new world also, the inheritance also is that only. So, remember the Father, remember the home, remember the inheritance. It is very easy for you.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 15 Apr 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2544, दिनांक 10.06.2018
VCD 2544, Date 10.06.2018
रात्रि क्लास 11.7.1967
Night Class dated 11.7.1967
VCD-2544-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.43
Time- 00.01-16.43


आज का रात्रि क्लास है 11.7.1967. बाप कहेंगे बच्चे और ये जो अलौकिक बाप है वो कहेंगे बच्चियां-बच्चे। ऐसा क्यों? चलो, इस लोक का नहीं है, इस दुनिया का नहीं है, अलौकिक बाप तो है। तो फिर बच्चियां और बच्चे डबल कैसे? और ये कौन सा बाप है जो कहेगा बच्चे? बच्चियां नहीं कहेगा। हँ? तो वो निराकार बाप है सुप्रीम सोल जो इस दुनिया का नहीं है, पारलौकिक बाप है, इस लोक से पार रहता है। जब इस दुनिया में आता है तो बताता है कि तुम बच्चे ज्योतिबिंदु आत्मा हो। मैं भी ज्योतिबिंदु आत्मा हूं लेकिन तुम जन्म-मरण के चक्कर में आते हो क्योंकि भोगी हो और मैं जन्म-मरण के चक्कर में नहीं आता हूँ क्योंकि मैं अभोक्ता हूं। मेरी आत्मा का ही नाम शिव है और तुम्हारे शरीर का नाम पड़ता है। और शरीर तो कभी मेल का मिलता है, कभी फीमेल का मिलता है।

तो जो लौकिक सृष्टि है इसमें ही तो सुप्रीम सोल बाप आते हैं और अलौकिक दुनिया बनाते हैं। अलौकिक इसलिए कहा कि लौकिक दुनियावालों को वो बातें समझ में नहीं आती। जब तक आकर इस आध्यात्मिक विद्यालय को ज्वाइन ना करें। तो ज्वाइन करते हैं तो पता चलता है कि निराकार बाप साकार में जब प्रवेश करते हैं तो डबल आत्माएं हुई ना। एक हुआ बाप प्रवेश करने वाला और जिसमें प्रवेश किया वो हो गई माता। तो नाम देते हैं ब्रह्मा। तो मां-बाप दो हैं तो बच्चे दो नहीं हो सकते? हो सकते। इसलिए कहते हैं कि जो अलौकिक बाप है जिसमें मैं प्रवेश करता हूँ ये कहेंगे बच्चे-बच्चियां क्योंकि साकार में हैं। तो साकार में बहन-भाई हो जाते हैं। निराकार में सिर्फ भाई-भाई आत्मा। आत्मा-आत्मा भाई-भाई, भाई-भाइयों का बाप शिव बाप।

वो, वो शिव बाप कभी भी स्त्री चोला धारण करते हैं? हँ? करते हैं कि नहीं करते हैं? अरे? वो तो है ही निराकार ज्योतिबिंदु। वो ये थोड़े ही देखता है कि स्त्री चोला है कि पुरुष चोला है। उसको क्या देखना है? उसे तो आत्मिक स्थिति देखनी है। तो जो आत्मिक स्थिति है सृष्टि के आदि में, तो अंत में भी आत्मिक स्थिति। आदि सो अंत। उस आत्मिक स्थिति वाले में प्रवेश तो करते हैं लेकिन नाम फिर भी देते हैं ब्रह्मा। ठीक है ना बच्चे। ये भी बच्चियां छोटी-छोटी समझती हैं कि भगवान पढ़ाते हैं। हँ? कौन पढ़ाते हैं? भगवान पढ़ाते हैं। शिव बाबा पढ़ाते हैं। अभी कहां भगवान पढ़ाते हैं और कहां ये दुनिया में मनुष्य पढ़ाते हैं! क्या अंतर है? हँ? अंतर का पता कैसे चले? पता चलता है। मनुष्य कहा ही तब जाता है जब उसके नाम में ही मनवा शब्द, मनु लगा हुआ है। मनु की औलाद को मनुष्य कहा गया है। मनु ब्रह्मा को कहा जाता है ना। हँ? मन चंचल होता है मनुष्यों का क्योंकि वो तो देहधारी है ना। सदाकाल की निराकारी आत्मा तो नहीं है। और जन्म-मरण के चक्र में आती है।

तो मनु की औलाद मनुष्य कहे जाते हैं। मनु को मन होगा तो मनुष्यों को भी मन होगा। मन बड़ा चंचल है। और चंचल मन को स्थिर करने के लिए तो भगवान को आना पड़ता है। जो भगवान मन से परे है। उसे मनन चिंतन मंथन करने की दरकार नहीं क्योंकि वो तो त्रिकालदर्शी है ही। तीनों कालों को जानता है तो मनन चिंतन क्या करेगा? तो ये अंतर हुआ। क्या? इसलिए कहते हैं मनुष्य कभी भगवान नहीं हो सकता। क्या? जब तक मनुष्य है तो भगवान नहीं हो सकता। माने मन का उपयोग करता है, मन कंट्रोल में नहीं कर पाया है तो भगवान कैसे हुआ? तो शास्त्रों में भी लिखा है मननात मनुष्य। मनन चिंतन करने से मनुष्य कहा जाता है। भगवान को तो इसकी दरकार ही नहीं। वो तो है ही निःसंकल्प। तो वो ऑलरेडी निःसंकल्प है। उसे संकल्पों का सन्यास करने की जरूरत ही नहीं, त्याग करने की जरूरत ही नहीं। तो संकल्पों के, विकल्पों के फेर से बचाने के लिए वो निराकार शिव इस सृष्टि पर आते हैं और हम बच्चों को मन को कंट्रोल करना सिखाते हैं मनुष्यों को।

अब अंतर तो बहुत है मनुष्य में और भगवान में क्योंकि मनुष्य अगर अच्छे से पढ़ाई पढ़के परफेक्ट बन भी गया मन को कंट्रोल करने में तो क्या सदा काल के लिए हो जाएगा? हँ? वो भी हो नहीं सकता। क्यों? क्योंकि एक ही आत्मा है इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली जो अभोक्ता है। क्या? और जो भोगी होगा वो पतित तो बनेगा ही। तो जिसमें प्रवेश करता है मुकर्रर रूप से उसे भी आप समान बनाता है। फिर भी वो तब तक के लिए जब तक कि दोबारा उसमें प्रवेश ना करे। हँ? प्रवेश करता है और प्रवेश करने के बाद जिसमें प्रवेश करता है या उसके आसपास वालों को पता चलता है? पता ही नहीं चलता। उसका तो दिव्य जन्म है। दुनिया में तो बच्चे पैदा होते हैं तो पता चलता है। भूत-प्रेत प्रवेश करते हैं तो पता चलता है। उनका तो पता ही नहीं चलता कब आया, कब चला गया। तो जिसमें प्रवेश किया उसको पता चलता है? नहीं। लेकिन भगवान जिसमें प्रवेश करेगा तो आचार में, व्यवहार में, चलन में अंतर तो दिखाई पड़ेगा।

तो जो अंतर दिखाई पड़ता है, हँ, विशेषता दिखाई पड़ती है, उस विशेषता की तरफ ढेर सारी आत्माएं आकर्षित होने लगती हैं। इसलिए मनुष्य ने भगवान का एक नाम रख दिया कृष्ण। कृष्ण माने आकर्षित करने वाला। अब वास्तव में, तो कृष्ण बच्चे की तो बात ही नहीं जो सृष्टि के आदि में जलमई में पीपल के पत्ते पर कृष्ण दिखाय दिया है। ये तो उसके बाप की बात है। और इस बाप में भी वो निराकार बाप प्रवेश करते हैं क्योंकि बाप ने समझाया है कि देवी-देवताओं को तो मनुष्य नहीं कहा जाता है। हँ? क्यों? देवी-देवताओं का भी मन नहीं चलता। उनका भी मन एकाग्र रहता है या चलायमान होता है? एकाग्र रहता है। और भगवान को भी मनुष्य नहीं कहा जा सकता क्योंकि भगवान का भी मन एकाग्र रहता है। तो अंतर क्या हुआ दोनों में? हँ? अंतर ये हुआ कि जो देवताएं हैं वो नीचे उतरते हैं आत्मिक स्थिति से तो धीरे-धीरे नीचे उतरते-उतरते ऐसी स्टेज आ जाती है कि मन सक्रिय हो जाता है। मन कंट्रोल से बाहर हो जाता है, तो फिर देवता नहीं रहते। और भगवान का तो मन कभी भी कंट्रोल से बाहर नहीं होता। कौन सा भगवान? जो निराकार आत्माओं का बाप कहा जाता है ऊँच ते ऊँच, लेकिन ऊँच ते ऊँच आत्माओं की दुनिया में, सोलवर्ल्ड में या इस संसार में? इसी संसार में जब प्रवेश करता है तो जिस साकार में प्रवेश करता है उसके द्वारा ऊंच ते ऊंच भगवान है।

तो अंतर पता चला? हँ? भगवान में क्या अंतर है? भगवान जो आकर के मनुष्यों को देवता बनाता है उन मनुष्य देवताओं में और भगवान में क्या अंतर है? और मनुष्यों में क्या अंतर है? हँ? क्या-क्या अंतर हुआ? जो भगवान है असल में वो तो कभी भी; क्या? मन के कंट्रोल में आता ही नहीं। उसका मन सदैव निश्चल है क्योंकि वो जन्म-मरण के चक्कर में नहीं आता। और देवताएं? जन्म-मरण के चक्कर में आते हैं। तो एक स्थिति है जन्म-मरण के चक्र में आने की। वो स्थिति से भी जब नीचे उतरते हैं तो मन सक्रिय हो जाता है। तो उसको देवताओं का सोलह कला संपूर्ण कहा जाता है। सोलह कला संपूर्ण से जब आधी कलाएं कम हो जाती हैं तो मन सक्रिय हो जाता है। तो देवताओं को मनुष्य नहीं कहेंगे।

Today's night class is dated 11.7.1967. The Father will say 'sons' and this alokik Father will say - Daughters and sons. Why is it so? Okay, he does not belong to this abode, he does not belong to this world, yet he is an alokik Father. So, then how is it double 'daughters and sons'? And which is this Father who will say 'sons'? He will not say 'daughters'. Hm? So, that incorporeal Father is the Supreme Soul who does not belong to this world, He is the Paarlokik Father, He lives beyond this abode. When He comes to this world, He tells that you children are point of light soul. I am also a point of light soul, but you pass through the cycle of birth and death because you are pleasure-seekers (bhogi) and I do not pass through the cycle of birth and death because I am abhokta (non-pleasure seeker). The name of My soul itself is Shiv and your names are based on your bodies. And sometimes you get the body of a male and sometimes of a female.

So, the Supreme Soul Father comes only in the lokik world and makes it an alokik world. It was called alokik because the people of the lokik world do not understand those topics unless they come and join this Adhyatmik Vidyalaya. So, when they join, they know that when the incorporeal Father enters in a corporeal then they are double souls, aren't they? One is the Father who enters and the one in whom He entered is the mother. So, the name assigned is Brahma. So, when the mother and Father are two, then cannot there be two children? There can be. This is why He says that the alokik Father in whom I enter will say 'sons and daughters' because they are in corporeal form. So, they happen to be sister and brother in corporeal form. In an incorporeal form they are just brother like souls. Souls are brothers and the Father of the brothers is Father Shiv.

Does that Father Shiv ever assume a female body? Hm? Does He or doesn't He? Arey? He is an incorporeal point of light only. He doesn't see whether it is a female body or a male body. What does He have to see? He has to see the soul conscious stage. So, the soul conscious stage which exists in the beginning of the world, the same soul conscious stage is in the end as well. Whatever happens in the beginning happens in the end. He does enter in the one with soul conscious stage, but then He gives the name Brahma. It is correct, is not it children? These young daughters also understand that God teaches. Hm? Who teaches? God teaches. ShivBaba teaches. Well, on the one hand God teaches and on the other hand the human beings teach in this world! What is the difference? Hm? How will you know the difference? The difference can be known. Someone is called a human being (manushya) only when there is the word 'manua', 'manu' attached to his name. The progeny of Manu is called manushya. Brahma is called Manu, is not he? Hm? The mind of human beings is inconstant because they are bodily beings, aren't they? They are not incorporeal souls forever. And they pass through the cycle of birth and death.

So, the children of Manu are called manushya. If Manu has mind (man), then the human beings will also have mind. Mind is very inconstant. And God has to come to make the inconstant mind constant. God is beyond mind. There is no need for Him to think and churn because He is already Trikaaldarshii. He knows all the three aspects of time; so, what will he think about? So, this is the difference. What? This is why it is said that a human being can never be God. What? As long as he is a human being he cannot be God. It means that if he uses his mind, if he hasn't been able to control the mind, then how can he be God? So, it has been written in the scriptures also - Mananaat manushya. The one who thinks and churns is called a human being (manushya). God does not need this at all. He is thoughtless. So, he is already thoughtless. There is no need for Him to renounce thoughts at all, leave thoughts at all. So, that incorporeal Shiv comes in this world to save us from the cycle of good and bad thoughts and He teaches us children, the human beings to control the mind.

Well, there is a lot of difference between a human being and God because even if a human being studies well and becomes perfect in controlling the mind, then will he become perfect forever? Hm? That too cannot be possible. Why? It is because there is only one soul playing its part on this world stage which is abhokta (non-seeker of pleasure). What? And the one who is bhogi will definitely become sinful. So, the one in whom He enters in a permanent manner, He makes him also equal to Himself. However, that is only up to the time He enters in him again. Hm? He enters and after entering, does the one in whom He enters or the persons around him get to know? They do not know at all. His is a divine birth. When children are born in the world, then one can know. When ghosts and devils enter, then one can know. As regards Him, one cannot know at all as to when He came and when He departed. So, does the one in whom He entered know? No. But the one in whom God enters there will be a difference visible in his actions, behaviour, activity.

So, the difference that is visible, hm, the specialty that is visible, numerous souls are attracted towards that specialty. This is why one of the names of God coined by human beings is Krishna. Krishna means the one who attracts (aakarshit karne vala). Well, actually it is not about the child Krishna at all, who has been shown on a fig leaf in the ocean in the beginning of the world. It is about his Father. And it is that incorporeal Father who enters in this Father as well because the Father has explained that the deities are not called human beings. Hm? Why? Deities also do not use their mind. Is their mind also focussed or inconstant? It remains focused (ekaagra). And God cannot be called a human being also because God's mind is also focussed. So, what is the difference between both of them? Hm? The difference is that when the deities come down from the soul conscious stage, while descending gradually, one such stage arrives that the mind becomes active. The mind goes out of control; then they do not remain deities any more. And God's mind never goes out of control. Which God? The one who is called the highest on high Father of incorporeal souls, but is it in the highest on high world of souls, in the Soul World or in this world? When He comes in this world itself, then the corporeal in which He enters, He is the highest on high God through him.

So, did you know the difference? Hm? How is God different? What is the difference between the human deities and God, who comes and transforms human beings to deities? And how are the human beings different? Hm? What are the differences? The one who is God in reality will never; what? He does not come under the control of mind at all. His mind is always unshakeable because He never passes through the cycle of birth and death. And the deities? They pass through the cycle of birth and death. So, one situation is of passing through the cycle of birth and death. When you descend even from that stage, then the mind becomes active. So, the deities are said to be perfect in 16 celestial degrees. When the celestial degrees remain half from being perfect in 16 celestial degrees, then the mind becomes active. So, the deities will not be called human beings.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 16 Apr 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2545, दिनांक 11.06.2018
VCD 2545, Date 11.06.2018
रात्रि क्लास 11.7.1967
Night Class dated 11.7.1967
VCD-2545-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.36
Time- 00.01-18.36


रात्रि क्लास चल रहा था - 11.7.1967. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – ये जो बच्चियाँ बैठी हैं, कुमारियाँ, ये भी तो समझती हैं कि हमें भगवान पढ़ाते हैं और वहाँ ये शैतान पढ़ाते हैं। तो ये दो बातें होती हैं बच्चे क्योंकि रावण राज्य माने शैतानी राज्य है। और राम राज्य माने भगवान का राज्य। ईश्वरीय राज्य। तो अभी जब बच्चियाँ सुनती हैं कि यहाँ तो भगवान पढ़ाते हैं, एक ही टीचर है और एक ही मर्तबा है स्वर्ग का। और बनना है भगवान-भगवती। अभी विचार उठते हैं, बाप पूछते हैं बच्चों से, ये पढाई अच्छी भगवान पढ़ाते हैं। विश्व की महारानी-महाराजा बनना अच्छा है ना। वा विश्व का साहूकार बनना अच्छा? या इस पढ़ाई से जो तुम अभी ये पढ़ेगी, ये मैट्रिक पढ़ेगी, 100-50-150-200-400 पघार मिलेगा वो अच्छा? इस पढ़ाई के ऊपर तो जरूर उठना चाहिए। अच्छा, ये समझो कि मैट्रिक पास करके या ये फलाना पास करके, बी.ए. हुआ या क्या बी.कॉम., फलाना पास किया, अच्छा पास करके पीछे ये ज्ञान उठाएगा? अच्छा, बीच में मर गया तो? पीछे क्या पढ़ेगी? फिर कौन पढ़ाएगा तुमको? पीछे तो पढ़ भी नहीं सकेगी क्योंकि पीछे जाकर तो छोटी बेबी बनेगी। पीछे कहाँ पढ़ेगी? 6-8 साल तो ऐसे ही चले जाएंगे बचपन में।

तो बुद्धि से काम लेना पड़ता है ना कि अभी तो टाइम ही बहुत थोड़ा है। इसलिए सबके लिए है। ऐसे नहीं कि बच्चियों के लिए नहीं है, बच्चों के लिए है। पीछे पुरुषार्थ करेगा या जब समय नाज़ुक होगा, तब तीव्र वेग से पुरुषार्थ कर लेगा। अरे, पर बीच में ही मर जाओ तो क्या? इसके पहले ये पढ़ाई पढ़ना अच्छा ही है। एक तो ये हो सकता है कि योग से जबकि बच्चों की आयु बड़ी हो जाती है, अभी तो एवरेज आयु छोटी है ना। और जब तुम पवित्र बनते हो तो एवरेज आयु बहुत बड़ी हो जाती है। तो ये आयु जो बड़ी होती है वो किससे बड़ी होती है? हँ? इस याद की यात्रा से आयु बड़ी होती है। आत्मा पावरफुल बनती है ना। तो आयु बढ़ती है। इस योग से आयु बढ़ती है। तो फिर भविष्य में बड़ी आयु वाले बनते हैं वहाँ सतयुग में। क्योंकि सतयुग में सतोप्रधान बनते हो ना। देखो, ये जानते हो बच्चे कि सतोप्रधान भारत में बड़ी आयु होती है। और तमोप्रधान भारत में एवरेज आयु कम हो जाती है। तो अभी तुम जानते हो कि हम हरेक सतोप्रधान बन रहे हैं। बड़ी आयु वाले बन रहे हैं एवरेज में। ये तो सिम्पल बात है ना समझने की। तो ये बच्चों को भी ये पढ़ाई शुरू कर देना चाहिए। उसमें भी एक बात जरूर याद रखनी चाहिए। बाप जो कहते हैं बेहद का बाप कि मुझे याद करने से तुम्हारी आयु बढ़ जावेगी। बस। अच्छा, पढ़ाई तो बहुत ही सिम्पल है। 84 जनम का चक्कर याद रहे। और कुछ थोड़ेही है।

11.7.67 की वाणी का दूसरा पेज। फिर ये भी पढ़ो और याद की यात्रा भी सीखो। और फिर जाकरके वो दुनियावी पढ़ाई भी पढ़ो। उसके लिए कोई मना थोडे ही करते हैं। बाकि अगर ये पढ़ाई अच्छी तरह से पढ़ गई और नशा चढ़ गया, कितना नशा चढ़े, कोई को समझाने के लिए तो वो तो बहुत अच्छा है। इसलिए बाबा इन कन्याओं के लिए बस ये एक्सरसाइज देते हैं। समझा ना। और ये साइट लिया तो जयपुर में। बरसात बन्द हो जाएगी (तो) या तो यहाँ कोर्स रखेंगे। सिर्फ एक-एक मास का रखेंगे। तो उस कोर्स में अच्छी-अच्छी निकलेंगी। और फिर उनको सर्विस में लगाय देंगे। बाकि जो देखें कि ये तो डल हेडेड हैं, उनको अपने माई-बाप के पास भेज देंगे। भई, तुम बच्चों की क्या राय है? ये करना होगा ना। जैसे वो गोर्मेन्ट है, वो भी मिलेट्री में लेती है तो सब तरह की तंदुरुस्ती, वगैरा-वगैरा सब देखती है ना। तो ये बाबा फिर देखते हैं कि इस नॉलेज में ये अच्छी तरह से चलेगी? लैंग्वेज भी देखनी होती है, भाषा भी देखनी है। और तीखी कौन जल्दी जाती है। ये भी तो देखेंगे ना। तीखी जाती है ना। देखेंगे, नहीं जाती है और ये तो बहुत अच्छा सीख जाती है हर बात में, खाना पकाना, सब सिखलाएंगे। ऐसे थोड़ेही है कि वो छोड़ देंगे। नहीं।

सब इनको सिखलाना। हिन्दी भी सिखलाई जाएगी। हो सकेगा तो अंग्रेजी में भी टीचर रखेंगे। फिर जो उनको अंग्रेजी में भी समझानी सिखलाए। छोटी-छोटी बच्चियाँ हैं। वो इंग्लिश में समझाती हैं ना, हमारे पास हैं। बाबा समझते हैं जयपुर में जो वो छोटी बच्ची है वो भी इंग्लिश में समझाती है। उसकी सखियाँ जो हैं चण्डीगढ में वो भी इंग्लिश में समझाती हैं। तो उनको प्राइज भी मिलती है और वंडर भी खाते हैं कि छोटे में और ये ज्ञान भी लेती हैं। बाकि है तो जरूर वो कुछ इतनी मैनर्स नहीं हो सकती है उनमें। और मैनर्स हो भी सकती है परन्तु मोह भी तो होता है ना। ऐसी-ऐसी बच्चियों में माँ का मोह होता है। तो वो जो मोह है ना वो फिर इनको चढ़ने नहीं देता है। तो फिर मोह की दृष्टि नहीं रखनी चाहिए। जैसे ये याद में रहकरके और उनको दृष्टि देनी चाहिए निर्मोही हो करके रहें। तो फिर बच्चों को कुछ फायदा हो सकता है।

तुम्हारी दृष्टि याद में रहकरके तीखी हो जावेगी। देखो, याद में रहते हो और इस दुनिया को देखते रहते हो। याद में रहकरके दुनिया को देखते-देखते-देखते तुम यहाँ याद में इस दुनिया को बिल्कुल ही ये क्या बनाय देती हो। जरूर नया बनाने के लिए आग तो लगेगी ना बच्चे। और विनाश तो होना ही है। ये विनाश कौन करते हैं? बताओ। ये कहते हैं परमात्मा शंकर द्वारा विनाश। तो क्या विनाश करते हैं शंकर सबका? किसको-किसको मारते हैं? ये मारना-करना तो पाप है ना। क्रोध बिगर तो कोई मार नहीं सकता है। तो पाप लगेगा ना। तो फिर क्या शंकर में क्रोध है? शंकर में अगर क्रोध है तो उनको इतना बड़ा देवता कैसे कहा जाए महादेव? नहीं। न कोई शिवबाबा शंकर द्वारा विनाश कराते हैं। ये भी रांग बात है।

शिवबाबा तो कल्याणकारी और वो सदा कल्याणकारी है, सदा शिव है। समझा ना बच्ची। वो कैसे कोई से विनाश करावेंगे? क्योंकि ये तो, ये तो अबेटमेंट करना, इसको अंग्रेजी में अबेटमेंट यानि इसको कहना कि इनको मारो। तो उनके ऊपर भी केस हो जाएगा ना। ये बात तुम बच्चों को मालूम है? कोई ऐसा उल्टा काम कराते हैं तो कराने वालों के ऊपर भी केस चल जाता है। तो बाबा ऐसे थोड़ेही काम करवाएंगे। बाप कहते हैं मैं ऐसा थोड़ेही काम कराएगा कि शंकर को कहूंगा हाँ, इन सबको मारो। हाँ, ये तो अबेटमेंट हो गई। तो वो भी रांग है। ये जो शंकर की बात है वो तो बिल्कुल रांग सिद्ध हो जाती है। सिद्ध होती है कि नहीं? ऐसी प्रेरणा। प्रेरणा माने कहना। समझाना। बाबा कहते हैं ना मुझे प्रेरणा से नहीं आते यानि विचार नहीं आते हैं। तो क्या शंकर को विचार थोड़ेही आएंगे कि मैं इनको सबको मारूँ। न वो कहेंगे कि इनको मारो। शिवबाबा कहेंगे क्या? क्योंकि अगर ऐसा हो तो दोनों के ऊपर केस चल जाए। तो ये सब बात कायदे मुजीब तो है नहीं। बाबा कहते हैं - न मैं उसको कहता हूँ, न वो कोई मारते हैं। तो वो तो तुम देखते हो ये ड्रामा में उनका ये पार्ट बना हुआ है। तो बैठ करके जो पार्ट है सो बजाते हैं।

A night class dated 11.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page was - These daughters, the virgins who are sitting, they also do realize that God teaches us and there it is the satans who teach. So, these are two topics children because the kingdom of Ravan means satanic kingdom. And the kingdom of Ram means kingdom of God. Godly rule. So, now, when daughters listen that here God teaches; there is only one teacher and there is only one post of heaven. And you have to become Bhagwaan-Bhagwati (God-Goddess). Now the thoughts arise; the Father asks the children; God teaches this good knowledge. It is good to become the Maharaja-Maharani (King and Queen) of the world, is not it? Or is it better to become a prosperous person of the world? Or is it better to study the [worldly] knowledge that you are studying now, be it Matric, and earn 100, 50, 150, 200, 400 rupees salary? You should definitely rise to receive this knowledge. Achcha, suppose you pass this Matric or by passing such and such course, be it BA or B.Com, etc; okay, will you grasp this knowledge after passing that? Achcha, what if you die in between? What will you study later on? Then who will teach you? You will not be able to study later on because later on you will become a small baby. Where will you study later on? 6-8 years will be simply spent in childhood.

So, you have to use your intellect that now the time is very less. This is why it is for everyone. It is not as if it is not for the daughters, it for sons. I will make purusharth later on or I will make fast purusharth when the time is delicate. Arey, but what if you die in between itself? It is better to study this knowledge before that. One thing is that it can be possible that while the age of children increases through Yoga, now the average age is less, is not it? And when you become pure, then the average age becomes very high. So, how does this age increase? Hm? Age increases through this journey of remembrance. The soul becomes powerful, doesn't it? So, age increases. Age increases through this Yoga. So, then you live longer in future, there in the Golden Age because you become satopradhan in the Golden Age, don't you? Look, you know children that each one of us is becoming satopradhan. Our average age is growing. This is a simple topic to be understood. So, the children should also start studying this knowledge. Even in that you should remember one topic. The Father, the unlimited Father says that your age will increase by remembering Me. That is all. Achcha, the knowledge is very simple. You should remember the cycle of 84 births. Is there anything else?

Second page of the Vani dated 11.7.67. Then study this also and learn the journey of remembrance also. And then go to study that worldly knowledge also. Are you prohibited from doing that? But if you study this knowledge very well and if your intoxication rises and rises so much to explain to someone, then it is very good. This is why Baba assigns just this exercise for these virgins. Did you understand? And this site was acquired in Jaipur. When the rain stops, or the course will be organized here. It will be organized for just one month each. So, nice ones will emerge in that course. And then they will be engaged in service. But if you see that this one is dull headed, they will be sent to their parents. Brother, what is the opinion of you children? This will have to be done, will it not be? Just as there is that government, when it recruits people for the military, then it observes all kinds of fitness, etc., doesn't it? So, this Baba then observes as to whether this lady will continue well in this knowledge? The language (bhasha) is also to be observed. And who gallops ahead? This will also be observed. She gallops ahead, doesn't she? It will be observed, she doesn't gallop and this one learns very nicely in every topic, cooking, then she will be taught everything. It is not as if that will be left. No.

Teach them everything. Hindi will also be taught. If possible, Teachers will be appointed for English as well who will then explain to them in English also. There are young daughters. They explain in English, don't they? We have such persons. Baba thinks that the young daughter in Jaipur also explains in English. Her friends in Chandigarh also explain in English. So, they get a prize also and they also wonder that these are so young and they also obtain knowledge. But one thing is sure that they cannot have so much manners in them. And manners can be developed, but there is attachment also, is not it? Mother has attachment in such daughters. So, that attachment doesn't allow them to rise. So, then one should not have an eye of attachment. You should remain in remembrance and give them drishti in a detached manner. So, then children can get some benefit.

Your drishti (vision) will become sharp by being in remembrance. Look, you remain in remembrance and you keep on observing this world. While observing the world while being in remembrance what do you make this world in remembrance? Children, definitely fire will break out to make the world new. And destruction is bound to take place. Who undertakes this destruction? Tell. This one says - Destruction through Supreme Soul Shankar. So, does Shankar destroy everyone? Who all does he kill? This killing etc. is a sin, is not it? One cannot kill anyone without anger. So, he will accrue sin, will he not? So, then, does Shankar have anger? If there is anger in Shankar, then how can he be called such a big deity Mahadev? No. Neither does ShivBaba cause destruction through Shankar. This is also a wrong thing.

ShivBaba is benevolent and He is forever benevolent. He is Sadaa Shiv. Did you understand daughter? How will He cause destruction through anyone? It is because this is called abetment, it is called abetment in English, i.e. to ask someone to kill someone. Then a case will be filed against him as well, will it not be? Do you children know this? If someone instigates someone to do a wrong act, then a case is filed against the instigator also. So, will Baba get such task done? The Father says - Will I get any such task done that I ask Shankar to kill everyone? Yes, this will be like abetment. So, that is also wrong. This topic of Shankar is proved to be completely wrong. Is it proved or not? Such inspiration (prernaa). Inspiration means to say. To explain. Baba says - I do not get inspiration, i.e. thoughts. So, will Shankar get the thought that he should kill everyone? Neither will he ask anyone to kill them. Will ShivBaba say? It is because if it happens so, then a case will be filed against both. So, all this is not as per rule. Baba says - Neither do I tell him, nor does he kill. So, you see that it is his part in the drama. So, he sits and plays the part.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 19 Apr 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2546, दिनांक 12.06.2018
VCD 2546, Date 12.06.2018
रात्रि क्लास 11.7.1967
Night Class dated 11.7.1967
VCD-2546-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-19.09
Time- 00.01-19.09


रात्रि क्लास चल रहा था - 11.7.1967. चौथे पेज के अंत में बात चल रही थी कि भक्तिमार्ग में भी सुबह-शाम भक्ति करते हैं। तुम बच्चों को तो सारा दिन खोल करके रखना होता है ना। और आफिस में फिर माताओं को समय मिलता है। बच्चे भी जाते हैं पढ़ने तो माताओं का टाइम मिल जाता है। तो तुम बच्चों को दिन में भी सर्विस करनी होती है। तो फिर दिन में जागना पड़े; सोना नहीं है दिन में क्योंकि तुम रूहानी सर्विस करते हो ना बच्चे। तो गोर्मेन्ट सर्वेन्ट जो हैं वो कभी भी दिन में नहीं सो सकते हैं। तुम भी तो रूहानी गोर्मेन्ट के सर्वेन्ट हो। तो बाप तो बताते हैं ब्रह्माकुमारियों की दिन में सोने की बहुत बुरी आदत है। हाँ, व्यापारी होते हैं, चलो कोई टाइम दिन का होता है थोड़ा सो भी जाते हैं गद्दी पर या घर में और गुमाश्ते भी बैठे हैं तो भी। नहीं तो वो भी नहीं। जब कमाई होती है तो कोई सोएगा थोड़ेही। हमको भी ध्यान रखना चाहिए। जिज्ञासु आते हैं, उनको वापस नहीं करना है। दिन में सोना नहीं है। तो जो कमाने वाले होते हैं वो सोते नहीं हैं। वो तो एक जनम की कमाई करते हैं। और तुम्हारी तो जन्म-जन्मान्तर की कमाई है।

तो इसमें तो बिल्कुल नहीं सोना चाहिए दिन में क्योंकि तुम भी तो कमाई करने वाले हो ना। तुम भी जागते रहेंगे तो जिज्ञासु दिन में आएंगे। हाँ, माताएं आती हैं ना दिन में। तो उनको जागते टाइम दिन में ही रखा जाता है। जो सुबह और शाम को नहीं आ सकती हैं, बच्चों को स्कूल भेजना पड़ता है, शाम को टाइम से खाना बनाके देना पड़ता है, तो उनके लिए भी तुम बच्चों को जागना पड़े। जो सर्विसेबुल अच्छी हैं उनको तो जागना ही जागना है। नहीं तो कोई-कोई ऐसी रहती हैं, दिन में भी सेन्टर में सो जाती हैं। तुम्हारे लिए जागना जास्ती ये जरूरी बहुत है। नहीं तो बाबा फिकरा देते हैं ना। क्या? सोने के ऊपर। नहीं याद आया? जिन सोया तिन खोया। तो ये गीत है ना। और वगैरा-वगैरा सभी गीत भी हैं। जिन जागा तिन पाया। तो जिन सोया तिन खोया।

तो वास्तव में तुम बच्चियों को तो सुबह में भी सर्विस है। और दिन में, दोपहर में खास माताओं के लिए सर्विस है क्योंकि माताओं को तो दोपहर का ही टाइम मिलता है। तो ज्यादातर क्लास करने आती हैं। और बाहर के लोग आफिस से छुट्टी मिलने के बाद शाम को आते हैं तो शाम की भी सर्विस है। तो तुम्हारे सेन्टर्स पर जरूर माताएं आती होंगी। और उनको ये बताना भी चाहिए। कोई-कोई ब्राह्मणी शायद ऐसे भी हो जो बताती होगी। कोई तो ऐसी हैं जो सबको मना कर देती हैं – भाई, दिन में नहीं आना। हमारे आराम का टाइम है। दिन में फलाने टाइम नहीं आना। हम उस टाइम पर एक-दो घण्टे सोते हैं, आराम करते हैं। तो ऐसी भी कोई ब्राह्मणियाँ होती हैं। क्योंकि ब्राह्मणियाँ अक्सर करके सोती हैं। हँ? तुम्हारी की मैने कही थी, राम-4। अब तो न दिन में सोने देना न रात में। सोएं कब? कहते हैं अर्जुन की तरह गुडाकेश बन जाओ। अब इतनी जल्दी कैसे बन जाएं? हँ? तो बहुत सोती हैं ब्रह्माकुमारियाँ। वास्तव में दिन में सोना भी बेकायदे है। नींद नहीं करनी है। अच्छा, माना, ऐसे ही लेट जाएं, आराम से, नींद न करें तो चलेगा ना। ठीक है। नींद नहीं करनी है। बाबा ऐसे नहीं कहते हैं। लेट जाना, भले थोड़ा यहाँ, वहाँ, जहाँ थोड़ा टाइम मिले तो लेट जाना। कमर सीधी कर लो। बाकि सोना ठीक नहीं है इस समय। संगमयुग का सुहावना समय है ना।

तो अभी जो प्रबंध हो रहा है ये रूहानी म्यूजियम का तो वहाँ तो सारा दिन जागना पड़ेगा। पहला म्यूजियम खुला था ना माउंट आबू में। सनसेट प्वाइंट रोड पे। तो बोला सारा दिन जागना पड़ेगा। बैठना पड़ेगा। और इतने जिज्ञासु आते रहेंगे कि वहाँ सोने की फुर्सत भी नहीं मिलेगी। तो कोई ने शिकायत की – म्यूजियम में वहाँ नींद करती हैं। म्यूजियम में नींद करते हैं? यानि जो टाइम बीच में मिलता है, उसमें नींद करते हैं? किसी ने कहा – हां, बीच में नींद करते हैं। नहीं। वहाँ सब फ्री छोड़ देना चाहिए। समझा ना। ये बाबा जानते हैं कि मैं समझता हूँ कि ब्रह्माकुमारियाँ जितनी नींद करती हैं इतनी दूसरे साधारण लोग नहीं करते हैं। तो इससे साबित होता है इनको ये आदत पड़ी हुई है। हँ? कहाँ से आदत पड़ गई? पूर्व जन्म से। राजा, राजा-रानी बने हैं ना। राजा-रानी को तो बहुत मेहनत करनी पड़ती है। जैसे शिवबाबा कहते हैं मेरी रात-दिन की सेवा है। वाह भैया, तो थकान आ जाती है। तो सोते रहे हैं जन्म-जन्मान्तर। तो आदत पड़ी हुई है। तो जब तुम्हारी दुकानों पर ग्राहकी बढ़ जाएगी तो तुम्हारा नाम बाला हो जाएगा। तो फिर आदत मिटानी ही पड़ेगी। काय की? सो जाने की। ये व्यापारी लोग हैं। मैं नहीं समझता हूँ कि वो व्यापारी लोग दुकान में कोई नींद करते होंगे। हँ? क्यों नहीं करते होंगे? क्योंकि जिनकी दुकान में ग्राहक ज्यादा आते होंगे, कमाई ज्यादा होती होगी तो फिर कहीं नींद आती है? नींद सारी फिट जाती है।

सुबह को भी थक कर के सोएंगे तो टापिक्स नहीं निकालेंगे। तो यहाँ तो तुम बच्चों को सर्विस करनी है। तो सर्विस करने के लिए भाषण करने के लिए जरूर टॉपिक्स निकाल के रखो। रखेंगे ना। ये तुम्हारा ये म्यूजियम रहेगा ना तो सारा दिन रहेगा। बुद्धि में चलेगा ना कि ये समझाना है, ये बताना है। कल आए थे, ये मिस कर दिया। ये हमने नहीं समझाया। आज ये सब बातें समझायेंगे। तो सारा दिन समझाने का ही चक्कर लगाएगा ना। तो विचार सागर मंथन चलता रहेगा और विचार सागर मंथन के साथ-साथ याद भी चलती रहेगी क्योंकि जो पढ़ाने वाले बच्चे हैं, सर्विसेबल बच्चे हैं, उनको तो बाबा याद करते हैं ना। बाबा किन बच्चों को याद करते हैं? जो सर्विसेबल बच्चे हैं, ज्ञान सुनाने की सेवा करते ही रहते हैं उनको बाबा याद करते हैं। जो पढ़ाने वाले याद, याद तो बच्ची एक की है ना। एक बाप को याद करो। तो उसमें कम जास्ती वो नहीं है। याद माने याद। बहुत प्यार से, प्रेम से बिल्कुल ही क्योंकि बहुत ही तुमको वर्सा मिलता है। तो उसको याद बैठकरके, जैसे बाबा भी कहते हैं ना, ऐसे भी नहीं है कि बैठकरके याद करना है। नहीं। सबसे अच्छी याद है पैदल जाना। पैदल चलते जाओ, बाप को याद करते जाओ। बगीचे में जाना, घूमना फिरना, याद करते रहना। घूमते रहना और याद करते रहना। ये प्रैक्टिस अभी करना है।

अपनी परीक्षा लेनी है कि हम खाने पर भला बैठता हूँ क्योंकि खाते भी हैं, कर्म करते हैं, बाबा ने तो दिया है, कम कार डे, दिल यार डे। बाबा ने आशिक-माशूक का भी दृष्टांत दिया। तो वो लोग खाते-पीते रहते हैं और याद भी करते रहते हैं एक-दूसरे को। उनको सामने में वो ही देखने में आते हैं। उनको साक्षात्कार भी होते हैं। तो देखने में कोई खड़ा नहीं आकरके होते हैं। साक्षात्कार उनको होते हैं। तो तुम बच्चों को भी याद में बहुत रहना चाहिए। इतनी याद में रहो जो कोई भी कर्म करते-करते वो ही साक्षात्कार होता रहे। क्योंकि बच्चे याद में रहेंगे तो क्या होगा? पावर रहेगी। जौहर रहेगी। तो याद बहुत मुख्य है। 11.7.67 की वाणी का छठा पेज। और इतनी याद गहरी हो जाएगी कि कोई आवेगा तो उसको देखेंगे भी नहीं। सच-सच तुम ऐसी याद में रहेंगे। ऐसे नहीं कि उस समय याद करेंगी। नहीं। ऐसी भी स्टेज आएगी कि कोई याद नहीं आएगा। कि वो असर नहीं करेगा। नहीं। तलवार में याद का जौहर भरा रहना चाहिए। तलवार में? तलवार तो ज्ञान की होती है।

ज्ञान में याद का जौहर कैसे? हँ? गहरा-गहरा मनन-चिंतन-मंथन करते हैं तो वो ज्ञान ही तो है। ज्ञान की गहराइयों में जाते हैं। तो वो ही तो जा सकते हैं जिनकी बुद्धि सूक्ष्म बनी हो। बाप तो सूक्ष्म से सूक्ष्म है। सूक्ष्म को याद करेंगे तो बुद्धि सूक्ष्म बनेगी। ज्यादा सूक्ष्म बुद्धि बनेगी तो ज्ञान की गहराइयों को ज्यादा पकड़ेगी। हँ? और शिवबाबा से तो जास्ती ज्ञान की गहराइयों में कोई होगा भी नहीं। तो जैसे को याद करेंगे वैसे ही बनेंगे ना। शिव बाप क्या है? हँ? योगी है कि ज्ञानी है? हँ? ज्ञान का अखूट भण्डार है। तो जो अखूट भण्डार है, तो ऐसा अखूट भण्डार तुमको भी बनना है। इसीलिए तो गीता में बताया है सांख्ययोगौ पृथक् बाला प्रवदन्ति न पण्डिताः। (गीता 5/4) सांख्य माने ज्ञान। ज्ञान का विस्तार। गहराई से ज्ञान समझना और समझाना। और योग माने सार। क्या? कुछ भी याद न रहे। सिर्फ एक शिवबाबा दूसरा न कोई।

तो याद में नहीं रहेंगे तो जौहर भी नहीं चढ़ेगा। किस बात में? जौहर किस बात में? ज्ञान तलवार में जौहर नहीं आएगा। जितना-जितना याद करते जाएंगे उतना ज्ञान की तलवार में जौहर भरेगा। तलवार की धार बड़ी तीखी काम करेगी। हँ? लिखा है ना शास्त्रों में ज्ञान को कंठ कृपाण को धारा। हँ? ज्ञान का रास्ता ऐसा होना चाहिए जैसे कृपाण माने तलवार की धार। यों मारी और यूँ खतम। जिज्ञासु सामने आए और ऐसा प्वाइंट निकालें मनन-चिंतन-मंथन वाला बाबा की याद में, फट से मर जाए। कहाँ से मर जाए? बाहर की दुनिया से मर जाए, देहभान से मर जाए, देह के संबंधियों से बुद्धि बाहर हो जाए। तो बताया, याद में जौहर रहेंगे, बैठे-बैठे गहरी याद में रहेंगे तो उस समय जौहर नहीं, जब ईश्वरीय सेवा में जाएंगे तो उस समय कहेंगे जौहर। तो तलवार में जितनी याद की पावर होगी उतना जौहर भरेगा। पावन बनने की ताकत है। सारी शक्ति पावन बनने की है। (क्रमशः)

A night class dated 11.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the fourth page was that even on the path of Bhakti people do Bhakti in the mornings and evenings. You children have to remain open throughout the day, shouldn't you? And then the mothers get time during the office time. Children also go to study; then the mothers get time. So, you children have to do service in the day time also. So, then you have to remain awake in the day time; children, you should not sleep in the day because you perform spiritual service, don't you? So, government servants can never sleep in the day time. You are also spiritual government servants. So, the Father says that Brahmakumaris have a very bad habit of sleeping in the day time. Yes, there are businessmen; okay during a particular time in the day they doze off a little on their seat or at home or even when the workers are sitting. Otherwise, even that is not possible. Will anyone sleep when income is being earned? We should also be careful. When the students come, they should not be sent back. You shouldn't sleep in the day time. So, those who earn income do not sleep. They earn income for a birth. And yours is an income for many births.

So, you should not sleep at all in the day time because you also earn income, don't you? If you also remain awake, then the students will come in the day time. Yes, mothers come in the day time. So, their class is arranged in the day time only when you are awake. You children have to wake up [in the day time]those ladies who cannot come in the mornings and evenings, have to send the children to school, have to cook food for them in the evenings in time. The nice, serviceable ones have to definitely remain awake. Otherwise, some are such that they doze off even in the day time at the centers. For you it is very important to remain awake. Otherwise, Baba narrates an idiom, doesn't he? What? On sleep. Did you not recollect? Jin soya tin khoya (the one who sleeps, suffers a loss) So, this is a song, is not it? And there are many other songs also. Jin jaga tin paya (the one who remains awake, gains). So, the one who sleeps, loses.

So, actually you daughters have service in the day time also. And in the day time, in the afternoons there is service especially for the mothers because mothers get time only in the afternoons. So, most of them come for class. And the outside people come in the evenings after coming from the office; so, there is service in the evenings also. So, mothers must be definitely coming at your centers. And they should also be told this. There must be some such Brahmanis also who must be telling. Some are such that they clearly decline - Brother, do not come in the day time. It is our rest time. Do not come at a particular time in the day. We sleep, rest for one or two hours at that time. So, there are some such Brahmanis also because Brahmanis mostly sleep. Hm? ... Ram-4. Now you will not allow sleeping either in the day or in the night. When should we sleep? He says - Become Gudaakesh (conqueror of sleep) like Arjun. Well, how can we become so fast? Hm? So, the Brahmakumaris sleep a lot. Actually it is against the rules to sleep in the day time. You shouldn't sleep. Achcha, it means, it will do if we simply lie down comfortably and do not sleep, will it not? It is okay. You shouldn't sleep. Baba does not say so. You may lie down a little, here, there or wherever; lie down whenever you get time. Give rest to your back. But it is not good to sleep at this time. It is an evergreen time of Confluence Age, is not it?

So, the arrangements that are being made now for the spiritual museum, you will have to remain awake throughout the day there. The first museum was opened in Mount Abu on the Sunset Point road, wasn't it? So, it was told that you will have to remain awake throughout the day. You will have to sit. And so many students will keep on coming that you will not get time to sleep there. So, someone complained - They sleep there in the museum. Do they sleep in the museum? Does it mean that they sleep during the time that they get in between? Someone said - Yes, they sleep in between. No. You should leave everything free there. Did you understand? This Baba knows that I think even other ordinary people do not sleep as much as the Brahmakumaris sleep. So, it proves that they are habituated. Hm? How did they develop the habit? From the past birth. They have been kings and queens, were they not? Kings and queens have to work very hard. For example, ShivBaba says - I serve day and night. Wow brother! So, we feel tired. So, we have been sleeping since many births. So, we have developed the habit. So, when the number of customers increases in your shops then you will become famous. So, then the habit will have to be stopped. Of what? Of sleeping. There are these businessmen. I do not think that those businessmen sleep in their shops. Hm? Why don't they sleep? It is because does anyone get sleep if more customers come to their shop or if there is more income? The entire sleep vanishes.

Even if you sleep in the mornings because of being tired, then you will not be able to produce topics. So, here you children have to do service. So, in order to do service, in order to deliver lectures, you should definitely select topics. You will select, will you not? When you have this museum, then it will remain open throughout the day. The intellect will think that I have to explain this, tell this. Yesterday they had come, I had missed this point. I did not explain this. Today, I will explain all these topics. So, throughout the day, you will keep on thinking about how to explain, will you not? So, the churning of thoughts will keep on taking place and along with churning of thoughts, remembrance will also continue because Baba remembers the children who teach, the serviceable children, doesn't He? Which children does Baba remember? Baba remembers the serviceable children, who keep on doing the service of narrating knowledge. The teacher remembers; Daughter, remembrance is of only One, is not it? Remember one Father. So, it's not less or more. Remembrance means remembrance. Very lovingly, affectionately because you get a lot of inheritance. So, you should sit and remember Him; for example, Baba also says - It is also not that you have to sit and remember. No. The best remembrance is while walking. Go on walking, go on remembering the Father. Go to the garden, move around, and go on remembering. Go on moving and go on remembering. You should practice this now.

You have to test yourself that when I sit for meals, because we also eat, we also perform actions, Baba has told 'kam kaar de, dil yaar de' (hands at work, heart with friend). Baba has also given the example of the lover and the beloved. So, those people keep on eating and drinking and also remember each other. They see them always in front of them. They also have visions. So, when they see them [in visions] they do not come and stand in front of them [actually]. They have visions. So, you children should also remain a lot in remembrance. Be in so much remembrance that even while performing any action you continue to have the same vision because what will happen when children remain in remembrance? You will have power. You will have sharpness. So, remembrance is very important. Sixth page of the Vani dated 11.7.67. And the remembrance will become so deep that if anyone comes you will not even see him/her. You will really be in such remembrance. It is not as if you will remember at that time. No. You will also reach such a stage that nobody will come to your mind. It will not have any effect. No. There should be sharpness of remembrance in the sword. In the sword? The sword is of knowledge.

How is there the sharpness of remembrance in knowledge? Hm? When you think and churn deeply, then it is indeed knowledge. You go into the depths of knowledge. So, only those whose intellect has become subtle can go into the depths. The Father is the subtlest one. If you remember the subtle, then the intellect will become subtle. When it becomes more subtle then it will grasp the depths of knowledge more. Hm? And there will not be anyone who is deeper than ShivBaba in the depths of knowledge. So, as is the one whom we remember, so shall we become, will we not? What is Father Shiv? Hm? Is He a yogi or a gyaani (knowledgeable)? Hm? He is an inexhaustible store-house of knowledge. So, you too have to become such inexhaustible storehouse of knowledge. This is why it was told in the Gita – Saankhyayogau prithak bala pravadanti na panditaah. (Gita 5/4) Saankhya means knowledge. Expansion of knowledge. To understand and explain the knowledge deeply. And Yoga means essence. What? Nothing should remain in the mind. Just one ShivBaba and none else.

So, if you don’t remain in remembrance, then the sharpness (jauhar) will not develop. In which aspect? Sharpness in which aspect? There will not be sharpness in the sword of knowledge. The more you remember, the more sharpness will develop in the sword of knowledge. The edge of the sword will become very sharp. Hm? It has been written in the scriptures – Gyaan ko kanth kripaan ko dhara (just as a clear throat is important to narrate knowledge, sharpness is important for a sword). Hm? The path of knowledge should be like the edge of the kripaan, i.e. sword. You hit like this and he should be killed immediately. The student comes in front of you and you should make such point to emerge through thinking and churning in the remembrance of Baba that he should be dead immediately. How should he die? He should die from the outside world, he should die from body consciousness, his intellect should come out from the relatives of the body. So, it was told, if there is sharpness in remembrance; it is not about sharpness in remembrance when you are sitting in deep remembrance, but sharpness is said to be when you go to the field of Godly service. So, the more the power of remembrance in the sword, the sharper it will become. It is about the power of becoming pure. The entire power is about becoming pure. (continued)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 20 Apr 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2546, दिनांक 12.06.2018
VCD 2546, Date 12.06.2018
रात्रि क्लास 11.7.1967
Night Class dated 1.7.1967
VCD-2546-Bilingual-Part-2

समय- 19.10-35.28
Time- 19.10-35.28


तो इस पढ़ाई को कोई शक्ति थोड़ेही कहा जाता है। ये तो ज्ञान जल है। जल पीने से कोई शक्ति आती है क्या? हँ? हाँ, जल तो भोजन को पचाता है। जल में खुद कोई ताकत थोड़ेही होती है। नहीं। तो योग की पावर से विकर्म विनाश करते हो। तो याद की जरूरत बहुत है। और उस याद में ही तुम बच्चे ठण्डे हो। हँ? क्यों ठण्डे हो? हँ? बाबा का साल, दो साल में अंतिम समय आने वाला है। अभी तक बच्चे ठण्डे हैं। तो क्या अंजाम होगा? हँ? हँ? बताओ। ठण्डे क्यों हैं? हँ? अरे, उनका जो मुखिया है उसकी याद कैसी है? हँ? ठीक है? हँ? ठीक कहाँ से हो गई? बाप को पहचाना होगा तो ठीक होगी। बाप को पहचाना ही नहीं तो ठीक होगी? हँ? जैसे दुनियावाले याद करते हैं, भगवान निराकार है, निराकार है। तो मेहनत है इसमें। बच्चियों को भी कहेंगे, माताओं को भी कहेंगे। हँ? अभी घड़ी-घड़ी टीचर है तो जरूर धारणा करेगा ना। किस बात की? कि बच्चे याद में बहुत ठण्डे हैं। वाह भाई। आप गुरुजी बैंगन खाएं दूसरे को तरकीब सिखाएं। ये क्या बात हुई? ताड़ना करेंगे? ताड़ना करने से कुछ रिजल्ट निकलेगा? हँ? नहीं निकलेगा। फिर? समझाते हैं कि बैठकरके खाओ, और बैठकरके; बाबा तो कहते हैं ना पाखाने में जाओ, वहाँ भी तुमको बहुत फुर्सत रहती है। क्या? तो बच्चों को फुर्सत रहती है तो वहाँ जाकरके और वहाँ याद भी कर सकते हैं। ऐसे थोड़ेही कि वहाँ कोई याद करना मना है। नहीं। फिर हेर पड़ जावेगी। जैसे ही जाएंगे तो याद आ जाएगी आटोमेटिक। अभ्यास पक्का हो गया ना। तो फिर याद होती ही रहेगी। क्योंकि आधा कल्प के पाप हैं कटने के लिए।

और जास्ती में जास्ती पाप होता ही है कौनसा? सबसे बड़ा पाप कौनसा होता है ज्यादा से ज्यादा? हँ? काम विकार का। बाप कहते हैं ये काम महाशत्रु है। तो उन मनुष्य गुरुओँ ने भी शास्त्रों में लिख दिया है काम महाशत्रु है। उन पर जीत पहनना है। तो कैसे जीतेंगे? हँ? याद से विकर्म विनाश होंगे। और उसको भी करेंगे। बीच-बीच में देह अभिमान में आएंगे, फिर याद लगेगी। तो मेहनत है। धीरे-धीरे; ऐसे तो नहीं है कि कोई जल्दी से कोई संपूर्ण देवता बन सकते हैं। हँ? 16 कला संपूर्ण बन जावेंगे। बन जावेंगे? नहीं। जमदे जामदे तो होता ही नहीं कि हथेली पे आम जम जाएगा। ये तो ड्रामा ही ऐसा बना हुआ है। क्या? कैसा? कैसे चलता है ड्रामा? हाँ। सर में जैसे जूँ होता है ना, धीरे-धीरे रेंगता है।

तो आधा कल्प लगा है बच्चों को ये बिल्कुल ही तमोप्रधान बनने में। अभी तो कोई कला नहीं रही। कोई भी गुण नहीं रहा। तभी तो गाते रहते हैं ना – मैं निर्गुणहारे में कोई गुण नाहि। हँ? किसकी बात बताई? हँ? अरे, बच्चों की बात बता रहे। बाबा अपने बच्चों की बात बता रहे। क्या? मैं निर्गुणहारे में कोई गुण नाहि। आपेही तरस परोई। अरे, ‘आपे’ कहते किसको हैं? जो आया उसको कहेंगे ‘आपेही तरस परोई’? ऐसे थोड़ेही। तो देवताओं को यहाँ भारत में अक्सर करके कहते हैं ‘आपेही तरस परोई’। हँ? देवताओं को क्यों कहते हैं? हँ? जो आया देवता उसके सामने कहेंगे तो क्या तरस हो जाएगी? फिर? किसकी बात है? महादेव की बात है। हँ? है एक महादेव की बात। तो वो उसको शिवबाबा भी कहते हैं। तो वो शिव जो है जो निराकार है, जिसकी यादगार समझते हैं कि शिवलिंग उनकी यादगार है। हाथ-पाँव नहीं है तो निराकार है। तो उसको भी नहीं कहते ये बातें। क्या? मुझ निर्गुणहारे में कोई गुण नांहि। आपेही तरस परोई। ये उनको भी नहीं कहते। किसको कहते हैं? गुण किसमें होते हैं? उसी को कहेंगे ना। तो ऐसे थोड़ेही कि जो सामने आया उसी देवता को कहेंगे। जरूर ऊँच ते ऊँच देवता की बात होगी ना। तो ये देवताओं के आगे कहते हैं कि भई देखते हैं ना उनमें गुण होते हैं सभी। शिव का तो कुछ देखने में नहीं आता है। क्या? गुण, अवगुण। क्यों? क्योंकि वो तो निर्गुण, निराकार है। क्यों है? क्यों है निर्गुण, निराकार? क्योंकि वो तो जन्म-मरण के चक्र में ही नहीं आता है। जनम ले, देवताओं में जन्म लेगा तो गुण देखने में आएंगे। हँ? आसुरी दुनिया में, असुरों में जन्म लेगा तो आसुरी गुण देखने में आएंगे। न गुण, न अवगुण। क्योंकि चोला ही धारण नहीं किया।

अच्छा। चलो भाई, दस बज गया। म्यूजिक बजाओ। हँ? बाबा चक्कर में पड़ गए। शिव को तो कोई गुण ही नहीं है। याद किसको करें? हँ? ब्रह्मा बाबा क्यों चक्कर में पड़ गए? हँ? क्योंकि शिव तो निराकार है। निराकार के न गुण दिखाई पड़ते हैं बिन्दी के, न अवगुण दिखाई पड़ते हैं। तो बाबा को समझ में नहीं आई बात। ये क्या बोल दिया। अच्छा, म्यूजिक बजाओ। क्यों? बच्चों को सहज तो बहुत है। इनके लिए समझाने का। किनके लिए? हँ? किनके लिए समझाने का? हँ? अरे भाई? हँ? बताया ना - गुण होंगे, उनकी तो बात करेंगे ना। हँ? सतोप्रधान बनते हैं तो गुण होते हैं, तमोप्रधान बनते हैं तो अवगुण होते हैं। तो किसकी बात है? इनके लिए। इनके माने किनके लिए? जब बाबा इनके लिए कहते हैं तो किसकी तरफ?
(किसी ने कुछ कहा।) राम-कृष्ण की तरफ? हँ? राम 14 कला संपूर्ण। उनके लिए कहते हैं? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, लक्ष्मी-नारायण के लिए कहते हैं। 16 कला संपूर्ण लक्ष्मी-नारायण का चित्र होता है ना। तो बाजू में लक्ष्मी-नारायण का चित्र रहता था। तो बाबा उनकी तरफ इशारा करते थे। इनके लिए समझाने का है कि ये सतोप्रधान भी बनते हैं और सबसे जास्ती तमोप्रधान।

और इनको 84 जनम जरूर लेना है। क्या? पूरा 84 जनम। पहले सतोप्रधान लास्ट में तमोप्रधान। देखो, ये तमोप्रधान जरूर बने हैं। तो अवगुण आए होंगे ना। हँ? तमोप्रधान बने तो अवगुण आए। सतोप्रधान बने तो गुण थे। तो देवताओं के आगे कहते हैं। लेकिन ये नहीं जानते कि पक्का-पक्का एक देवता 16 कला संपूर्ण एक होता है या अनेक होते हैं? नहीं। अरे, वो सतयुग का पहला नारायण जो है वो भी तो पहले कृष्ण होगा ना। क्या होगा? बच्चा होगा ना। तो ये बने हैं तो इनका जो राजधानी के हैं वो सब भी ऐसे ही बने होंगे ना। कैसे? हँ? गुणवान या अवगुण वाले? गुणवान बने होंगे। यथा राजा-रानी तथा प्रजा। वहाँ तो ऐसा ही होता ही है। इस दुनिया में भी ऐसे ही। हँ? इस दुनिया के राजा-रानी तमोप्रधान तो प्रजा भी? तमोप्रधान। ठीक है ना बच्ची। तो ज़रूर वो भी इसके साथ बने होंगे। हँ? ‘वो’ माने कौन? ‘इनके’ माने किनके साथ? लक्ष्मी-नारायण के साथ वो प्रजा भी जरूर बनी होगी तमोप्रधान या सतोप्रधान। अभी फिर यथा राजा-रानी तथा प्रजा जरूर बनने की है। तो तुम बनने हो और बन रहे हो।

सीकिलधे रूहानी बच्चों प्रति क्या कहें? रूहानी बच्चे ही कहें। नहीं तो मुझे रूहानी माताओं प्रति, रूहानी पिताओं प्रति भी कहना पड़े। क्योंकि बच्चे बहुत कहते हैं, हमको वारिस भी बनाते हैं। हँ? तो वारिस बनाते हैं। किसको वारिस बनाते हैं? हँ? अरे, किसको वारिस बनाते हैं? अरे भाई, शिवबाबा को माताएं वारिस बनाती हैं ना। माताएं और पिताएं जो युगल होते हैं, वो शिवबाबा को क्या बनाय देते? अपना वारिस बनाय देते। तो वारिस बनाते, हम जैसे बच्चे बन गए। कौन? शिवबाबा। किसके बच्चे बन गए? उन माताओं और पिताओं के बच्चे बन गए। तो जिनके बच्चे बनेंगे वो कैसी स्टेज में होंगे? हँ? रूहानी स्टेज में होंगे ना। तभी तो कहेंगे रूहानी बच्चे। वो रूहानी माता, वो रूहानी पिता। बोला ना अभी। हाँ। तो बच्चों को तो फिर फर्ज है। क्या? बाबा बच्चा बनेंगे तो नमस्ते करेंगे। तो फिर शिवबाबा को वारिस बनाते हैं। ठीक है ना। ऐसे भी कहना पड़े। कैसे? हँ? रूहानी माता, रूहानी पिता को क्या? नमस्ते।

हमको तीन नहीं हैं। क्या? हमको चार बच्चे हैं। किसने बोला? हँ? कोई माता ने बोला कि हमको तीन बच्चे नहीं हैं। तीन तो पेट से पैदा हुए और एक शिवबाबा पेट से पैदा नहीं। वो तो ज्ञान की बात है। तो एक आप ही हो हमारा बडा बच्चा। तो देखो ऐसे भी माता-पिता होते हैं जो बाप को, सुप्रीम सोल को बच्चा बनाय देते हैं। तो फिर शिवबाबा को उनको भी तो नमस्ते करनी पड़े। हँ? ये सच्च-सच्च बच्चा बनाते हैं। या कोई को बच्चा न बनाया तो वो खुद जानते हैं हिसाब-किताब। जो नहीं बनाते हैं तो फिर बहुत रोती हैं। कब? हँ? जब रिजल्ट निकलता है तो फिर बहुत रोती हैं। क्यों? हँ? अरे! हमने बाबा को बच्चा नहीं बनाया। जिन्होंने बच्चा बनाया, उनको तो बहुत मिल गया। और हमको तो, हमको नहीं मिला।

मीठे-मीठे बच्चों प्रति रूहानी बाप और दादा का यादप्यार और गुडनाईट। बापदादा का यादप्यार, गुडनाइट क्यों कहते हैं? और रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते क्यों कहते हैं? हँ? बताओ। क्योंकि रूहानी बाप है तो रूहानी बच्चों को ही देखता है। और बापदादा? सदा रूहानी है? हँ? उनको देहभान आता है कि नहीं? आता है। तो फिर वो क्या नहीं कहते? हँ? नमस्ते नहीं कहते क्योंकि देह अहंकार होता है ना। बाप में भी और दादा में भी। ओमशान्ति। (समाप्त)

So, this knowledge is not called power. This is water of knowledge. Does one get power by drinking water? Hm? Yes, water enables the digestion of food. Water in itself does not have any power. No. So, you destroy sins through the power of Yoga. So, there is a lot of requirement of remembrance. And you children are cold (inactive) in that remembrance itself. Hm? Why are you cold? Hm? Baba is going to meet his last time in a year or two. The children are still cold. So, what will be the result? Hm? Hm? Speak up. Why are they cold? Hm? Arey, how is the remembrance of their head? Hm? Is it correct? Hm? How can it be correct? It will be correct if he has recognized the Father. Will it be correct if he hasn't recognized the Father at all? Hm? Just as the people of the world remember, God is incorporeal, He is incorporeal. So, there is difficulty in this. Daughters will also be told, mothers will also be told. Hm? Well, when there is teacher then He will definitely inculcate every moment, will He not? In which topic? The children are very cold in remembrance. Wow brother! Guruji Himself eats brinjal and teaches tactics to others [how to avoid eating brinjals]. What is this? Will He scold? Will there be any result of scolding? Hm? There will not be. Then? He explains that sit and eat and while sitting; Baba says, doesn't He that even when you go to the lavatory you have a lot of time there. What? When children have leisure time then they can go there and remember there as well. It is not as if it is not allowed to remember there. No. Then you will develop a habit. As soon as you go there you will automatically remember. The practice became firm, did not it? So, then remembrance will continue because the sins of half a Kalpa are to be cut/burnt.

And which sin does one commit the most? Which is the biggest sin that is committed the most? Hm? The mistake of the vice of lust. The Father says - This lust is the biggest enemy. So, those human gurus have also written in the scriptures that lust is the biggest enemy. You have to conquer it. So, how will you conquer? Hm? The sins will be burnt through remembrance. And that will also be burnt. In between you will become body conscious; then you will remember. So, there is difficulty. Gradually; it is not as if one can become a complete deity quickly. Hm? You will become perfect in 16 celestial degrees. Will you become? No. It is not that the mango will be grown on the palm. This drama itself is like this. What? How? How does the drama continue? Yes. It moves gradually just as a louse moves on the head.

So, it has taken half a Kalpa for the children to become completely tamopradhan. Now there are no celestial degrees. There are no virtues. Only then do they keep on singing - 'Mai nirgunhaarey me koi gun naahi' (There is no virtue in me, the virtueless one). Hm? Whose topic was mentioned? Hm? Arey, the topic of children is being mentioned. Baba is telling about His children. What? There is no virtue in me, the virtueless one. Aapey hi taras paroi (You yourself have to show mercy). Arey, who is called 'aapey'? Will you tell anyone 'aapey hi taras paroi'? It is not so. So, the deities are often told 'aapey hi taras paroi'. Hm? Why the deities are told so? Hm? Will mercy be shown if you tell this in front of any of the deities? Then? Whose topic is it? It is about Mahadev. Hm? It is about one Mahadev. So, he is also called ShivBaba. So, that Shiv is incorporeal, whose memorial is thought to be the Shivling. When it does not have arms or legs, it is incorporeal. So, He too is not told these topics. What? There is no virtue in me, the virtueless one. You yourself have to show mercy. He too is not told this. Who is told? Who has virtues? It is that person only who will be told this, will he not be? So, it is not as if you will tell this to any deity who comes in front of you. Definitely it is a topic of the highest on high deity, will it not be? So, they tell in front of the deities that brother, they see that they have all the virtues. Nothing is seen in respect of Shiv. What? Virtues, vices. Why? It is because He is nirgun (without any attributes), niraakaar (incorporeal). Why is He so? Why is He nirgun, niraakaar? It is because He does not pass through the cycle of birth and death. If He is born, if He is born among the deities, then virtues will be visible in Him. Hm? If He is born in the demoniac world, if He is born among the demons, then demoniac attributes will be visible in Him. He has neither virtues nor vices because He does not assume a body at all.

Achcha. Let's move brother, it is ten O'clock. Play the music. Hm? Baba was confused. Shiv doesn't have any virtue at all. Whom should we remember? Hm? Why was Brahma Baba confused? Hm? It is because Shiv is incorporeal. Neither virtues nor vices of a point are visible. So, Baba couldn't understand the topic. What did He say? Achcha, play the music. Why? It is very easy for the children. To explain these. For whom? Hm? To explain to whom? Hm? Arey brother? Hm? It was told, wasn't it? There will be virtues; you will talk about them, will you not? 'For these' (inkay liye) refers to whom? When Baba says 'inkay liye', then towards whom does He point?
(Someone said something.) Towards Ram-Krishna? Hm? Ram is perfect in 14 celestial degrees. Does He say for him? (Someone said something.) Yes, He says for Lakshmi-Narayan. There is a picture of Lakshmi-Narayan perfect in 16 celestial degrees, is not it? So, there used to be a picture of Lakshmi-Narayan in the side. So, Baba used to point out towards them. It is to be explained for them that they become satopradhan as well as the most tamopradhan.

And this one has to definitely get 84 births. What? Complete 84 births. Initially satopradhan and then tamopradhan in the last. Look, these have definitely become tamopradhan. So, they must have imbibed vices, hadn't they? Hm? The vices were inculcated when you became tamopradhan. You had virtues when you became satopradhan. So, they say in front of the deities, but they do not know firmly that whether one deity is perfect in 16 celestial degrees or are there many? No. Arey, that first Narayan of the Golden Age must also be Krishna initially, wasn't he? What would he be? He will be a child, will he not be? So, when these have become, then all those who belong to their kingdom must have also become in the same manner, hadn't they? How? Those with virtues or those with vices? They must have become virtuous. As are the king and queen, so are the subjects. It happens like this only there. It is similar in this world also. Hm? The king and queen of this world are tamopradhan and the subjects are also tamopradhan. It is correct, is not it daughter? So, definitely they must have also become along with them. Hm? 'They' refers to whom? 'Them' refers to whom? Along with Lakshmi-Narayan, those subjects would have also become tamopradhan or satopradhan. Now, again, as are the king and queen, so will the subjects also become. So, you are to become and you are becoming.

What should be said to the long lost and now found spiritual children? They will be called spiritual children only. Otherwise I have to say 'to the spiritual mothers, to the spiritual fathers' also because many children say and make Me their heirs also. Hm? So, they make me a heir. Whom do they make an heir? Hm? Arey, whom do they make heir? Arey brother, mothers make ShivBaba as heir, don't they? What do mothers and fathers who are couples make ShivBaba? They make Him their heir. So, they make Me their heir; it is as if I became their child. Who? ShivBaba. Whose child did He become? He became the child of those mothers and fathers. So, what kind of stage will those people be, whose child He has become? Hm? They will be in a spiritual stage, will they not be? Only then will they be called spiritual children. She is the spiritual mother and he is the spiritual Father. It was said just now, wasn't it? Yes. So, then it is the duty of the children. What? When Baba becomes a child He will say Namaste. So, then they make ShivBaba as their heir. It is correct, is not it? It will also have to be said like this. How? Hm? What to the spiritual mother, spiritual Father? Namaste.

We don't have three. What? We have four children. Who said? Hm? A mother said that I don't have three children. Three children were born through the womb and one ShivBaba was not born through the womb. That is about the knowledge. That is about knowledge. So, you alone are our eldest child. So, look, there are such mothers and fathers who make the Father, the Supreme Soul as a child. So, then ShivBaba will have to say Namaste to them also. Hm? They make Him the child in a true sense. Or if anyone hasn't made Him the child then they will know about theit karmic account. Then, those who do not make, weep a lot. When? Hm? When the result comes out, then they weep a lot. Why? Hm? Arey! I did not make Baba as my child. Those who made Him their child got a lot. And I did not get.

Spiritual Baap and Dada's remembrance, love and good night to the sweet, sweet children. Why is it said BapDada's remembrance, love and good night? And why is it said 'spiritual Father's Namaste to the spiritual children'? Hm? Speak up. It is because when He is the spiritual Father, then He sees the spiritual children only. And BapDada? Is He always spiritual? Hm? Does he become body conscious or not? He becomes. So, then what doesn't he say? Hm? He does not say 'namaste' because he is body conscious, is not he? Baap as well as Dada. Om Shanti. (end)

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